ग़ज़ल : दीदार चमन है, हुस्न -ए -बहारे है
ग़ज़ल : दीदार चमन है, हुस्न -ए -बहारे है
कैसे कहूँ मैं तुम्हारा हो गया हूँ
घर - आँगन छोड़ दुलारा हो गया हूँ
तेरी हुस्न - जवानी देखकर तो मैं
बिलकुल आबारा हो गया हूँ
कैसे कहूँ मैं.......
कैसे कहूँ मैं तुम्हारा हो गया हूँ
घर - आँगन छोड़ दुलारा हो गया हूँ
तेरी हुस्न - जवानी देखकर तो मैं
बिलकुल आबारा हो गया हूँ
कैसे कहूँ मैं.......
नज़रें चुराकर पहले देखा करता था
अब चार आँखें मिल गयी है
दीदार चमन है, हुस्न -ए - बहारे है
इशारे में मिला जन्नत मिल गयी है
कैसे कहूँ मैं.......
देखते - देखते नज़र ठहर गयी है
सुरज रुक गया हबायें ठहर गयी है
चाँद का दीदार जमीं पर आ गया
शमा जल गया रौशनी ठहर गयी है
कैसे कहूँ मैं......
प्रमोद - ए - इश्के बहार हो गया
जन्नत की खुशी घर में आ गया
राहें सुलझ गयी आसमां दीख रहा
बांहों में बाहें डाल ठहराव आ गया
कैसे कहूँ मैं......
पलक झपकते ही भीड़ में खो गयी
जुदाई का आलम अश्रुपात हो गयी
लगता है खो गया जमाना होश नहीं
सपना था मेरा दर्द बनकर रह गयी
कैसे कहूँ मैं......

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