चोटी, दाढ़ी और सत्ता : नज़रुल की चेतावनी को समझिए ओवैसी–योगी के दौर में - जब धर्म पहचान बने और इंसान गुम हो जाए
चोटी, दाढ़ी और सत्ता : नज़रुल की चेतावनी को समझिए ओवैसी–योगी के दौर में - जब धर्म पहचान बने और इंसान गुम हो जाए
जनक्रांति कार्यालय से अधिवक्ता मोहम्मद बैरम रकी की रिपोर्ट
पंडि–मुल्ला की राजनीति से मुक्ति चाहिए— तभी लोकतंत्र बचेगा,
पटना, बिहार (जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन न्यूज डेस्क, खगड़िया, बिहार 10 जनवरी, 2026)। एक समय था जब एक मशहूर, मगर बाग़ी कवि ने कहा था।
“मैं हिंदुओं और मुसलमानों को बर्दाश्त कर सकता हूँ, लेकिन चोटी और दाढ़ी वालों को नहीं।”
यह पंक्ति काज़ी नज़रुल इस्लाम की है,
और यह किसी धर्म से नफ़रत नहीं,
धर्म के ठेकेदारों से घोर असहमति है।
नज़रुल जानते थे कि चोटी हिंदू नहीं, पंडित की निशानी है,और दाढ़ी मुस्लिम नहीं, मुल्ला की पहचान है।
आज का भारत : ओवैसी बनाम योगी नहीं, असल में एक ही सिक्के के दो पहलू असदुद्दीन ओवैसी और योगी आदित्यनाथ—
देखने में विपरीत,
लेकिन राजनीति में आश्चर्यजनक रूप से समान।
दोनों विशुद्ध राजनीतिक प्राणी हैं
दोनों का पहनावा भी सांकेतिक, साम्प्रदायिक और संदेशवाहक है
दोनों की भाषा अक्सर अपने-अपने समुदाय को खुश करने वाली है
दोनों सार्वजनिक रूप से संविधान का सहारा लेते हैं,लेकिन दिल के किसी कोने में एक तरफ़ मनुस्मृति और दूसरी तरफ़ शरीयत चुपचाप विराजमान रहती है।
वे कहते नहीं—
लेकिन करते सब कुछ उसी दिशा में हैं।
सवाल यह नहीं कि कौन ज़्यादा ख़तरनाक है।
सवाल यह है कि कौन लोकतंत्र को ज़्यादा छल रहा है अगर ओवैसी सच में लोकतांत्रिक नेता हैं,तो उन्हें यह कहने का साहस दिखाना चाहिए—
“इस देश की प्रधानमंत्री एक दिन मुस्लिम भी बनेगी।”
ठीक वैसे ही जैसे मैं मानता हूँ—
“इस देश की प्रधानमंत्री एक दिन दलित महिला या पुरुष भी बनेगी।”
लेकिन यह सपना तभी संभव है
जब राजनीति पहचान से ऊपर उठे।
सच यह है—
अगर राजनीति का भविष्य—
हिजाब,नक़ाब,ओढ़नी, घूंघट में क़ैद रहेगा, तो यक़ीन मानिए—
यह देश कभी उस मुक़ाम तक नहीं पहुँचेगा।
विचारों से जीती जाती है।
धर्म निजी हो सकता है, सत्ता नहीं
जिस दिन—
नेता धर्म को अपने घर में रखे
और संविधान को संसद में
उसी दिन—
मुस्लिम भी प्रधानमंत्री बनेगा
दलित भी सर्वोच्च पद पर बैठेगा
और हिंदू भी सुरक्षित महसूस करेगा
लेकिन जब तक—
नेता धर्म का झंडा उठाकर वोट माँगेगा
और संविधान को भाषणों तक सीमित रखेगा।
नज़रुल आज होते तो क्या कहते.?
शायद वही जो उन्होंने तब कहा था—
“मुझे धर्म नहीं,
धर्म की दलाली से समस्या है।”
अंतिम पंक्ति (जो सोच बदल दे)
“इस देश को हिंदू–मुस्लिम नहीं,
पंडित–मुल्ला की राजनीति से मुक्ति चाहिए—
तभी लोकतंत्र बचेगा,
वरना सत्ता बस कपड़े बदलती रहेगी।”
✊ यह लेख किसी के ख़िलाफ़ नहीं—
🧠 यह लेख सोच के पक्ष में है।
📢 इसे पढ़िए, बहस कीजिए, फैलाइए।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा अधिवक्ता मोहम्मद बैरम रकी की रिपोर्ट प्रकाशित व प्रसारित।

Comments