जिन्दगी..... एक रिस्क है
जिन्दगी..... एक रिस्क
ज़िन्दगी एक रिस्क है: सुबह राजगद्दी थी, शाम को जंगल—यही है असली भारत की सच्चाई
जनक्रांति कार्यालय से मोहम्मद बैरम रकी की आलेख
जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन न्यूज डेस्क, भारत। ज़िन्दगी कोई गारंटी नहीं, एक खुला जुआ है।
यहाँ सुबह जिस इंसान के हाथ में ताज दिखता है, शाम तक उसके हिस्से में तिरस्कार, अकेलापन और जंगल आ जाता है।
यही तो कहती है यह पंक्ति—
“ज़िन्दगी एक रिस्क है, सुबह राजगद्दी मिलना था—मिल गया जंगल।”
यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, आज के भारत की आत्मा की चीख है।
राजगद्दी का सपना और जंगल की हकीकत..
लेकिन सिस्टम, साजिश, राजनीति, बेरोज़गारी और रिश्तों की बेवफाई—
सब मिलकर कई बार उसे उस जंगल में छोड़ देते हैं,
जहाँ न कानून साथ देता है, न इंसाफ।
आज का युवा डिग्री लेकर निकला था राजगद्दी की उम्मीद में,
लेकिन उसे मिला—
✔ बेरोज़गारी का जंगल
✔ नशे का जंगल
✔ अपराध का जंगल
✔ मानसिक तनाव का जंगल
यह कहानी सिर्फ भारत की नहीं, पूरी दुनिया की है।
अफ्रीका से एशिया तक, यूरोप से अमेरिका तक—
हर जगह मेहनतकश इंसान को यही सिखाया जाता है:
“सब्र रखो, कल तुम्हारा दिन आएगा।”
लेकिन सच्चाई यह है कि
कई बार कल आता ही नहीं,
और इंसान जंगल में भटकता रह जाता है।
सिस्टम की सबसे बड़ी क्रूरता
सबसे खतरनाक बात यह नहीं कि जंगल मिला,बल्कि यह है कि राजगद्दी का सपना दिखाकर जंगल में धकेल दिया गया।
यह शिक्षा व्यवस्था की हार है,
यह राजनीति की बेईमानी है,
यह समाज की बेरुखी है।
अब सवाल यह नहीं कि रिस्क क्यों है
सवाल यह है कि—
क्या हम चुपचाप जंगल स्वीकार कर लेंगे.?
या फिर उस जंगल को ही बदलकर
इंसाफ़ का महल बनाएँगे.?
क्योंकि इतिहास गवाह है—
जंगल से ही निकले हैं
✔ राम
✔ बुद्ध
✔ बिरसा मुंडा
✔ भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी विचार
निष्कर्ष
ज़िन्दगी सच में एक रिस्क है,???
लेकिन अगर सुबह राजगद्दी नहीं मिली और जंगल मिला है—
तो याद रखना,
यही जंगल कल का इतिहास बदलेगा।

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