स्व रचित रचना : अनहद धुन.....शरीर बढ़ते बढ़ते लम्बा बृक्ष ताड़ के समान हुआ घटते घटते लगा मौत के आगोश में शून्य हुआ 🖋️प्रमोद कुमार सिन्हा, बाघी
स्व रचित रचना : अनहद धुन.....
शरीर बढ़ते बढ़ते लम्बा बृक्ष ताड़ के समान हुआ
घटते घटते लगा मौत के आगोश में शून्य हुआ
🖋️प्रमोद कुमार सिन्हा, बाघी
अनहद धुन......
शरीर बढ़ते बढ़ते लम्बा बृक्ष ताड़ के समान हुआ
घटते घटते लगा मौत के आगोश में शून्य हुआ
शरीर नज़र ना आया हाथ दीख ना पड़ा
नाक छूकर ज़ब देखा धीरे धीरे शरीर का बोध हुआ
अनहद धुन.......
कोराना काल में तूने रात्री में मुझे जगाया
सोये सोये क्रिया योग करने लगा भय भरपुर समाया
एका एक चक्र जलते देखा बुझते देखा
सन सन सा आबाज क्षण भर का लगा मौत में समाया
अनहद धुन.......
तुमसे पूछा हुआ किया जो मुझ पर बिता
सुनी अनसुनी कर तूने कुछ ना बताया जो बिता
समय चक्र चलता रहा बड़े पुत्र को मैंने बताया
बाद में पुस्तक भेजा सारी बात समझ कर जीता …

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