जब कलम सत्ता से नहीं डरती—तब साम्राज्य नंगे हो जाते हैं काश भारत में भी जूलियन असांजे और जूली के. ब्राउन होते

जब कलम सत्ता से नहीं डरती—तब साम्राज्य नंगे हो जाते हैं काश भारत में भी जूलियन असांजे और जूली के. ब्राउन होते

 जनक्रांति इंडिया डेस्क
पत्रकारिता की असली ताकत क्या होती है—यह समझना हो, जूलियन असांजे और जूली के. ब्राउन तो तस्वीर में दिख रहे दो नाम ही काफी हैं।

इंडिया न्यूज़ डेस्क, (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन कार्यालय न्यूज़ डेस्क 13 फ़रवरी, 2026)। पत्रकारिता की असली ताकत क्या होती है—यह समझना हो, तो तस्वीर में दिख रहे दो नाम ही काफी हैं।
ये वे लोग हैं जिन्होंने बिना डरे, बिना बिके, बिना झुके सच को दुनिया के सामने रखा—चाहे उसकी कीमत कैद हो, चरित्रहनन हो या जान का खतरा।
👉 Julian Assange
👉 Julie K. Brown
इन दोनों ने मिलकर उस अंधेरी सुरंग में रोशनी डाली, जिसे दुनिया Epstein Files के नाम से जानती है—जहाँ शराफ़त के मुखौटे पहने वैश्विक ताक़तवर चेहरे दरअसल नरभक्षी व्यवस्था के हिस्से निकले।
🧨 जब पत्रकार बिकते नहीं—तो सत्ता कांपती है
जूलियन असांजे ने दुनिया को बताया कि राज्य भी अपराधी हो सकता है, और जूली के. ब्राउन ने यह साबित किया कि एक अकेली ईमानदार पत्रकार पूरी वैश्विक एलिट को कटघरे में खड़ा कर सकती है।
उनकी पत्रकारिता ने यह संदेश दिया:
सच राष्ट्र से बड़ा होता है
पीड़ित की आवाज़, पद और पैसे से भारी होती है
पत्रकारिता, सत्ता की नौकर नहीं—लोकतंत्र की चौकीदार होती है
🇮🇳 और हमारा भारत?
काश भारत में भी ऐसे दो पत्रकार होते!
लेकिन यहां सच्चाई कड़वी है—
99% पत्रकार ‘पांच सौ वाले’ बना दिए गए हैं।
यहां सवाल पूछने की जगह प्रेस नोट पढ़े जाते हैं,
यहां खोजी पत्रकारिता की जगह डिबेट का शोर है,
यहां सत्ता से सवाल नहीं—सत्ता के विज्ञापन छपते हैं।
जो पूछता है—वह देशद्रोही।
जो बिकता है—वह “नेशनलिस्ट”।
⚖️ पत्रकारिता नहीं बचेगी, तो न्याय भी नहीं बचेगा
जिस देश में पत्रकार डर जाए, वहां न्यायपालिका अकेली पड़ जाती है।
जिस देश में मीडिया बिक जाए, वहां संविधान काग़ज़ बन जाता है।
असांजे जेल में है, क्योंकि उसने सच दिखाया।
जूली के. ब्राउन जिंदा है, क्योंकि उसने सच लिखना नहीं छोड़ा।
यही फर्क है पत्रकार और दलाल में।
📢 यह लेख श्रद्धांजलि नहीं—चेतावनी है
यह लेख किसी विदेशी पत्रकार की महिमा नहीं,
यह भारतीय पत्रकारिता के पतन पर शोक-घोषणा है।
अगर आज भी भारत में
सत्ता से सवाल पूछने वाला मीडिया नहीं उठा
पीड़ित के पक्ष में खड़ा पत्रकार नहीं मिला
तो कल इतिहास लिखेगा—
“भारत में पत्रकार थे, लेकिन पत्रकारिता मर चुकी थी।”
एडवोकेट Md. Bairam Rakee
खगड़िया, बिहार, भारत
नोट:
यह लेख उन सभी ईमानदार पत्रकारों को समर्पित है जो कम हैं, दबे हैं, लेकिन अब भी बिके नहीं हैं।
अगर आपको लगता है कि पत्रकारिता जिंदा रहनी चाहिए—तो इस लेख को साझा करें।
क्योंकि सच तभी बचता है, जब उसे फैलाया जाता है।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक /सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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