अध्यात्म पर आधारित आलेख 🌹 शूद्र है कौन 🌹

अध्यात्म पर आधारित आलेख 
        🌹 शूद्र है कौन 🌹
ब्रह्मा क़े मुख से ब्राह्मण बाहु से क्षत्रिय पेट से वैश्य औऱ पाऊँ से शूद्र की उत्पत्ति हुई है ये कोरी कल्पना है सबों की उत्पत्ति नारी क़े योनि से ही होती 

    🖋️रचियता प्रमोद कुमार सिन्हा 

शुद्रोँ क़े अन्य उदाहरण जो ब्राह्मण बने उनमें रोम हर्षण सुत महाराजा जो कई पुराणों क़े कथाकार थे औऱ सत्य काम जाबली शामिल हैँ जिन्हें हरिद्रुमता गौतम स्वामी द्वारा ब्राह्मणत्व प्रदान किया गया था।

अध्यात्म डेस्क (जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन कार्यालय डेस्क 18 मार्च, 2026)। आज हम जिस विषय पर चर्चा करने जा रहे हैँ हमने बहुत सुना है कि ब्रह्मा क़े मुख से ब्राह्मण बाहु से क्षत्रिय पेट से वैश्य औऱ पाऊँ से शूद्र की उत्पत्ति हुई है ये कोरी कल्पना है सबों की उत्पत्ति नारी क़े योनि से ही होती है कहीं कोई ये दिखा दे की मुख से किसी की उत्पत्ति हुई है ज़ब हमारी सृष्टि की सृजना हुई तो हिन्दू शास्त्रों क़े अनुसार हम मनु औऱ शतरूपा क़े संतान हैँ मुस्लिम संस्कृति क़े अनुसार हम आदम औऱ हौआ क़े संतान हैँ औऱ क्रिस्चन क़े अनुसार ऐडम औऱ इब क़े संतान हैँ तो झगड़ा किस बात का है आज मुसलमानों में भी सिया औऱ सुन्नी की झगड़ा आम बात हो गयी है। क्रिश्चन संस्कृति भी विकृति क़े कगार पर है औऱ हिन्दू की संस्कृति ने तो विकराल रूप धारण कर रखा है ये सभी बातें मध्य कालीन इतिहासकारों औऱ चाटुकार ब्राह्मणों ने फैलायी है जानबूझकर ताकी अपने को सबसे श्रेष्ट रूप में समाज को आइना दिखाया है जो बिलकुल ही गलत है। ज़ब हम एक ही माता औऱ पिता क़े संतान हैँ तो ये बिभिन्न प्रकार की जातियों का उदगम स्थल कहाँ है..?
   ये स्पष्ट जान लेना चाहिये की नारी औऱ गौ में कोई अंतर नहीं है नारी की कोई जाती नहीं होती उसे जिससे विवाह कर दिया जाता है वही उसकी जाती होती है ठीक उसी प्रकार गौ की भी कोई जाती नहीं होती उसे जिस खूंटे से बाँध दिया जाता है वही उसका घर होता है तो विस्तृत रूप से हम इस विन्दु पर चर्चा करते हैं :-
मनु स्मृति क़े अनुसार ये कहा गया है 
"जन्मना जायते शूद्र " ( जैसा की खोज पुराणों में उल्लेख है ) यह प्रसंग सनातन धर्म में वर्ण व्यवस्था को जन्म ( जाती ) क़े बजाय कर्म औऱ योग्यता पर आधारित मानता है।
  जन्म से सभी शूद्र हैं का सिद्धांन्त मुख्यतःह स्कण्द पुराण ( नागर कांड ३१-३४ ) में मिलता है जन्मना जायते शूद्र इस श्लोक का पुरा अर्थ है की जन्म se सभी शुद्र ( अज्ञानी ) होते हैँ लेकिन कर्म औऱ संस्कारों ( शिक्षा / विद्या ) क़े माध्यम से कोई द्विज ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, या वैश्य ) बनता है यह बिचार महाभारत ( वन पर्व ) औऱ कई स्मृतियों में भी समान रूप से मिलता है मूल श्लोक जन्मना जायते शूद्र संस्करात द्विज उच्चयते 
भावार्थ इन्सान अपने जन्म से नहीं बल्कि अपने कर्म से कार्यों औऱ ज्ञान से उच्च या निम्न होता है।
वैदिक साहित्य में चार वरणों का उल्लेख हुआ है जो उपरोक्त अनुसार कहा गया है वाल्मीकि रामायण में शुद्रोँ को सेवक वर्ग क़े रूप में दर्शाया गया है लेकिन कुछ व्याख्याओं क़े अनुसार वे अपनी क्षमता औऱ कर्म क़े आधार पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैँ जैसे की वाल्मीकि स्वं एक शुद्र माने जाते हैँ औऱ उन्होंने रामायण की रचना की वेदव्यास की उत्पत्ति मछोदरी क़े गर्भ से हुई औऱ उन्होंने अनेक शास्त्रओं को लिखा दीगर है की जिस शास्त्र की रचना उन्होंने नहीं की है रूपांत्रित कर ब्राह्मणों ने उनके नाम का उल्लेख किया है सिर्फ जाती बादी व्यवस्था को क़ायम रखने क़े लिये वेदव्यास का जन्म मुख्यतः मल्लाह कन्या सत्यवती औऱ पिता परासर द्वारा गर्भ धारण से वे शूद्र होते हुए भी ब्राह्मण कहलाये। वहीं दुसरी ओर मल्लाह पुत्री का विवाह राजा शांतनु से होने क़े कारण वो शुद्र होते हुए भी क्षत्रिय कहलायी कहाँ रहा है नारी का जाती. ? शुद्रोँ क़े अन्य उदाहरण जो ब्राह्मण बने उनमें रोम हर्षण सुत महाराजा जो कई पुराणों क़े कथाकार थे औऱ सत्य काम जाबली शामिल हैँ जिन्हें हरिद्रुमता गौतम स्वामी द्वारा ब्राह्मणत्व प्रदान किया गया था मातंग नाई जाती क़े अन्य शुद्र थे औऱ उनकी तपस्या क़े कारण ब्राह्मण कहलाये ये बिभिन्न धरनायें बनाये गये मध्य कालीन समय में जिसका कोई औचित्य नहीं है हम निम्न श्लोक पर विचार करें।
"जन्मना जायते शूद्र संस्कार द्विज उच्चयते, वेद पाठद भबेद विप्र ब्रह्म जानती ब्राह्मण : "स्कन्द पुराण नागर कांड अध्याय २३९श्लोक ३१-३४में पाया जाता है की वर्ण व्यवस्था को जन्म पर आधारित ना मानकर गुण और कर्म ( शिक्षा व संस्कार )पर आधारित बताता है।
ये उपरोक्त आलेख प्रकाशन हेतु प्रमोद कुमार सिन्हा, केंद्रीय ब्यूरो चीफ, जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन द्वारा संप्रेषित व समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशित व प्रसारित।

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