आध्यात्मिक चिंतन-मनन " भोग औऱ त्याग " तथा " कर्म औऱ ज्ञान "के बीच समानजस्य स्थापित कर स्वतंत्रता पाने की ऒर करता है इंगित 🖋️ प्रमोद कुमार सिन्हा

 आध्यात्मिक चिंतन-मनन 

" भोग औऱ त्याग " तथा " कर्म औऱ ज्ञान "के बीच समानजस्य स्थापित कर स्वतंत्रता पाने की ऒर करता है इंगित
               🖋️ प्रमोद कुमार सिन्हा 

अध्यात्म डेस्क (जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन कार्यालय न्यूज डेस्क 7 फरवरी, 2026)। ऊं पूर्णमद : पूर्णमिदमँ पूर्णातपुनम मुदमचयत ,
पूर्णस्य पूर्णमादय पूर्णमेवावशीशयते ,
ओम शांति: शांति: शांति:
बृहदारणयक उपनिषद का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण वैदिक शांति मन्त्र है जो ईश्वर की पूर्णता औऱ निर्गुण ब्रह्म की अद्वैत प्रकृति का वर्णन करता है आइये हम इस पर कुछ गहन चिंतन - मनन करें :-
ओम पूर्णमद: पूर्णमिदम...... ईशावस्योपनिषद औऱ बृहदारणयक उपनिषद का अत्यन्त प्रसिद्ध शांति मंत्र है यह मंत्र प्रब्रह्म की पूर्णता औऱ निर्गुणता को दर्शाता है जिसके अनुसार वह ( परमात्मा ) पूर्ण है यह ( संसार ) भी पूर्ण है औऱ पूर्ण से ही पूर्ण की उतपत्ती होती है फिर भी वह पूर्ण ही रहता है 
आइये हम इस विन्दु पर देश - विदेश के जाने माने गणिगतगयों से एक प्रश्न पूछते हैँ " वह कौन सा अंक है कृपया मुझे बताबें की जैसे १०० - १०० = ० ना होकर १०० ही रहता है।
       या १००+१०० = २०० ना होकर १०० ही रहता है यदि इसे सॉल्व कर दिया जाये तो मैं उसका चेला हो जाऊंगा।
          शायद कोई भी इसे सिद्ध नहीं कर पायेगा कोई जबाब नहीं दे पायेगा जैसे समुद्र से हज़ार गुना जल निकाल लिया जाये तो भी वह घटता नहीं है औऱ हज़ारों नदियों का जल उसमें गिरा दिया जाये तो भी वह बढ़ता नहीं है यह तो एक साधारण सूत्र है।
      गणिग्ताग्यो के पास सिवा मौन के इस पर कोई जबाब ही नहीं है मैं बिहार के "" खान सर "" से इस हल पर उनका मनतव्य चाहूँगा यदि वे इस वक्तव्य को सिद्ध कर सके तो मैं भी इसे जानू लेकिन भले ही खान सर हॉट शिट पर बैठकर महान भारत के महान कलाकार " अमिताभ बच्चन " के समक्ष बैठकर महान बनने की चेष्टा किये हैँ परन्तु मेरे सामने वो फेल हैँ यदि इसे वे सिद्ध ना कर सकें तो , मैं जानता हूँ वे असमर्थ हो जायेगें चूँकि पुरी सृष्टि की रचना करने बाले ने समुद्र की भी रचना की है औऱ पुरे ब्रह्माण्ड में सौर मंडल में ये तारे नक्षत्र ग्रह की रचना बड़े ही अद्भुत पूर्वक की है कहीं से भी इसका कोई आधार नहीं है। 
      कहने का गर्ज है यदि हम मकान का निर्माण करते हैँ तो उसके पहले हम नींव का निर्माण करते हैँ जितने ऊँचे महल उतने नीचे उसका फाउंडेशन अर्थात नींव होता है तब जाकर मकान निर्मित होता है। 
     परन्तु वह छुपा हुआ परमात्मा ( विराट औऱ अज्ञात है ) जो बिना किसी की नींव रखे ही पुरा का पुरा ब्रह्माण्ड की रचना करी है हम उसे कैसे जान सकते हैँ ? है इसका जबाब किसी के पास किसी साइंस्टिस्ट ने कहा है " वह अज्ञात ही नहीं अगेयय भी है " it is नोट known but also unknownable " वह जाना ही नहीं जा सकता है परन्तु उसका रसपान यानी अनुभव किया जा सकता है।
    कबीर साहब नें कहा है बून्द समानी समुद्र में सबको जानी लेकिन समुद्र समानी बून्द में इसे मैंने जानी "" है कोई संत या माय का लाल जो इस पर बक्तव्य दे सके, चाहे शंकराचार्य या बड़े बड़े संत जो करोड़ो शिष्यओं को लेकर अपना अपना ढ़ोल अपना अपना राग का अलाप कर रहे हैँ।
   तो आइये मैं आपको इस प्रकार के संतों से मिलबाता हैँ जिन सृष्टि सृजनहार परम दयालु प्रभु का नाम है "" बाबाजी विजय वत्स "" जो वर्तमान में पंजाब प्रांत के अंतर्गत भटिंडा से तीस किलोमीटर दुर गीदरबाहा में हैँ ** जो कहते हैँ समुद्र समानी बून्द में हमने जानी 
   जी हाँ मेरा एक आलेख "आध्यात्मिक - चिंतन - मनन " बराबर प्रकाशित हो रहा है उस कड़ी के अन्तर्गत यह छठ्ठा आलेख मैं लिख रहा हूँ परन्तु मैं कहां लिख रहा हूँ लिखता जा रहा हूँ परन्तु मैं कहां लिखता जा रहा हूँ सिर्फ नाम मेरा हो रहा है काम तो " वो " कर रहा है मैं तो एक यँत्र हूँ चाभी उसके पास है चाभी वो लगाता है औऱ मैं नाचने लगता हूँ 
     मुझमे कहां हिम्मत है मुझमें कहां शक्ति है ? जो इस प्रकार की बातें बोलूं या लिखूँ वह जगाना चाहता है तो रात - रात भर जगा देता है सुलाना चाहता है तो दिन भर सुला देता है मेरे पुत्र कहा करते हैँ "पापा आप इस प्रकार मत किया करो आपका ऐज हो चुका है कम से कम रात में सो तो लिया करो मैं भीतर ही भीतर हँस पड़ता हूँ ये मैं कहां जगता हूँ ये मैं कहां सोता हूँ जैसा वो नाच नचा रहा है मैं नाचने के लिये बिबस हूँ मेरे बसबुते के बाहर है गीता पर मैंने तीन आध्यात्मिक - चिंतन - मनन लिख चुका हूँ महात्मा गाँधी के पुनर्जनम पर एक आलेख "आध्यात्मिक - चिंतन - मनन " लिख चुका हूँ कायस्थ अर्थात चित्रगुप्त पर एक आलेख " आध्यात्मिक - चिंतन - मनन - लिख चुका हूँ औऱ चाय की दुकान से आध्यत्मिक सफर पर आलेख लिख चुका हूँ 
      ये सभी आलेख मेरे प्रकाशित हो चुकें हैँ हाँ कायस्थ पर जो मैंने लिखा है है ** कायस्थ कहलाने का हकदार वही है जो अपनी काया में स्थित हो चुका है अर्थात जो ** जो ठहर चुका है **चित्रगुप्त को जानना है तो उसका कॉन्सेस लेवल परम हाई हो चुका है अर्थात जिसका चित्त परम गुप्त जिसे **आत्मा ***कहा गया है उस तल तक पहुँच चुका है बाकी सब के सब ढोंग है पाखंड है ** वह आत्मा ** ही सुपर कंप्यूटर है जहाँ जन्मों जन्मों के संस्कार कम्प्यूटरीकृत से विद्यमान है नहीं तो वह कायस्थ है ही नहीं मेरी बातें सभी को बुरा लगता होगा लगने दो अभी तो मैं एक शिशु हूँ मुझे बच्चा जानकर क्षमा करें लेकिन इस सैशव काल में ही जो उसने उड़ेल दिया है जैसा उसका निर्देश हो रहा है आपे से बाहर होकर लिखता जा रहा हूँ लिखता जा रहा हूँ परन्तु हक़ीक़त है मैं कहां लिख रहा हूँ वो तो दारू के नशा में मदहोश कर लिखाता जा रहा है निदेश देता जा रहा है औऱ मदहोश होकर लिखता ही जा रहा हूँ परन्तु मैं कहां लिख रहा हूँ ** बाबा नानक ने लिखा है नशे जहाँ दें उतर जात प्रभात नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात ** कहने का गर्ज है नशा पान जो संसार का है पीने के बाद सुबह उतर जाता है परन्तु परमात्मा के नाम में जो नशा है वह दिन रात खुमारी देता रहता है 
   देखिये कहां की बात कहां लिख गया कहां मैं उपनिषद पर था कहां मैं उपरोक्त बिंदु पर आ गया ""यारों पीकर मैं मदहोश हूँ मुझे मत रोको, रोकना हो गर नशा तो उतर जाने दो "" नशा उतरने का तो नाम ही नहीं ले रहा है ये आध्यात्मिक - चिंतन - मनन का छठी चरण है जो जिस पर चर्चा करते करते मैं बहक गया शायद नशा अधिक चढ़ चुका है 
🕉️पूर्णमद पूर्णमिद: वह परमात्मा या ईश्वर पूर्ण है औऱ यह संसार / दृश्यमान जगत भी पूर्ण है 
पूर्णत्यपूर्ण मुदचयते ( क्षमा करें संस्कृत का श्लोक मोबाइल पर ठीक से टाइप नहीं हो रहा है ) अर्थात पूर्ण से ही पूर्ण सृष्टि प्रकट होता है 
पूर्णस्य पूर्णमादाय यदि उस पूर्ण से ( परमात्मा ) मेँ से पूर्ण सृष्टि को ले लिया जाये तो भी वह पूर्ण ही बचेगा 
पूर्ण मेवावशिष्यते अंत में केवल पूर्ण ही शेष बचता है 🕉️शांति शांति शांति अर्थात आदि दैविक औऱ भौतिक ( तीन प्रकार की शांति हो ) 
      है किसी महात्मा में ये शांति यदि शांति है तो नाम धाम ख्याति औऱ पैसे के प्रति उनकी ललक क्यों है ?
     यह उपरोक्त मन्त्र अद्वैत वेदांत के मुख्य सिद्धांन्त को दर्शाता है कि परमात्मा ( ब्रह्म )पूर्ण औऱ अनन्त है यह भौतिक संसार भी उसी से निकला है इसलिये वह भी पूर्ण है इस संसार के रहने या ना रहने से से ईश्वर की पूर्णता कोई कमी नहीं आती, पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लेने या घटाने या जोड़ने पर भी यह ना घटता है औऱ ना ही बढ़ता है परिपूर्ण ही रहता है 
    अद्भुत ये गणित का सूत्र है कोई गणिग्य इसे समझाये तो मैं जानू मैं मानूं अर्थात % - % = % यह मन्त्र हमें यह बताता है कि हर वस्तु व्यक्ति औऱ घटना अपने आप में पूर्ण है क्योंकि वह उस अंनत ब्रह्म का ही अंश है 
     यह मंत्र अक्सर शिक्षा या योग सूत्रों के प्रारम्भ में शन्ति औऱ एकता के भाव के लिये पढ़ा जाता है 
     इशावश्य उपनिषद ( ईश्वर उपनिषद ) का सार यह है कि सम्पूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है इसलिये संसार की हर वस्तु को त्याग कर ( अनाशक्ति के साथ )भोगना चाहिये औऱ किसी को धन की लालच नहीं करनी चाहिए यह उपनिषद कर्म औऱ ज्ञान की समानजस्य स्थापित करता है जिसमें निष्काम कर्म करते हुए १००वर्ष तक जीने औऱ अंत में परमात्मा में विलीन होने का सन्देश है 
 ईश्वर उपनिषद का मुख्य सार तत्व ईश्वर की सर्वव्यपकता इस जगत में जो कुछ भी है ( जड़ औऱ चेतन )वह ईश्वर द्वारा व्याप्त है, कण कण में ईश्वर विद्यमान है चराचर जगत में जो कुछ भी है वह ईश्वर की अभिव्यक्ति है, त्याग पूर्वक भोग - संसार की वस्तुओं का उपभोग अनाशक्ति के साथ करें जरा भी उसमें अटैचमेंट ना हो वस्तुओं को अपना ना मानकर ईश्वर की धरोहर समझें ( तेन व्यक्ततें भुंजिता ), कर्म योग मनुष्य को अपने कर्तव्यओं का पालन करते हुए सौ साल जीने की इक्षा करनी चाहिये कर्म नहीं बांधते यदि वे अहंकार हीनता के साथ किये जाये 
    इस विन्दु पर मेरी भिन्नता है मेरी इक्षा है हे प्रभु मैंने तेरा संसार देख लिया सुख - दुःख भोग लिया, रिश्ते - नाते सब जान लिया औऱ इस निष्कर्ष पर हूँ मेरी तमन्ना अब शेष नहीं है मुझे परम निद्रा ( चरम - सुख ) में लेचलो जीने की एक जड़ा से भी तमन्ना शेष नहीं है भार स्वरूप जिंदगी है मेरी यदि मेरी कुछ भी शेष बची है तो शेष उमर मेरी परम प्यारे राज दुलारे सृष्टि सृजनहार बाबाजी को लग जाये उनकों रहना अभी संसार के लिये भूले भटके मानव को राह दिखाने उतप्रेरित करने के लिये रहना जरूरी है ताकी अधिक से अधिक संख्या में मुझ जैसा अज्ञानी व्यक्ति को राह दिखाने औऱ मंजिल पर ऑरुद्ध कर सकें फिर भी ये ईश्वर पर ही छोड़ता हूँ जो भोग मुझे भुगतने हैँ यहीं औऱ इसी वक़्त भुगवा लो शेष ना बचे जो मुझे पुनः लौटना पड़े हे प्रभु तू बड़ा ही दयालु है मुझ दास पर कुछ तो रहम करो जीने की जरा सा भी इक्षा नहीं है " मुझे ले चल अपनी नागरिया हे अबध बिहारी साँवरिया "
 लोभ नहीं करना यह भी उपनिषद का सार तत्व है आत्म ज्ञान औऱ एकता जो व्यक्ति आत्मा ( स्वं ) औऱ ईश्वर ( ब्रह्म ) में कोई भेद नहीं देखता है सबको एक ही चेतना अर्थात ( कॉन्सेस लेवल परम हाई )हो जाता है वह भय से मुक्त हो जाता है पूर्णता का दर्शन ( पूर्णमद : पूर्णमीदन )परम ब्रह्म पूर्ण है औऱ यह जगत भी उस पूर्ण से ही निकला है इसलिये सभी कुछ परिपूर्ण है संक्षेप में सार यही है कि " भोग औऱ त्याग " तथा " कर्म औऱ ज्ञान "के बीच समानजस्य स्थापित कर स्वतंत्रता पाने की ऒर इंगित करता है।
  यह आध्यात्मिक - चिंतन - मनन की छठबिं कड़ी प्रकाशन हेतु प्रेषित :- प्रमोद कुमार सिन्हा , केंद्रीय ब्यूरो , जनक्रांति हिंदी न्यूज़ बुलेटिन। समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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