भूखे देश की सुनहरी संसद: 20 हज़ार करोड़ की इमारत या लोकतंत्र का आईना.? “जहाँ थाली खाली है, वहाँ तिजोरी क्यों चमक रही है.?”
भूखे देश की सुनहरी संसद: 20 हज़ार करोड़ की इमारत या लोकतंत्र का आईना.? “जहाँ थाली खाली है, वहाँ तिजोरी क्यों चमक रही है.?”
जनक्रांति कार्यालय से अधिवक्ता मोहम्मद बैरम रकी की रिपोर्ट
लेकिन जब देश का बड़ा हिस्सा
गरीबी की अदालत में खड़ा हो,
तो 20 हज़ार करोड़ की संसद
कटघरे में खड़ी हो जाती है।
इंडिया जनक्रांति न्यूज़ डेस्क, (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन कार्यालय न्यूज़ डेस्क 16 जनवरी, 2026)। भूखे देश की सुनहरी संसद: 20 हज़ार करोड़ की इमारत या लोकतंत्र का आईना.?
“जहाँ थाली खाली है, वहाँ तिजोरी क्यों चमक रही है.?” भारत एक ऐसा देश जहाँ करोड़ों लोगआज भी रोटी, रोज़गार और इलाज के लिए जूझ रहे हैं, जहाँ किसान कर्ज़ में दबकर जान दे देता है, जहाँ छात्र सपनों के साथ सड़कों पर भटकते हैं, जहाँ अस्पताल में बेड नहीं,
वहीं 20 हज़ार करोड़ रुपये की संसद खड़ी कर दी जाती है।
यह सिर्फ़ एक इमारत नहीं है।
यह प्राथमिकताओं का बयान है।
यह बताती है कि इस देश में
पत्थर की कीमत आदमी से ज़्यादा हो चुकी है।
लोकतंत्र का मंदिर
अगर जनता की तकलीफ़ों से ऊँचा बन जाए, तो वह मंदिर नहीं—
शर्म की मीनार बन जाता है।
सवाल सीधा है—
गरीब का पेट भरता है?
क्या संगमरमर से
किसान की आत्महत्या रुकती है?
क्या सोने-चाँदी की सजावट से
बेरोज़गार को नौकरी मिलती है?
जब देश के गाँवों में
आज भी पानी के लिए औरतें मीलों चलती हैं,
किसकी सहमति से हुआ?
यह खर्च नहीं—यह संदेश है
संदेश यह कि
जनता की आवाज़ से ज़्यादा
इमारत की चमक ज़रूरी है।
संदेश यह कि वोट पाँच साल के लिए चाहिए,लेकिन जवाबदेही हमेशा के लिए नहीं।लोकतंत्र का असली सौंदर्य
दीवारों में नहीं,नीतियों में होता है।
और जब नीतियाँ गरीब को हाशिये पर धकेल दें, तो सबसे महंगी संसद भी
सबसे सस्ती राजनीति का सबूत बन जाती है।
दुनिया देख रही है-
आज यह सवाल सिर्फ़ भारत का नहीं
पूरी दुनिया पूछ रही है:
क्या विकास का मतलब दिखावा है?
क्या राष्ट्र निर्माण ईंट-पत्थर से होता है,
या इंसान से?
अगर देश अमीर होता,
अगर हर नागरिक सुरक्षित होता,
अगर शिक्षा-स्वास्थ्य सबके लिए सुलभ होता—
तब भव्य संसद गर्व का विषय होती।
लेकिन जब देश का बड़ा हिस्सा
गरीबी की अदालत में खड़ा हो,
तो 20 हज़ार करोड़ की संसद
कटघरे में खड़ी हो जाती है।
आख़िरी बात
लोकतंत्र की ताक़त
उसकी इमारत में नहीं,
उसकी नीतिगत नैतिकता में होती है।
और जिस दिन
इमारत जनता से बड़ी हो जाए,
समझ लीजिए—
लोकतंत्र छोटा पड़ गया है।
आज सवाल यह नहीं कि
संसद कितनी सुंदर है—
सवाल यह है कि
क्या संसद गरीब की है.?
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

Comments