ग़ज़ल : ज़िन्दगी किसी के काम आ जाये पता नहीं कब मौत का पैगाम आ जाये,

ग़ज़ल : ज़िन्दगी किसी के काम आ जाये 
पता नहीं कब मौत का पैगाम आ जाये,
     🖋️प्रमोद कुमार सिन्हा, बाघी

पता नहीं मौत का कब पैगाम आ जाये  ,
जिंदगी की शाम ये मेरी कब आ जाये ,
है ये हक़ीक़त पर गफलत में पता नहीं किसी को ,
तलाश हमेशा रहता ज़िन्दगी किसी के काम आ जाये ,
हुस्न -ए -, दीदार भी देखा दो दिलों का तकरार देखा ,
नफरत का जाम भी देखा काम तमाम भी देखा,
सब कुछ तो देखा है मैंने इसी जीवन में ,
परम इक्षा आरजू है खुदा से अमृत रस का जाम आ जाये ,
पीकर मदहोश हो जाऊँ कुछ भी पता नहीं ,
ऐसी पीला साकी जाम पर जाम का पता नहीं ,
शुरुरे रंग में रंग जाऊँ होशो हबास खो बैठूं मैं ,
सुरज निकला दिन ढला चाँद का भी पता नहीं,
प्रमोद का आलम हे कभी जुदा ना करना मुझे ,
तेरी याद में पल पल डूबा रहूँ वक़्त याद ना मुझे,
आगोश में समा लो अंक भर गले से लगा लो ,
आँखो से अश्रु पात हो शर पर हाथ अहसास हो मुझे,
इसके सिवा मुझे औऱ ना कुछ भी चाहिये ,
टर्र टर्र मेढ़क की आबाज औऱ शून्य का दीदार चाहिये ,
गम ना हो गर तुम भी ना दिखे कहीं पर भी ,
जंचर पॉइंट पर पहुँच जाऊँ यही केवल हुनर चाहिये,
ज़िन्दगी किसी के काम आ जाये,।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

Comments