न्याय के मंदिर में न्याय बिकता है? खरीददार की तलाश में आम आदमी!
न्याय के मंदिर में न्याय बिकता है? खरीददार की तलाश में आम आदमी! जनक्रांति कार्यालय रिपोर्ट जब इंसाफ की उम्मीद लेकर अदालत की चौखट पर पहुंचता है पीड़ित, तो उठता है बड़ा सवाल—क्या न्याय व्यवस्था में भी पैसे, पहुंच और प्रभाव का बढ़ता असर आम आदमी के भरोसे को कमजोर कर रहा है.? समस्तीपुर, बिहार (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन कार्यालय न्यूज़ डेस्क 20 अगस्त, 2026)। न्याय को हमेशा से समाज की आखिरी उम्मीद माना गया है। जब किसी व्यक्ति को कहीं से न्याय नहीं मिलता, तो उसकी नजर अदालत की चौखट की ओर जाती है। उसे भरोसा होता है कि यहां उसकी बात सुनी जाएगी, उसके साथ हुए अन्याय का निष्पक्ष आकलन होगा और कानून के मुताबिक फैसला होगा। लेकिन आज एक कड़वा सवाल समाज के सामने खड़ा है—क्या न्याय के इस मंदिर में न्याय भी बिकने लगा है और खरीददार की तलाश की जा रही है.? यह सवाल किसी न्यायाधीश या पूरी न्यायपालिका पर आरोप नहीं है, बल्कि उन परिस्थितियों पर सवाल है, जिनसे आम नागरिक कभी-कभी गुजरता है। मुकदमे की लंबी प्रक्रिया, लगातार बढ़ते खर्च, तारीख पर तारीख, कानूनी पेचीदगियां और प्रभावशाली लोगों की पहुंच—...