"जिनके पसीने से देश चलता है, वही नागरिक क्यों नहीं माने जाते.?—भारत की जातिगत अर्थव्यवस्था का नंगा सच”

"जिनके पसीने से देश चलता है, वही नागरिक क्यों नहीं माने जाते.?—भारत की जातिगत अर्थव्यवस्था का नंगा सच”

जनक्रांति कार्यालय से एडवोकेट मोहम्मद बैरम रकी की रिपोर्ट

भारत का सबसे बड़ा झूठ: “सबका साथ, सबका विकास”

जनक्रांति न्यूज़ डेस्क,इंडिया (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन कार्यालय 6 जनवरी, 2026)। भारत का सबसे बड़ा झूठ: “सबका साथ, सबका विकास”
यह देश अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है,
लेकिन इसके 52 प्रतिशत दलित आज भी भूमिहीन हैं।
यह कोई आँकड़ा नहीं — यह एक सदियों पुरानी साज़िश का दस्तावेज़ है।
यह देश आरक्षण पर बहस करता है,
लेकिन 25 लाख से अधिक आरक्षित पदों को ‘Not Found Suitable (NFS)’ कहकर बैकलॉग में डाल देता है।
सवाल यह नहीं है कि “योग्य कौन है?”
सवाल यह है कि योग्यता तय कौन करता है और किसके लिए?
🔥 स्पेशल कॉम्पोनेंट प्लान (SCP): काग़ज़ों में न्याय, ज़मीन पर शून्य
दलितों और आदिवासियों के नाम पर
देश, राज्य और ज़िले में जो स्पेशल कॉम्पोनेंट प्लान (SCP) बनता है —
उसका 10 प्रतिशत भी ज़मीन पर नहीं उतरता।
यह लापरवाही नहीं,
यह संस्थागत लूट है।
🔥आरक्षण: कभी लागू नहीं हुआ, फिर भी सबसे ज़्यादा बदनाम
आरक्षण को लेकर
देश में हमेशा भ्रम, झूठ और नफ़रत फैलाई गई,
लेकिन आज तक आरक्षण पारदर्शी ढंग से लागू ही नहीं हुआ।
दलित–आदिवासी आबादी का बड़ा हिस्सा
आज भी न्यूनतम आर्थिक आधार से वंचित है।
मानवीय जीवन के जो मानक होने चाहिए —
उनके आसपास भी कोई व्यवस्था नहीं।
और दूसरी ओर?
अधिकतम आय की कोई सीमा नहीं, कोई पारदर्शिता नहीं।
🔥आधा बजट धर्म में, लाभार्थी शून्य
यह देश हर साल
आधा बजट, आधे संसाधन धार्मिक क्रियाकलापों में खर्च करता है,
लेकिन पूछिए —
➡️ कौन सा दलित इसका लाभार्थी है?
➡️ किस आदिवासी का जीवन बदला?
➡️ किस महिला को सत्ता मिली?
धर्म के नाम पर संस्थाएँ खड़ी हुईं,
लेकिन इंसान ग़ायब रहा।
.   देश और राज्य का तीसरा विकल्प

🔥 टेंडर, व्यापार, उद्योग — दलित कहाँ हैं.?
किसी बड़े टेंडर में
किसी बड़े उद्योग में
किसी बड़े व्यापारिक निर्णय में —
❌ दलित
❌ आदिवासी
❌ महिलाएँ
❌ पिछड़े
कहीं कोई हस्तक्षेप नहीं।
यह संयोग नहीं,
यह सोची-समझी व्यवस्था है।
🔥 मंदिर, संस्थान, संस्कृति — 100% कब्ज़ा
देश के शत-प्रतिशत मंदिर,
धार्मिक संस्थान,
संस्कृतिक प्रतिष्ठान —
➡️ क्या वहाँ दलित का प्रतिनिधित्व है?
➡️ क्या आदिवासी की आवाज़ है?
➡️ क्या महिला निर्णायक भूमिका में है?
उत्तर एक ही है — नहीं।
.          नववर्ष मंगलमय हो
🔥 शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग — 90% आबादी बाहर
बड़े स्कूल,
बड़े अस्पताल,
बड़े उद्योग —
देश की लगभग 90 प्रतिशत जातिगत आबादी
इनसे वंचित है।
और यह कारण
न तो सामान्य है
न ही स्वाभाविक।
यह सत्ता, जाति और पूँजी की त्रिवेणी है।
🔥 सबसे बड़ा विरोधाभास: देश चलता किससे है?
कड़वा सत्य यह है कि —
👉 देश की 99 प्रतिशत व्यवस्था
दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के श्रम से चल रही है।
रेल चले — उनका पसीना
सड़क बने — उनका पसीना
खेती हो — उनका पसीना
सफ़ाई हो — उनका पसीना
लेकिन सत्ता, सम्मान और संसाधन.?
वहाँ उनका नाम तक नहीं।
🔥 जब तक विमर्श नहीं, तब तक विकास असंभव
जब तक इन सवालों पर
ईमानदार विमर्श नहीं होगा,
तब तक —
❌ सर्वांगीण विकास असंभव है
❌ समानता एक नारा है
❌ एकता एक छलावा है
❌ बंधुत्व महज़ शब्द है
अब सवाल यह नहीं कि
“समस्या है या नहीं?”
अब सवाल यह है कि —
इस पर संज्ञान कौन लेगा?
और कब?
🔥 यह लेख चेतावनी है, याचना नहीं
यह लेख
किसी जाति के ख़िलाफ़ नहीं,
बल्कि जातिगत अन्याय की व्यवस्था के ख़िलाफ़ है।
अगर भारत को सच में
लोकतांत्रिक, समतामूलक और मानवीय बनाना है —
तो इस सच से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता।
🔥यह लेख पढ़िए, साझा कीजिए — क्योंकि चुप्पी भी अब अपराध है।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रकाशन कार्यालय से मोहम्मद बैरम रकी की रिपोर्ट प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

Comments