"जब गधे सत्ता में हों और शेर सफ़ाई दे रहा हो—तभी समझिए कलयुग ज़िंदा है!”
"जब गधे सत्ता में हों और शेर सफ़ाई दे रहा हो—तभी समझिए कलयुग ज़िंदा है!”
जनक्रान्ति कार्यालय से अधिवक्ता मोहम्मद बैरम रकी की रिपोर्ट
कलयुग अब भर्ती बोर्ड, चुनाव आयोग, न्यायालय की सीढ़ियाँ, थाने की चौखट और दफ़्तर की कुर्सी बन चुका है।
जहाँ शेर सवाल पूछे तो उसे देशद्रोही कहा जाता है और बकरी मंच से भाषण दे तो उसे नेता मान लिया जाता है.
जनक्रांति न्यूज डेस्क,खगड़िया, बिहार, इंडिया(जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन कार्यालय 7 जनवरी, 2026)। एक सवाल, एक जवाब और पूरी व्यवस्था बेनकाब कक्षा में शिक्षक ने मासूम-सा सवाल पूछा—
“कलयुग किसे कहते हैं.?”
छात्र ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया—
😄 “सर, जब गधे घोड़ों पर, बिल्ली कुत्तों पर और बकरी शेरों पर राज करने लगे—तो समझ लीजिए, कलयुग आ चुका है।”
लेकिन असली सवाल यह है—क्या यह सिर्फ़ मज़ाक था.?
या फिर यह हमारे समय का सबसे सटीक राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक विश्लेषण.?
कलयुग: कोई धर्मग्रंथ नहीं, रोज़ का अनुभव
कलयुग अब किताबों का अध्याय नहीं रहा।
कलयुग अब भर्ती बोर्ड, चुनाव आयोग, न्यायालय की सीढ़ियाँ, थाने की चौखट और दफ़्तर की कुर्सी बन चुका है।
जहाँ योग्यता हार जाती है और चापलूसी जीत जाती है.
जहाँ ईमानदार लाइन में खड़ा रहता है और चालाक कुर्सी पर बैठ जाता है
जहाँ शेर सवाल पूछे तो उसे देशद्रोही कहा जाता है और बकरी मंच से भाषण दे तो उसे नेता मान लिया जाता है, जब गधे घोड़े बन जाएँ।
👉 इंटरव्यू में फेल
👉 फाइलों में दबे
👉 सिस्टम से बाहर
और दूसरी ओर—
डिग्री नकली, आत्मविश्वास ज़ोरदार
भाषा खोखली, इरादे खतरनाक
सत्ता में प्रवेश आसान
यही तो कलयुग है।
जब बिल्ली चौकीदार बने
कलयुग तब नहीं आता जब चोरी होती है, कलयुग तब आता है जब चोर ही चौकीदार बन जाए
और ईमानदार को समझाया जाए—
जब बकरी शेर पर राज करे
यह पंक्ति सबसे खतरनाक है।
क्योंकि यहाँ बकरी का मतलब जानवर नहीं—
यह उस सोच का प्रतीक है जो डर से पैदा हुई सत्ता को चलाती है।
जब नेतृत्व रीढ़हीन हो,
और जब आवाज़ उठाने वाला ही अपराधी बना दिया जाए— तो शेर भी पिंजरे में और बकरी सिंहासन पर बैठ जाती है।
यह छात्र शायद नहीं जानता था कि उसका जवाब
👉 राजनीतिक विश्लेषण बन जाएगा
👉 सामाजिक व्यंग्य बन जाएगा
👉 और पूरे राष्ट्र का एक्स-रे बन जाएगा
क्योंकि आज सबसे बड़ा संकट गरीबी नहीं,
सबसे बड़ा संकट बेरोज़गारी नहीं,
सबसे बड़ा संकट यह है कि
अयोग्यता को योग्यता का दर्जा मिल गया है।
अगर यह कलयुग नहीं है,
तो फिर कलयुग कैसा होता है?
जब सवाल पूछने वाले बच्चे भी
सच को मज़ाक में कहने लगें—
तो समझ लीजिए,
कलयुग सिर्फ़ आया नहीं है,
वह संस्थागत हो चुका है।
😄✊
हँसिए ज़रूर,
लेकिन सोचिए भी—
क्योंकि अगली पीढ़ी
हमसे जवाब माँगेगी।

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