जहाँ न्याय की आख़िरी उम्मीद भी तारीख़ पर टिकी है।जहाँ वकील काबिल हैं, पर सिस्टम उन्हें ऊपर नहीं जाने देता: मो. बैरम रकी

"जब क़ाबिल जज बनने से डरें और सिस्टम क़ाबिल को रोके — तब न्याय कुर्सी नहीं, सिफ़ारिश बन जाता है.!”

✍️ लेखक: एडवोकेट Md Bairam Rakee

जनक्रान्ति कार्यालय रिपोर्ट

जहाँ न्याय की आख़िरी उम्मीद भी तारीख़ पर टिकी है।
जहाँ वकील काबिल हैं, पर सिस्टम उन्हें ऊपर नहीं जाने देता : मो. बैरम रकी 

जनक्रान्ति हिन्दी न्यूज बुलेटिन न्यूज़ डेस्क, भारत।
“अच्छे वकील हाईकोर्ट–सुप्रीम कोर्ट जज बनना नहीं चाहते हैं, और जो बनना चाहते हैं उन्हें हम बनाना नहीं चाहते…”
— पूर्व मुख्य न्यायाधीश, भारत
यह कोई साधारण वाक्य नहीं है।
यह भारतीय न्याय-व्यवस्था की एक्स-रे रिपोर्ट है।
यह स्वीकारोक्ति है—ऊपर बैठे व्यक्ति की—कि समस्या वकीलों में नहीं, सिस्टम में है।
सवाल पहला:
अगर अच्छे वकील जज नहीं बनना चाहते, तो क्यों..?
क्या इसलिए कि जज की कुर्सी आज न्याय की नहीं, समझौते की प्रतीक बन चुकी है..?
क्या इसलिए कि ईमानदार वकील जानते हैं—
कुर्सी पर बैठते ही स्वतंत्रता घटती है, दबाव बढ़ता है, और सच बोलना जोखिम बन जाता है...?
सवाल दूसरा:
और जो जज बनना चाहते हैं—उन्हें “हम” क्यों नहीं बनाना चाहते..?
यह “हम” कौन है..?
कॉलेजियम..? लॉबी..? कॉरपोरेट पावर..? राजनीतिक दबाव...?
या वह अदृश्य नेटवर्क, जो तय करता है—
कौन न्याय देगा और कौन सिर्फ़ आदेश पढ़ेगा..?
आज की कड़वी सच्चाई
आज भारत में काबिल वकील कोर्टरूम में खड़े हैं,
और कमज़ोर समझ वाले लोग बेंच पर बैठे हैं।
आज तर्क नहीं, टेम्पलेट चलता है।
आज संविधान नहीं, कन्वीनियंस चलता है।
नतीजा क्या है..?
ज़मानत वर्षों तक नहीं मिलती
ट्रायल सज़ा बन जाता है
गरीब के लिए कानून बोझ है और ताक़तवर के लिए हथियार क्या यही वह न्याय है, जिसकी कल्पना संविधान ने की थी..?
कॉलेजियम पर सबसे बड़ा सवाल
अगर जज वही बनेंगे—
जिनकी पहुँच है
जिनका सरनेम है,
जिनका नेटवर्क है,
तो फिर मेहनत, ईमानदारी और संविधान - निष्ठाक्ष का क्या मूल्य...?
आज देश का हर नौजवान वकील पूछ रहा है:
“अगर मैं ईमानदार हूँ, तो क्या मुझे जज बनने का हक़ नहीं..?”
खगड़िया से दिल्ली तक की पुकार
मैं खगड़िया से बोल रहा हूँ—
जहाँ न्याय की आख़िरी उम्मीद भी तारीख़ पर टिकी है।
जहाँ वकील काबिल हैं, पर सिस्टम उन्हें ऊपर नहीं जाने देता।
जहाँ अदालत है, पर न्याय दूर है।
अब चुप्पी अपराध है
पूर्व CJI का यह कथन आत्मस्वीकार है—
और आत्मस्वीकार के बाद सुधार अनिवार्य होता है।
हम मांग करते हैं:
जज चयन की पारदर्शी प्रक्रिया
योग्यता आधारित, न कि पहचान आधारित नियुक्ति
कॉलेजियम में जवाबदेही
हर वकील के लिए समान अवसर
अगर अब भी सुधार नहीं हुआ—
तो इतिहास लिखेगा:
भारत में न्याय मरा नहीं, मारा गया।
और उस हत्या में—
ख़ामोशी सबसे बड़ा हथियार थी।
📢 यह लेख किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ नहीं—
पूरे सिस्टम के ख़िलाफ़ चार्जशीट है।
अगर आपको लगता है कि न्याय ज़िंदा रहना चाहिए—
तो इस आवाज़ को दबने मत दीजिए।
क्योंकि जब अच्छे लोग जज नहीं बनते,
तो बुरे फ़ैसले देश की किस्मत बन जाते हैं। 


उपरोक्त आलेख वाट्सएप द्वारा संप्रेषित जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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