"एक देश–एक न्याय क्यों नहीं? 25 हाईकोर्ट, सैकड़ों राय और बिखरता इंसाफ — CJI जस्टिस सूर्यकांत का बयान या न्यायिक व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल!”
"एक देश–एक न्याय क्यों नहीं? 25 हाईकोर्ट, सैकड़ों राय और बिखरता इंसाफ — CJI जस्टिस सूर्यकांत का बयान या न्यायिक व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल!”
जनक्रांति कार्यालय से अधिवक्ता मोहम्मद बैरम रकी की रिपोर्ट
👉 “Judicial Discipline” बिना “Judicial Policy” के असंभव है।
क्या वकील आज कानून नहीं, “बेंच का मिज़ाज” पढ़ने को मजबूर नहीं है.?
क्या सुप्रीम कोर्ट सिर्फ़ अपील कोर्ट बनकर रह गया है..? क्या अब वक्त नहीं आ गया कि न्याय को भी “एक राष्ट्र–एक नीति” मिले.?
जनक्रांति न्यूज़ डेस्क, इंडिया ( जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन कार्यालय खगड़िया, बिहार 7 जनवरी, 2026)। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन न्याय के मामले में क्या हम अब भी एक देश हैं.?
“देश में 25 हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की तमाम बेंच अलग-अलग तरह से बोलती हैं, इसलिए एक समान नेशनल ज्यूडिशियल पॉलिसी की जरूरत है”
तो यह सिर्फ़ एक बयान नहीं, बल्कि भारतीय न्यायपालिका के भीतर चल रहे सबसे बड़े विरोधाभास पर चोट है।
⚖️ 25 हाईकोर्ट, 25 सोच, 25 इंसाफ.?
आज भारत में:
एक ही कानून है
एक ही संविधान है
एक ही सुप्रीम कोर्ट है
फिर सवाल उठता है —
🫱 एक ही मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट कुछ और कहे, पटना हाईकोर्ट कुछ और, मद्रास हाईकोर्ट बिल्कुल उल्टा बोले — तो आम नागरिक किसे माने.?
क्या इंसाफ अब पिन कोड देखकर मिलेगा.?
क्या न्याय का मतलब अब यह है कि आप किस राज्य में पैदा हुए, उसी से आपका हक तय होगा.?
आज स्थिति यह है कि किसी राज्य में जमानत अधिकार है तो किसी राज्य में वही जमानत अपराध मानी जाती है
कहीं FIR पर तुरंत रोक कहीं उसी FIR पर सालों तक जेल।
यह कानून का मतभेद नहीं,
यह न्याय का विखंडन (Fragmentation of Justice) है।
और यही वजह है कि आज भारत का आम आदमी अदालत से डरता है, उम्मीद नहीं करता।
CJI का बयान एक संकेत है कि अब न्यायपालिका खुद मान रही है:
👉 “Judicial Discipline” बिना “Judicial Policy” के असंभव है।
एक National Judicial Policy का मतलब होगा:
✔️ समान कानून की समान व्याख्या
✔️ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में तालमेल
✔️ आम नागरिक को पूर्वानुमेय (Predictable) इंसाफ
✔️ जज-आधारित नहीं, संविधान-आधारित न्याय
⚠️ सवाल जो पूरे देश को झकझोरते हैं
क्या न्यायाधीशों की व्यक्तिगत सोच, संविधान से ऊपर हो सकती है.?
क्या एक गरीब व्यक्ति को न्याय पाने के लिए राज्य बदलना पड़े.?
क्या वकील आज कानून नहीं, “बेंच का मिज़ाज” पढ़ने को मजबूर नहीं है.?
क्या सुप्रीम कोर्ट सिर्फ़ अपील कोर्ट बनकर रह गया है..?
🩸 न्याय बिखरा तो लोकतंत्र मरा
अगर न्याय एक जैसा नहीं होगा,
तो अधिकार भी एक जैसे नहीं होंगे।
और जब अधिकार एक जैसे नहीं होंगे,
तो लोकतंत्र सिर्फ़ किताबों में बचेगा।
नेशनल ज्यूडिशियल पॉलिसी कोई प्रशासनिक सुधार नहीं,
यह भारत के लोकतंत्र को बचाने की आख़िरी चेतावनी है।
✊ निष्कर्ष:
CJI जस्टिस सूर्यकांत का बयान इतिहास में दर्ज होगा —
या तो यह बयान न्यायिक सुधार की शुरुआत बनेगा,
या फिर आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी:
“जब न्याय बिखर रहा था, तब अदालतें चुप क्यों थीं?”
अब फैसला सिर्फ़ न्यायपालिका का नहीं, पूरे देश का है।

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