"किसी भी मुद्दे पर सांसद और विधायक से सवाल करने में पत्रकार को शर्म क्यों आती है..?:बैरम रकी

"किसी भी मुद्दे पर सांसद और विधायक से सवाल करने में पत्रकार को शर्म क्यों आती है..?:बैरम रकी 

यही सवाल आज भारत के लोकतंत्र की रीढ़ हिला रहा है।

✍️ लेखक: एडवोकेट मोहम्मद बैरम रकी

"कैमरा गरीब पर तेज़, सत्ता पर धुंधला क्यों? — जब पत्रकार विधायक–सांसद से सवाल पूछने में शर्माने लगे, तब लोकतंत्र अनाथ हो जाता है” 

जनक्रान्ति कार्यालय रिपोर्ट 

जनक्रान्ति इंडिया न्यूज़ डेस्क, खगड़िया/समस्तीपुर, बिहार,। पत्रकार महोदय,विडियो बनाकर गलती उजागर करना कोई छोटी बात नहीं है — यह साहस है, यह मेहनत है, यह जोखिम है।
लेकिन सवाल यह है कि गलती किसकी उजागर हो रही है..?
हमेशा गरीब की..?
हमेशा शिक्षक की?
हमेशा छोटे कर्मचारी की..?
हमेशा पंचायत सचिव, मुखिया या किसी मजबूर व्यक्ति की..?
❓ उसी मुद्दे पर सांसद और विधायक से सवाल करने में शर्म क्यों आती है?
यही सवाल आज भारत के लोकतंत्र की रीढ़ हिला रहा है।
📸 कैमरा नीचे क्यों, ऊपर क्यों नहीं..?
आज का दृश्य बड़ा अजीब है —
कैमरा झुग्गी में घुस जाता है,
कैमरा गरीब के घर में घुस जाता है,
कैमरा क्लर्क की कुर्सी पर तैनात हो जाता है,
लेकिन जैसे ही वही कैमरा सांसद–विधायक, मंत्री, बड़े अफसर के दरवाज़े तक पहुँचता है —
बैटरी खत्म हो जाती है,
माइक म्यूट हो जाता है,
और साहस “तकनीकी कारणों” से बंद हो जाता है।
.    अधिवक्ता मोहम्मद बैरम रकी
क्या यही है निर्भीक पत्रकारिता...?
🗳️ सवाल ये नहीं कि गलती है या नहीं
सवाल ये है कि जिम्मेदार कौन है...?
अगर स्कूल जर्जर है —
तो क्या सिर्फ शिक्षक दोषी है,
या उस क्षेत्र का विधायक?
अगर अस्पताल में दवा नहीं है —
तो क्या सिर्फ कंपाउंडर दोषी है,
या उस जिले का सांसद.?
अगर सड़क टूटी है —
तो क्या सिर्फ ठेकेदार दोषी है,
या बजट पास करने वाला जनप्रतिनिधि?
पत्रकार महोदय,
नीति बनाने वाले से सवाल पूछे बिना रिपोर्ट अधूरी होती है।
🎭 सत्ता से सवाल पूछना शर्म नहीं, पत्रकारिता का धर्म है
शर्म तब आती है जब
पत्रकार सत्ता के चरणों में बैठकर
गरीब पर ज्ञान बाँटे।
शर्म तब आती है जब
विधायक के सामने “सर–सर”
और जनता के सामने “एक्सपोज़” किया जाए।
पत्रकार का काम
सत्ता का पीआर बनना नहीं,
सत्ता का आईना बनना है।
⚖️ लोकतंत्र में सबसे खतरनाक चीज़
“डरी हुई पत्रकारिता” होती है
जहाँ पत्रकार सवाल नहीं पूछता,
वहाँ नेता निरंकुश हो जाता है।
जहाँ मीडिया चुप हो जाती है,
वहाँ संविधान रोता है।
और याद रखिए —
इतिहास माफ़ नहीं करता
उन कलमों को
जो सत्ता के डर से सूख जाती हैं।
अंतिम सवाल (जो पूरी दुनिया से है)
अगर पत्रकार ही सांसद–विधायक से सवाल नहीं पूछेगा,
तो फिर जनता किससे पूछेगी..?
और अगर सवाल पूछने में शर्म आती है,
तो कैमरा उठाने का नैतिक अधिकार
किस आधार पर बचता है...?
🛑 यह लेख किसी पत्रकार के खिलाफ नहीं,डरी हुई पत्रकारिता के खिलाफ है।
✊ यह आवाज़ खगड़िया/समस्तीपुर से उठी है,
लेकिन गूंज पूरे हिंदुस्तान के लिए है ।
अगर यह सवाल आपको चुभता है —
तो समझ लीजिए यह लेख अपना काम कर चुका है।

उपरोक्त आलेख वाट्सऐप माध्यम से जनक्रान्ति प्रकाशन कार्यालय को दिया गया.. प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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