"रुपैया ही मेरा भगवान है..!” — फर्जी पत्रकारिता का नंगा सच, जिसने लोकतंत्र को दलाल बना दिया : बैराम
"रुपैया ही मेरा भगवान है..!” — फर्जी पत्रकारिता का नंगा सच, जिसने लोकतंत्र को दलाल बना दिया
जनक्रांति कार्यालय रिपोर्ट
खगड़िया, बिहार, (जनक्रांति हिन्दी news बुलेटिन कार्यालय )।
मैं पत्रकार हुँ..।
“मैं सच को झूठ बनाता हूँ,
मैं फर्जी न्यूज़ दिखाता हूँ,
मैं सब धर्मों को लड़ाता हूँ,
मैं पब्लिक को उकसाता हूँ,
है रुपैया ही मेरा भगवान—
मिले चाहे जितना अपमान,
मैं फर्जी पत्रकार हूँ।”
ये पंक्तियाँ किसी कवि की कल्पना नहीं—ये आज की मीडिया-संस्कृति का स्वीकारोक्ति-पत्र हैं। यह उस पत्रकारिता का एक्स-रे है, जो कैमरे के सामने नैतिकता का मुखौटा पहनकर, पर्दे के पीछे लोकतंत्र की लाश बेच रही है।
. आज सवाल यह नहीं कि फर्जी पत्रकार कौन है?
सवाल यह है कि असली पत्रकार बचा भी है या नहीं?
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🔥 सच की हत्या, झूठ का उत्सव
आज खबर नहीं बनती—खबर बेची जाती है।
हेडलाइंस नहीं गढ़ी जाती—नरेटिव ठेके पर दिए जाते हैं।
स्टूडियो बहस नहीं होती—उकसावे की नीलामी होती है।
जिस दिन रुपैया “खबर का स्रोत” बन गया, उसी दिन सत्य शरणार्थी हो गया।
जिस दिन TRP “ईमानदारी” से बड़ी हो गई, उसी दिन संविधान बैकग्राउंड म्यूज़िक बन गया।
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🕯️ धर्म, जाति, डर—सब बिकाऊ
फर्जी पत्रकारिता की सबसे घिनौनी पहचान यह है कि वह धर्म को हथियार, जाति को बारूद, और डर को ब्रेकिंग न्यूज़ बना देती है।
न दंगा होता है, न इंसाफ मिलता है—बस व्यूज़ बढ़ते हैं।
यह पत्रकारिता नहीं—सांप्रदायिक स्टार्टअप है।
यह खबर नहीं—नफ़रत का आईपीओ है।
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⚖️ लोकतंत्र का चौथा स्तंभ या दलाली का चौथा धंधा...?
कभी पत्रकार सत्ता से सवाल करता था।
आज सत्ता पत्रकार से रेट कार्ड पूछती है।
. कभी कैमरा पीड़ित के साथ खड़ा होता था।
आज कैमरा पीड़ित के आंसुओं की क्लोज़-अप बिक्री करता है।
जब मीडिया बिकती है, तब चुनाव नहीं—नैरेटिव जीते हैं।
जब मीडिया झूठ परोसती है, तब अदालत नहीं—स्टूडियो फैसला सुनाते हैं।
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🚨 बिहार से भारत तक—एक चेतावनी
समस्तीपुर हो या खगड़िया हो या पटना- दिल्ली, गाँव हो या ग्लोबल मंच—फर्जी पत्रकारिता की महामारी हर जगह फैल चुकी है।
यह बीमारी लोकतंत्र की इम्युनिटी तोड़ती है, समाज को बांटती है, और संविधान को कमजोर करती है।
आज अगर हम चुप रहे, तो कल सच की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी प्रायोजित होगी।
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✊ अब सवाल जनता से है...??
क्या आप झूठ को “ब्रेकिंग” मानते रहेंगे..?
क्या नफ़रत को “डिबेट” समझते रहेंगे..?
क्या रुपैया को “भगवान” मानने वालों से लोकतंत्र की रक्षा की उम्मीद करेंगे..?
फर्जी पत्रकारिता का बहिष्कार—लोकतंत्र की पहली शर्त है।
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🔔 अंतिम शब्द
जो पत्रकार सच बेच दे, वह पत्रकार नहीं—दलाल है।
जो खबर से नफ़रत फैलाए, वह मीडिया नहीं—मिसाइल है।
और जो रुपैया को भगवान माने—वह समाज का अपराधी पुजारी है।
अब फैसला आपका है—
या तो आप “व्यूअर” बने रहेंगे,
या सच के नागरिक बनेंगे।
जनक्रांति प्रधान कार्यालय को संप्रेसित
एडवोकेट Md Bairam Rakee
खगड़िया, बिहार, द्वारा किये गए आलेख प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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