महात्मा गाँधी का पुनर्जन्म : महात्मा गाँधी कौन थे उनकी पारिबारिक पृष्ठ भूमि क्या थी और वे कैसे महात्मा गाँधी से सम्बोधित हुए..?? जानिए

 .      महात्मा गाँधी का पुनर्जन्म   

महात्मा गाँधी कौन थे उनकी पारिबारिक पृष्ठ भूमि क्या थी और वे कैसे महात्मा गाँधी से सम्बोधित हुए..?? जानिए

           प्रमोद कुमार सिन्हा                 सम्मानित जे पी सेनानी बिहार सरकार ,    बाघी , बेगूसराय  ( बिहार  )। की कलम से संपादित आलेख

जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन कार्यालय न्यूज डेस्क,भारत   

  महात्मा गाँधी जिनका वास्तविक नाम मोहन दास करमचंद गाँधी था।

जहाँ एक ऒर पिछले जन्म में गाँधी जी बड़े ही कुलीन परिवार और प्रतिष्ठित तथा बड़े ही अमीर परिवार में जन्म लिये थे।                
वहीँ इस जन्म में गाँधी जी बड़े ही गरीब जन्म में पैदा हुए, जाती के ब्राह्मण हैँ और वास्तविक रूप से हरियाणा के निवासी हैँ इनके पिताजी श्री कन्हैया जी ब्राह्मण कुल में जन्म के बाबजूद हलवाई का काम करते थे।     
बाबाजी के नाम से प्रसिद्ध विजय वत्स है जो एक मेडिकल के स्टूडेंट थे।       
   ये बात कोरी - कल्पना नहीं सोलहो आने सच है की महात्मा गाँधी का पुनर्जन्म भारत जैसी पवित्र भूमि पर हो चुकी है जो अब एक प्रबुद्ध संत हैँ और भगवान के आदेश से पुनः इस भूमि को उद्धार हेतु कृत संकलपित हैँ।     आइये सबसे पहले हम महात्मा गाँधी को पूर्णरूपेण समझने का प्रयास करें              

वास्तव में इस बात को अच्छी तरह समझ लें की महात्मा गाँधी कौन थे। उनकी पारिबारिक पृष्ठ भूमि क्या थी  और वे कैसे महात्मा गाँधी से सम्बोधित हुए महात्मा टाइटल कैसे पड़ा और कौन से कर्म उन्होंने किया जिसके कारण मोहन दास से वे इतर हटकर महात्मा गाँधी का नाम से वे प्रसिद्धि के उच्चतम शिखर पर पहुँच गये।                             

महात्मा गाँधी जिनका वास्तविक नाम मोहन दास करमचंद गाँधी था और इनका जनम स्थान गुजरात प्रान्त के अनर्गत पोरबन्दर नामक स्थान में २अक्टूबर १८६९ ईस्वी को अत्यंत धनाढय परिवार में हुआ था जहाँ उनके पिता करमचंद गाँधी ( काबा गाँधी ) मुख्य रूप से पोरबन्दर रियासत के राजा के दीबान थे और बाद में वे राजकोट व विकानेर के भी दिवान रहे वे अपनी ईमानदारी कूटनीति और सिद्धांतों के लिये जाने जाते थे, वे अपने कर्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पित थे जिसके कारण उन्हें कईएक बार कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।  

    
पोरबन्दर रियासत में वे राजस्थानिक कोर्ट के सभासद राजकोट के दिवान थे बाद में कुछ समय तक वाकनेर के दिवान के उच्च पद पर प्रतिष्ठित थे।     
 महात्मा गाँधी की शिक्षा पोरबन्दर और राजकोट  ( गुजरात ) में शुरू हुई जहाँ उन्होंने पढ़ाई की और अलफ्रेंड हाई स्कूल से मैट्रिक किया फिर भावनगर के सामलदास काउलेज गये इसके बाद वे १८८८ में कानून की पढ़ाई के लिये लन्दन गये और यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन ( U C L )से वकालत की शिक्षा ली , जिसके बाद इनर टेम्पल से बैरिस्ट्री की डिग्री हासिल की और १८९१ में भारत लौटे, भारत लौटने के बाद वे वकालत मुंबई में शुरुआत की,                  

उन्हें असली पहचान और बड़ा काम दक्षिण अफ्रीका में मिला जहाँ वे एक सफल वकील बने।                                महात्मा गाँधी बिहार के चम्पारण जिले में नील की खेती करने बाले किसानों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ उनकी मदद करने और न्याय दिलाने के लिये आंदोलन की शुरुआत की जिसे चम्पारण सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है।                       

  मुख्य रूप से महात्मा गाँधी ने भारत की गरीबी और स्त्रियों और पुरुषों के तन पर अर्धनंग को देखते हुई गरीबों के साथ एकता दिखाने के लिये अपने कपड़े का त्याग इसलिये किया ताकी सबों के तन पर वस्त्र हो तथा ब्रिटिश कपड़ों का बहिष्कार स्वदेशी  ( खादी )को बढ़ाबा देने के लिये किया ताकी आधे कपड़े में जी रहे किसान को जबतक कपड़े नहीं तबतक ve भी अर्द्ध नग्न रहेंगे ये कदम उन्होंने २९२१ में दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान व चम्पारण के बाद किया है आज के नेताओं में इतनी हिम्मत और त्याग की भावना..?                                

 आज तो हमारे माननीय प्रधान मंत्री कहते हैँ अरे हम तो फकीर हैँ झोला उठाकर आये हैँ और झोला लेकर चले जायेंगे तो प्रश्न उठना स्वाभाबिक है की उनके तन पर दस दस लाख के सूट कैसे ? देश रसातल में चला जा रहा है और हमारे टैक्स के पैसे से बार बार विदेशी दौरे क्यों..? रुपये का अबमूल्यन डालर के मामले में सबसे निम्न स्तर पर कैसे..? कर्मचारियों का पेंशन और अनुकम्पा बन्द परन्तु नेताओं को दो दो चार चार पेंशन और सुबिधा कैसे और क्यों..? बैंक का बैंक का पैसा जो गरीबों का है दिवालिया क्यों..? बैंक से कर्ज लेकर और बैंक को दिवालिया बनाने बाले उद्योग पतियों को विदेश भागने का मौका क्यों? जिस नेताओं पर भ्र्ष्टाचार का गंभीर आरोप पुनः उच्च पद ( विधायक, सांसद, मंत्री ) का पद क्यों?                   

  गंभीर आरोप होने के बाद पुनः सत्ता पाने हेतु रेबड़ी देकर वह स्वच्छ कैसे? बार बार झूठ पर झूठ बोलकर जुमलेबाजी क्यों..? देश के गरीब जनता को कटोरे में भीख देकर  ( पाँच किलो अनाज और दस हज़ार रेबड़ी ) जो जनता का पैसा है उसे उस हालात में कर भीखमंगा बनाकर बार बार वोट लेने की मंशा क्यों ?                                         

 ताकि जनता भीखमंगा बना रहे और लालच देकर कटोरे पकड़ा कर लालच देने की मंशा क्यों ?है इसका जबाब किसी के पास ? ये सभी पार्टी और नेता ऐसा कर रहे हैं और जनता फ़टेहाल और बेहाल पार्टी और नेता मालामाल इस दशा का जिम्मेबार कौन ? संसद में गंभीरतम बिषय पर चर्चा ना कर ना ना विन्दुओं पर भटकाने की व्यवस्था क्यों..?  यारों जिस भ्रष्टाचार हेतु आपातकाल के विरुद्ध हम शरीखे छात्र जो जे पी आंदोलन में जेल गये आज ठगे हुए महसूस कर रहे हैँ विद्यार्थी जीवन का वह स्वर्णिम क्षण जेल की सीखचे में बिताने बाले के आँखो से अश्रुपात हो रहे हैँ दो - चार को छोड़कर सभी जार जार आंसून बहा रहे हैँ जिसका भुक्त भोगी मैं भी हूँ, जिस भ्र्ष्टाचार मिटाने हेतु हम जेल गये हमें भी घुस देने के लिये प्रत्येक विन्दु पर मजबूर होना पड़ रहा आखिर क्यों ? क्या जे पी समक्ष इसलिये हमने कश्म खायी थी ? जे पी सेनानी सम्मान योजना पाने बाले अपने हृदय पर हाथ रख कश्म खाकर बताबे क्या इसके लिये भी प्रत्येक टेबुल पर घुस देना पड़ा है या नहीं  ?                                         आज हम इस बिंदु पर इतनी कहानी लिखने के लिये बाध्य इसलिये हुए हैँ की आज महत्मा गाँधी का पुनर आगमन हो चुका है और देश की इस दुर्दशा पर भी वे चुप्पी साध परम मौन आनंदित जीवन जी रहे हैँ उन्हें उस अज्ञात विराट सृजनहार ने पुनः उठने के लिये अनुरोध और विनय पर वे तैयार हुए हैँ और ऐसी दशा में हम उनका साथ नहीं दिये तो देश और आनेबाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी , आखिर क्या कारण है अमेरिका के आगे हम नतमस्तक हैँ ? जरूर कोई ना कोई ऐसा भेद है जो शाशन सत्ता अमेरिका के आगे चुप्पी साध लिया है इस पर प्रत्येक शिक्षित नागरिक का कर्तव्य है इस पर आबाज उठाये तो आइये आज हम उस महात्मा गाँधी जो उस समय काफ़ी अमीरी मे पले आज वे विश्व के एकमात्र प्रबुद्ध संत हैँ जिनका नाम है  व  **** विजय वत्स **** आज पुनः धरती कृबानी माँग रही है आज वे भ्र्ष्टाचार मुक्त हेतु संकल्पित हैँ और आज हमने उन्हें साथ नहीं दिया तो जो हम भोग रहे हैँ इससे और अधिक नरकगामी होंगे उनके नेतृत्व में बिगुल बज चुका है वो चाहे तो यह कार्य उनके लिये बाएँ हाथ का कार्य है परन्तु वे चले जायेगें तब हमारा क्या होगा ? करना सिर्फ ये है हमें उनका साथ कदम दर कदम देना है बाकी कार्य वे स्वमेव ही कर लेंगें जैसे कृष्ण भगवान चाहते तो क्षनों में महाभारत खत्म कर सकते थे लेकिन वे सारथी बने कर्म उन्होंने अर्जुन से करवाया , आज हमें bhi वे अर्जुन बनने का मौका दे रहे हैँ ताकी आने बाली पीढ़ी कभी ये ना कहे वो तो भगवान थे इसलिये उन्होंने ऐसा किया, कर्तव्य पथ पर चलने हेतु अन्याय विरुद्ध आबाज उठाने हेतु सही मार्ग दिखाने हेतु ही वे हमारा साथ चाहते हैँ अर्जुन उन्हें मिल चुका है वे पूर्व मुख्य न्यायाधीश भारत जो एक दलित वर्ग से हैं उनका नाम है बी आर गवाई क्षमा कीजिये मोबाइल से गबई अब हुआ है जो नहीं हो रहा था।                     करना मात्र इतना है इस आंदोलन में हमें सिर्फ शरीक होना है ना तन देना ना धन देना ना समय देना है सिर्फ उनके बनाये बेबसाईट पर हमें फॉर्म फिल करना है नाम पता मोबाइल इ मेल इत्यादि इत्यादि और यह कार्य हमें मकर संक्रांति २०२६:तक ही करना है इतने कार्य से यह देश पुनः  """ सोने की चिड़िया  **- बन जयेगा बस इतना ही कार्य हमें अधिक से अधिक रूप में फॉर्म भरना है मात्र इति सा कार्य है आपके मोबाइल में जितने सम्पर्क में उन्हें ये मैसेज भेजना है जितना अधिक रूप से द्रुत गति से भ्र्ष्टाचार मुक्त होगा उसी गति से बेबसाईट का नाम है  www.थे golden sparrow. org अब आइये मैं उन संत का जीवन पर परिचय आपको करबा रहा हूँ :-------

बाबाजी के नाम से प्रसिद्ध विजय वत्स है जो एक मेडिकल के स्टूडेंट थे इनका पिता का नाम  श्री कन्हैया जी था जहाँ एक ऒर पिछले जन्म में  गाँधी जी बड़े ही कुलीन परिवार और प्रतिष्ठित तथा बड़े ही अमीर परिवार में जन्म लिये थे,,                       

 वहीँ इस जन्म में गाँधी जी बड़े ही गरीब जन्म में पैदा हुए, जाती के ब्राह्मण हैँ और वास्तविक रूप से हरियाणा के निवासी हैँ इनके पिताजी श्री कन्हैया जी ब्राह्मण कुल में जन्म के बाबजूद हलवाई का काम करते थे।
बाबाजी उर्फ़ विजय वत्स के पिता जी हरियाणा छोड़कर पंजाब प्रान्त के अंतर्गत भटिंडा से लगभग तीस किलोमीटर दुर गीदरबाहा में बस गये ,                            

 पुज्य श्री बाबाजी विजय वत्स का जन्म दिनांक ११ अगस्त १९५२ है, ये सात भाई बहन थे दो बहनें और पाँच भाई माता जी का नाम गंगा देवी था इनके पिता जी माता जी दोनों संत प्रकृति के थे और हलवाई यानी मिठाई का इनका दुकान प्रसिद्द था।          
मिठाई का दुकान होने के कारण बचपन इन्हें अपने सर पर दूध एबं हाथ में दूध लाना करीब आठ - दस किलोमीटर से लाना पड़ता है।              इनके पिताजी में आस्तिकता ईश्वर के प्रति इतनी अधिक थी की कोई नुकसान होने पर भी वे प्रभु की भलाई और कृपा ही समझते थे।                     एक बार अत्यधिक बारिश होने की वजह से इनका घर का छत गिर गया, उस समय बाबाजी समस्त भाई बहन बहुत छोटे थे, शुबह हुई तो इनके पिताजी लड्डू ले आये और गली में लड्डू बाँटने लगे, इस पर सभी लोग हैरान हुए और कहने लगे यह कोई खुशी का मौका है  जो आप लड्डू बाँट रहे हैँ आपके मकान का नुकसान हुआ और आप लड्डू बाँट रहे हैँ तो इनके पिताजी ने तपाक से जबाब दिया कि मौका तो खुशी का ही है यह क्या कम है मेरा सारा परिवार सही सलामत है प्रभु की अनन्त कृपा है की किसी को कोई चोट नहीं लगी।                           

इनके पिताजी पाँच भाई थे और सभी बहुत शांत और नम्र स्वभाव के थे पिताजी को कोई गाली भी निकाल देता तो वे शांत रहते और हाथ जोड़ लेते थे ।                           

बाबाजी विजय वत्स बड़े ही होनहार प्रखड़ और तेज विद्यार्थी अपने जीवन में रहे, इतना ही नहीं सभी शिक्षक इनसे इतना प्रभावित रहते थे की इनके शिक्षक छुट्टी पर या बीमार भी होते थे पुरे क्लास को पढ़ाने की जिम्मेबारी इनके सर ही होता था कॉलेज लाइफ में ये बड़े ही तीव्र तीक्ष्ण बुद्धि के थे प्रोफेसर इनको काफ़ी सम्मान और मानते थे ये मेडिकल के छात्र थे इनके सबसे बड़े भाई अमेरिका में बस गये वे एक डॉक्टर थे।       
इनके एक और भाई गीदरबाहा में ही गोल्ड मेडलिस्ट बच्चे के डॉक्टर थे ।         इनकी भी तमन्ना थी मैं एक अच्छा डॉ बनूं इनके कॉलेज में एक दिन भाषण प्रतियोगिता था और कॉलेज स्तर पर इनका चयन भाषण हेतु चयन किया गया, भाषण का विषय था ** साइंस एंड गॉड **          
विज्ञान का विद्यार्थी होने के कारण विज्ञान पर बोलना इन्हें अच्छी तरह आता था लेकिन गॉड को जाने बिना ये मानने को तैयार नहीं थे।                      प्रोफेसर ने गॉड पर भाषण लिखकर इन्हें दिया, साइंस पर इन्होने बहुत ही अच्छा भाषण दिया परन्तु गॉड पर ये लिखे होने के बाद भी भाषण के अतिरिक्त नकारात्मकता का प्रयोग किया यह प्रतियोगिता पूरेपंजाब प्रान्त से आये प्रतियोगी भाग लिये थे भाषण का समय था पाँच मिनट और ये साढ़े चार मिनट में ही भाषण समाप्त कर दिये इनके कॉलेज के प्रोफेसर इन्हें प्रथम पुरस्कार हेतु सेलेक्ट किया परन्तु निर्णायक मंडल जो बाहर से आये थे सबसे अच्छा भाषण बाबजूद भी कम समय में बोले जाने के कारण इन्हें दुतीय पुरस्कार दिया गया इस पर भी ये पुरस्कार लेकर खुशी खुशी अन्य विद्यार्थियों और कम उम्र की उच्चचिंखलता के कारण रोज चलती ट्रेन से उतरना और चढ़ना इनका दैनिक कार्य था।               
उस दिन भी ट्रेन से उतरना चाह रहे थे परन्तु ट्रेन की गति धीमी नहीं थी और ये पैदान पर बैठे थे इन्हें यह पता ही नहीं था प्लेटफॉर्म ऊँचा है जिससे इनका पैर कट जाता और प्राण पखेड़ू खतम हो जाता किसी ने जोड़ से आबाज लगाई विजय पैर ऊपर कर लो इन्होने नज़र इधर उधर दौड़ाया कोई दीख नहीं पड़ा तबतक प्लेटफॉर्म आ गया और किसी अदृश्य शक्ति इन्हें उठाकर प्लेटफार्म पर पटक दिया ये बदहबास हो गये कौन मुझे फेका किसी को इन्होने नहीं दिखा यहीं से इनके जीवन में बदलाव हो गया कॉलेज जाना बन्द दुकान जाना बन्द दिन रात यही सोचते की वह कौनसी शक्ति है जिसने मेरे जीवन को बचाया चूँकि भगवान नहीं होने पर इन्होने काफ़ी तालियां बटोरी थी।                   जीवन का सबसे अहम सवाल यहीं से उठ खड़ा हो गया और ये ना घर के ना घाट के हो गये कहीं इन्हें मन नहीं लगता था।        
अतएब पिताजी का आदेश लेकर ०३-०१-१९७३ को साधु बनने की इक्षा से घर छोड़कर ऋषिकेश की यात्रा पर निकल पड़े और टिकट चेकर jo एक काफ़ी लम्बा व्यक्ति उसकी लम्बाई ट्रेन की छत के बराबर थी उसने पकड़ लिया और लकसर जंक्शन पर ट्रेन से स्वं उतरा और इन्हें भी उतारा पूछा कहां जाना है इन्होने बताया हरिद्वार ऋषिकेश , फिर पूछा क्यों जाना है ? भगवान को पाना है, फिर पूछा घर सेपुछकर आये हो इन्होने कहा पिताजी से पूछा है वह प्लेटफॉर्म के एक कोने में ले गया अपना भेष बदल पूछा मुझे पहचानते हो  इन्होने कहा हाँ आप हनुमान जी हैँ सिर्फ आपको पूंछ नहीं है उन्होंने कहा पूंछ को मैंने छुपा रखा है तुम जिस उद्देश्य हेतु ऋषिकेश हरिद्वार जाना चाहते हो वहाँ कोई भी साधु नहीं हैँ सभी शैतान हैँ लौट जाओ जो तुम चाहते हो ओ तुम्हें घर पर ही मिल जायेगा और ना चाहते हुए भी इन्हें प्रकृति पुनः giderbaha ले आयी।                                                   भगवान शंकर का दर्शन और मार्ग निर्देशन में सन १९८५ शरद पूर्णिमा की रात को इन्हें बुद्धत्व की प्राप्ति हुई। "बून्द समानी समुद्र में सबने जानी , समुद्र समानी बून्द में हमने जानी"।

उपरोक्त आलेख वाट्सऐप माध्यम से जनक्रांति प्रकाशन कार्यालय को संप्रेषित व प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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