यू जी सी बिल लाने का मुख्य मकसद है वोट की राजनीती औऱ जाती गत भेदभाव को बढ़ाने वाला काला कानून
यू जी सी बिल लाने का मुख्य मकसद है वोट की राजनीती औऱ जाती गत भेदभाव को बढ़ाने वाला काला कानून
जनक्रांति कार्यालय से केंद्रीय ब्यूरो चीफ प्रमोद कुमार सिन्हा क़ी रिपोर्ट
ज़ब देश एक है तो दायित्व है सबको समान शिक्षा मिले " जब एक देश है एक कानून है तो एक ही समान शिक्षा क्यों नहीं..?
इंडिया न्यूज़ डेस्क (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन कार्यालय न्यूज़ डेस्क 24 फ़रवरी, 2026)। सबसे पहले हम आते हैँ ये शिक्षा माफिया जिसका बढ़ावा सभी राजनितिक पार्टियां कर रही हैँ. ये हज़ारों तरह के बोर्ड हज़ारों तरह की शिक्षायें क्यों. ? ये सी बी एस ई बोर्ड ये आई सी एस ई बोर्ड क्यों. ? ज़ब देश एक है तो दायित्व है सबको समान शिक्षा मिले " जब एक देश है एक कानून है तो एक ही समान शिक्षा क्यों नहीं. ? तो बंधुओं मैं बता दूँ जानबूझकर इस प्रकार की व्यवस्था पैदा करना है बैक डोर से धन कमाने औऱ शिक्षा माफिया को बढाबा देने की , नियमतः ** एक देश एक शिक्षा होना है ही उचित है मेरे विचार से इसमें पूर्व माननीय मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीबाल की बातों से मैं पूर्ण संतुष्ट हूँ
यदि इस प्रकार की व्यवस्था लागू पुरे देश में होती है तो शिक्षा में भेदभाव ही समाप्त हो जायेगा ना प्राइवेट स्कूल होगा औऱ ना ही शिक्षा माफिया जिससे नेताओं की काली कमाई रुक जायेगी उनका बैक डोर से जेब भरना बंद हो जायेगा इस प्रकार की दोगली औऱ दुरंगी चाल का पर्दाफास हो जायेगा इसलिये ये सभी राजनितिक पार्टियां कर रही हैँ
सभी राजनितिक पार्टियों के नेताओं के बच्चे विदेश में पढ़ने जाते हैँ जहाँ इस प्रकार का कोई भेदभाव नहीं है सिर्फ भारत में ही ये तरह तरह की शिक्षा माफियों का बोलबाला है इस प्रकार की गंदी औऱ बेहूदगी राजनीती का ना तो कोई उद्देश्य है शिक्षा के प्रति औऱ ना ही उज्ज्वल भविष्य है तो ऐसी शिक्षा यहाँ क्यों है.? इसका जबाब कोई भी नेता चाहे किसी भी पार्टी का हो जबाब नहीं देंगे ये देश के लोगों के प्रति सरासर अन्याय है इस पर संसद में बहस क्यों नहीं होती ? इस प्रकार का कानून संसद से पारित क्यों नहीं होता ? एक देश एक समान शिक्षा , इस प्रकार की कानून लागू किया जाये तो प्रवेटीकरण बाली शिक्षा पर रोक लग जायेगा जिनसे नेताओं का जेब भरना बन्द हो जायेगा क्या ये उचित नहीं है.? मनमाने फीस औऱ मनमाने किताबों से बच्चे का भविष्य छिना जा रहा है बच्चे किताबों के बोझ से परेशान हैँ। देखिये छोटे छोटे बच्चे के कंधे पर उनका वजन से अधिक बोझ उनकी किताबों से है औऱ वे किताबों की बोझ से झुककर चलते हैँ मानो उनका बुढ़ावा जो बाद में आना है शुरुआत में ही आ गया, इस प्रकार की शिक्षा नीति क्यों है.? इसका जबाब कौन देगा.? क्या शिक्षा मंत्री चुपचाप वेतन भत्ता औऱ अन्य सुबिधा लेने का ही अधिकार उन्हें है.?
वास्तविकता वे चाहते ही हैँ ऐसा व्यवस्था जिससे उनके पॉकेट औऱ पार्टी को फण्ड मिलता रहे ये दोगली औऱ दुरंगी चाल के दोषी क्या प्रधान मंत्री नहीं हैँ.? क्या संसद का दायित्व नहीं है ? आज बार बार संसद स्थगित होता है क्यों.? सिर्फ विरोधी पार्टियों को बोलने का अधिकार छीनने के लिये.? संसद से माननीय गायब विदेश यात्रा पर क्या यही उनका दायित्व है.? जिस संसद पर एस आई आर पर चर्चा होना था वहाँ चर्चा को डाइवर्ट करना बंदे भारत का गुणगान कहाँ तक जायज है इस पर मिडिया चुप क्यों है. ? स्वभाविक है मीडिया बिक चुका है जहाँ प्रति दिन करोड़ो अरबों का विज्ञापन मिल रहा है वहाँ आबाज बुलंद कैसे होगा.?
लीजिये हम चर्चा नये कानून यू जी सी पर करने बाले थे लेकिन सरकार की जबाबदेही से यदि मीडिया मुकर जाये तो मिडिया बिकाऊ ही हुआ ना.? अब हम इस विन्दु पर आते हैँ देश भर में ये यू जी सी का काले कानून औऱ उसका जबरदस्त विरोध पर चर्चा होना है लेकिन कुछेक बातों को नहीं बताऊं तो मैं भी बिकाऊ हो जाऊँगा।
मैं मूलतः आर एस एस से हूँ जहाँ देश भक्ति औऱ राष्ट्र भक्ति की भावना सिखायी औऱ समझाई जाती है लेकिन संबिधान में बोलने की आज़ादी भी है मैं आर एस एस प्रधान श्री मोहन भागवत से पुछना चाहता हूँ आज वे कहते हैँ हिन्दुओं को तीन बच्चे पैदा करना चाहिये बात ठीक है लेकिन देश जानना चाहता है उनके कितने बच्चे हैँ ? वे ये भी बताबें ? दुसरी बात हिन्दू मुसलमान लड़ाने की बात है उन्हें यह भी बताना चाहिये की उनका निकटतम संबंध मुसलमान से है या नहीं ? देश को जानकारी होना चाहिये की उच्च उच्च पदों पर पदासीन व्यक्तिओं का संबंधी मुसलमान है या नहीं ?
आज हिंदूओं को एक जुट होने के लिये मंदिर का सहारा लिया जा रहा है माननीय प्रधान मंत्री क्या अपने अंतरजगत में उतरे हैँ ? यदि वे स्व में स्थित होते तो भड़काने की बात ही खतम हो जाती जहाँ ना कोई हिन्दू है औऱ ना ही मुसलमान ना कोई उच्च है औऱ ना ही कोई नीच, सभी की उत्तप्ति मां के योनि से होती है जो वेद कहता है जनम से सभी " शुद्र " हैँ जिस प्रकार मध्य कालीन में गोदी मिडिया ब्राह्मण थे जो आज गोदी मिडिया है सारे धर्म शास्त्र जलाने के योग्य है परम पिता परमात्मा ने किसी भी जाती का निर्माण नहीं किया है ये माननीयों का योग करना मूर्ति पुजाकरना वोट की राजनीती है स्व में प्रवेश करते तो उनकी बुद्धि इस प्रकार नहीं होती वे असंतुष्ट नहीं होते बार बार कटोरे लेकर जनता के सामने भीख नहीं मांगते भोट क़े लिये कहने का गर्ज है वे भीखमंगें हैँ उन्हें संतुष्टि नहीं है ये ""आरक्षण "" बन्द होना चाहिये कितने दिनों तक चलता रहेगा क्या पीढ़ी दर पीढ़ी क्या बाबा भीम राव अम्बेडकर ने कल्पना की थी की इसका दुरूपयोग होगा ? इस प्रकार की जाती - विभेद मिटना चाहिये जो कोई भी राजनेता नहीं चाहते हैँ आखिर क्यों ? मुसलमान को किसने छुट दे रखा है की दर्जनों बच्चे पैदा करने की ? यदि वे ऐसा करते हैँ तो उनकी सारी सुबिधा बन्द होना चाहिये "एक देश एक संबिधान औऱ एक कानून " की माँग ही उचित एबं जाइज है बाकी सभी बकबाद है हिम्मत है तो जिस प्रकार सरकारी कर्मचारी का पेंशन बन्द है तो राजनेताओं को पेंशन क्यों ? क्या वे सरकारी कर्मचारी हैँ ? जिस प्रकार सरकारी कर्मचारी का अनुकम्पा बन्द है राजनेताओं क़े बच्चे क़े लिये भी इलेक्शन लड़ना बन्द होना चाहिये है हिम्मत किसी में ?
अब आइये मैं यू जी सी क़े काले कानून की ऒर ले चलते हैँ ये काला कानून जाती भेदभाव पैदा करना करना वोट की राजनीती से प्रेरित है यह सिर्फ औऱ सिर्फ वोट की रजनीति क़े सिबा कोई तथ्य नहीं है सन १९५६ में अबुल कलाम आज़ाद द्वारा यह बिल लाया गया था जो उच्च शिक्षण संस्थाओं में डिग्री की वैल्यू पुरे देश स्तर पर समान हो यदि कोई भेदभाव होता है तो पहले से ही बहुत काले कानून यहाँ लागू है मैं काले कानून इसलिये कहता हूँ उस पर मेरा भिन्नता है उसे बन्द होना ही लाज़िमी है अर्थात संबिधान को पुनर निर्माण की आबाश्यकता है जो आनन फानन में लागू किया गया है
U g c है क्या हम इस पर विस्तृत बातें करते हैँ औऱ जनबरी सन २०२६ में लाया गया ये बिधेयक सरासर सबरनों क़े प्रति अन्याय है एक ही यूनिवर्सिटी में पढ़ने बाले एस सी / एस टी / ओ बी सी यदि आपसी रंजिस से भी कोई सबर्ण पर आरोप लगा दे की ये जातिगत भेदभाव से मुझपर अत्याचार किया है या मुझे इंसल्ट किया है तो उस सबर्ण पर कठोर से कठोर कररबाई होगी जो सरासर पक्षपात औऱ वोट की राजनीती जाती जाती में बिभेद करना ही मुख्य लक्ष्य है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट नें विरोध को देखते हुए २९ जनबरी २०२६ को तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है औऱ sn२०१२ क़े नियमों को ही जारी रखने का आदेश पारित किया है २९ जनबरी २०२६ को सुप्रीम कोर्ट क़े मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त औऱ जस्टिस जाय माल्या बागची की बेंच नें उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ाबा देना विनियम २०२६पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है कोर्ट ने स्पष्ट तौर पर कहा है नये नियम बहुत दूरगामी थे और अस्पष्ट थे उनसे कैम्पस में जाती - आधारित भेदभाव क़े मामले में निर्दोषॉन को फ़साने का खतरा था।
कोर्ट की अगली सुनबाई हेतु तारीख मुकर्र कर दी गयी है जो १९मार्च २०२६ को होगी इस मामले में कोर्ट ने यू जी सी औऱ केंद्र सरकार को नोटिश जारी किया है हलफनामा दायर करने का
यह रोक मुख्य रूप से उन नियमों पर लगाई गयी है जो २०१९ क़े आबेदा सलीम ताड़वी बनाम भारत संघ मामले क़े बाद जाती आधारित भेदभाव को १३जनबरी २०२६ को लाये गये थे
ये 👆 उपरोक्त है पुरा विवाद औऱ माननीय साह औऱ माननीय मोदी की असली स्वरूप की झलक कैसे वोट क़े लिये नये नये कारनामें में संलग्न है औऱ २०४७ की सपना दिखा रहे हैं। मैं अगली चुनाव में ही कहीं ये दो चार पर ही सिमट नहीं जायें यही तमाशा देखना चाहता हूँ प्रजातंत्र में हमेशा रोटी की तरह उलट पुलट होना बहुत ही जरूरी है ये दोनों दारू की नशा में मदहोश हैँ जब पाकिस्तान ने हमला किया था तो विरोधियों को चर्चा पर बुलाया था और युद्ध बन्द करने की बात हुई तो विरोधियों को आइना दिखाते हुए स्वतः निर्णय लेना अहंकार की श्रेणी में आता है जो देश हित में नहीं है।
क्यों बार बार अमेरीका आँखें दिखा रहा है जरूर कोई भेद है जो अमेरिका क़े पास है जहाँ माननीय मोदी जी की घिग्गी बंधी हुई है।

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