भैंस, पूँजी और सत्ता: भारत की व्यवस्था का नग्न सच — जो स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाता !” :मो. बैरम रकी

"भैंस, पूँजी और सत्ता: भारत की व्यवस्था का नग्न सच — जो स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाता !”

जनक्रांति कार्यालय से
एडवोकेट मो. बैरम रकी की रिपोर्ट

भैंस, पूँजी और सत्ता: भारत की व्यवस्था का नग्न सच

पटना, बिहार ( जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन न्यूज़ डेस्क, भारत )। दुनिया की हर व्यवस्था, हर विचारधारा, हर सत्ता—असल में “भैंस” की कहानी ही है।
हाँ, वही भैंस जिसे कभी पड़ोसी छीन लेता है, कभी पूँजीपति दूह लेता है, कभी नेता अपनी बता देता है, और कभी जनता उसकी पूँछ बनकर पूरी व्यवस्था को हिलाती है।
राजनीति, समाज, इतिहास, अर्थशास्त्र—सबकी जड़ में वही एक भैंस है।
जो इस भैंस को समझ ले, वह दुनिया की हर सत्ता का पेट खोल सकता है।
 सामंतवाद: भैंस छीनने का लाइसेंस
सामंतवाद क्या है.?
सीधा, साफ, नंगा सच—
 पड़ोसी लाठी लेकर आया और आपकी भैंस खोल ले गया।
ना पुलिस, ना कानून, ना इंसाफ—सिर्फ ताकत।
सत्ता = लाठी
हक = ताकत वाले का
यही दुनिया का पहला राजतंत्र था—भैंस छीनो, राज करो।
 पूँजीवाद: आपकी ही भैंस का दूध आपसे छीन लो
पूँजीवाद में भैंस आपकी होती है, पर दूध.?
दूध पूँजीपति के घर जाता है।
पड़ोसी लाठी तो नहीं लाता, पर आपकी भैंस का दूहा हुआ दूध उठा ले जाता है।
यह शोषण का आधुनिक विज्ञान है—
नाम “स्वतंत्र बाज़ार”, काम पूरा “लूटमार”।
 समाजवाद: आधी भैंस तुम्हारी, आधी मेरी
समाजवाद कहता है—
 अगर आपकी भैंस आज दूध न दे, तो पड़ोसी अपनी भैंस का आधा दूध आपको देगा।
और जब पड़ोसी की भैंस सूख जाए, तो आप उसका हक निभाएँगे।
यह शक्ति नहीं, समानता का सिद्धांत है।
 साम्यवाद: भैंस भी सामूहिक, दूध भी सामूहिक
साम्यवाद का मॉडल सरल है—
सारी भैंसें पूरे गाँव की।
सारा दूध पूरे गाँव का।
ना कोई पूँजीपति
ना कोई सामंती
ना कोई मालिक
सिर्फ मानव का सामूहिक अधिकार।
 वर्ग-संघर्ष: जब आप भी लाठी उठा लेते हैं.
जब वे आपकी भैंस ले जाएँ,
आपके विरोध पर आपकी ही भैंस दुह लें, आपकी मेहनत का दूध छीन लें—
और आप अपनी भैंस बचाने के लिए लाठी उठा लें,तो यही है—
वर्ग-संघर्ष
यानी शोषित बनाम शोषक
जनता बनाम पूँजी
मजदूर बनाम मालिक
 बुर्ज़ुआ: वही जो आपकी मेहनत पर ऐश करे..
वह जो—
आपकी गाय-भैंस ले ले
आपकी जमीन-जायदाद हड़प ले
आपको मज़दूर बना दे
आपकी मजदूरी पर खुद ऐय्याश बने
खुद कुछ न करे, मेहनत आप करें
वही है—
बुर्ज़ुआ — पूँजीवाद का असली लुटेरा।
वामपंथ बनाम दक्षिणपंथ — भैंस की असली राजनीति
दक्षिणपंथ:
जो आपकी भैंस को अपनी बताने लगे।
वामपंथ:
जो अपनी भैंस को अपनी और आपकी भैंस को आपकी माने।
राजनीति दो धाराओं में बंटी है—
एक मानववाद में, दूसरी ईश्वरवाद में।
एक समता में, दूसरी भेदभाव में।
 क्रांति: जब मजदूर “ना” कह दे
क्रांति तब होती है जब—
सब कुछ छीन लिया जाए
मजदूर को सिर्फ जिंदा रहने जितना मिले
और मजदूर एक दिन कह दे— “नहीं!”
जब मजदूर काम करने से इंकार कर देता है,
पूरी व्यवस्था ढह जाती है क्योंकि—
 शोषक की जिंदगी तो मजदूर की मेहनत पर ही टिकी है।
यही “क्रांति” है।
यही “आज़ादी” है।
मार्क्सवाद: जो कभी मर नहीं सकता
विचार मरते नहीं।
सत्ता मरती है, व्यवस्था बदलती है, साम्राज्य मिट जाते हैं—
पर विचार?
वे सिर्फ रूप बदलते हैं।
 मार्क्सवाद किसी नेता का भाषण नहीं—विज्ञान है।
तथ्य, प्रमाण, इतिहास—सब इसकी जड़ों में हैं।
पूँजीवाद की अंतिम चाल: सारी भैंसें एक के पास!
पूँजीवाद का आखिरी लक्ष्य है—
छोटी दुकानें बंद
छोटी फैक्टरियाँ खत्म
किसान खेत बेचकर मजदूर बन जाए
बाजार में सिर्फ एक “बड़ी मछली” बचे
आज यही हो रहा है—
माल, मॉल, कंपनियाँ, ऐप—
सब एक-एक कर बड़े पूँजीपतियों के पेट में जा रहे हैं।
 व्यवस्था: पानी में उतर चुकी भैंस
व्यवस्था भैंस की तरह है—
धीमी, शांत, भारी—
और कभी-कभी इतनी ताकतवर कि
 शेर को भी भगा दे।
राजनीतिज्ञ..?
सिर्फ कौए और बगुले—
भैंस के ऊपर बैठने वाले, दिशा बदलने वाले नहीं।
इतिहास: वह पानी जिसमें व्यवस्था उतरती है
कभी तेज, कभी शांत,
कभी गहरा, कभी उथला—
पर दिशा एक—
 समानता की ओर
साम्यवाद की ओर
मानव मुक्ति की ओर
जनता: असली पूँछ, असली ताकत
जनता वही पूँछ है जो—
कौवों-बगुलों को भगा देती है
नेता को जमीन दिखा देती है और जब उठकर खड़ी होती है. तो व्यवस्था गोबर करती है—
वही गोबर खेतों में खाद बनता है,
और उससे ही आती हैं—
 फसल
समृद्धि
शांति
नई व्यवस्था
निष्कर्ष — पूरी दुनिया के लिए एक संदेश
भैंस की लड़ाई समझो—
तो सत्ता की लड़ाई समझ जाओगे।
भैंस की राजनीति समझो—
तो दुनिया की राजनीति समझ जाओगे।
भैंस की पूँछ समझो—
तो जनता की ताकत भी समझ जाओगे।
आज दुनिया उसी मोड़ पर खड़ी है—
जहाँ भैंसें कुछ गिने-चुने लोगों के कब्जे में हैं,
और जनता सिर्फ दूध पीने की कतार में खड़ी है।
लेकिन याद रखो—
जब जनता की पूँछ उठती है, तो इतिहास बदलता है।
और वही दिन—
क्रांति का दिन होता है।
उपरोक्त आलेख जनक्रांति कार्यालय को व्हाट्सएप्प के माध्यम से संप्रेषित व प्रकाशन कार्यालय से प्रकाशक/ प्रधान सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकासित व प्रसारित।

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