भारत बचाओ आंदोलन: एक आह्वानयह किसी दल के ख़िलाफ़ नहीं—कुप्रबंधन के ख़िलाफ़ आंदोलन है : मोहम्मद बैरम रकी

"टैक्स का ताज किसके सिर..? जनता की रोटी या नेताओं की रईसी — भारत के विवेक से सीधा सवाल”

जनक्रांति कार्यालय से एडवोकेट मोहम्मद बैरम रकी की रिपोर्ट

भारत बचाओ आंदोलन: एक आह्वान
यह किसी दल के ख़िलाफ़ नहीं—कुप्रबंधन के ख़िलाफ़ आंदोलन है।

जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन न्यूज़ डेस्क, भारत )। "टैक्स का ताज किसके सिर..? जनता की रोटी या नेताओं की रईसी — भारत के विवेक से सीधा सवाल” हम टैक्स क्यों देते हैं..?
क्या इसलिए कि सड़कों पर लाल-नीली बत्तियों वाले आलीशान काफ़िले और बढ़ें,या इसलिए कि स्कूलों में किताबें हों, अस्पतालों में दवाइयाँ हों, और गाँवों में पानी पहुँचे..?
आज भारत के हर नागरिक के मन में यही प्रश्न धड़क रहा है—
एक तरफ़ जनता की मेहनत की कमाई, दूसरी तरफ़ सत्ता की बेतहाशा सुविधा।
यही अंतर, यही असमानता—हमारी प्रगति की सबसे बड़ी बाधा बन चुकी है।
काफ़िले बनाम कक्षाएँ ज़हाँ एक ओर नेताओं की सुरक्षा में दर्जनों गाड़ियाँ, विशेष विमान, विशेष बंगले और विशेष अधिकार हैं, वहीं दूसरी ओर— स्कूलों में शिक्षक नहीं,अस्पतालों में डॉक्टर नहीं,
और गाँवों में न सड़क, न नाली, न इलाज।
क्या यही “विकास” है..?
अगर विकास का अर्थ कुछ चुनिंदा लोगों की सुविधा है, तो यह विकास नहीं—लोकतंत्र का अपहरण है।
टैक्स: अधिकार या खैरात.?
टैक्स कोई खैरात नहीं—यह जनता का अधिकार है।
यह पैसा किसी मंत्री की शान नहीं, देश की जान है।
जब टैक्स का बड़ा हिस्सा प्रोटोकॉल, विलास और प्रचार में उड़ जाए,
तो शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार केवल नारे बनकर रह जाते हैं।
जवाबदेही का समय अब समय आ गया है कि हम पूछें— हर मंत्रालय के खर्च का सार्वजनिक ऑडिट क्यों नहीं.?
जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं की सीमा तय क्यों नहीं.? स्कूल और अस्पतालों को पहली प्राथमिकता क्यों नहीं.?
लोकतंत्र में सवाल अपराध नहीं—कर्तव्य होता है।
जो सत्ता सवालों से डरती है, वह जनता की नहीं—अपने विशेषाधिकारों की रखवाली करती है।
भारत बचाओ आंदोलन: एक आह्वान
यह किसी दल के ख़िलाफ़ नहीं—कुप्रबंधन के ख़िलाफ़ आंदोलन है।
यह किसी व्यक्ति के विरोध में नहीं—व्यवस्था की जवाबदेही के लिए आंदोलन है।
आइए, एक स्वर में कहें— हम टैक्स देंगे, लेकिन हिसाब भी माँगेंगे।
हम वोट देंगे, लेकिन जवाबदेही भी तय करेंगे।
हम चुप रहेंगे नहीं—क्योंकि चुप्पी ही सबसे महँगा टैक्स है।
आज नहीं तो कब.?
हम नहीं तो कौन.?
उपरोक्त आलेख वाट्सऐप माध्यम से जनक्रांति प्रकाशन कार्यालय को सम्प्रेषित व प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रसारित व प्रसारित।

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