जयंती विशेष: नेताजी सुभाष चन्द्र बोस आजाद हिन्द फौज़
जयंती विशेष: नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
आजाद हिन्द फौज़
राष्ट्रीय सलाहकार
भारतीय राष्ट्रीय फारवर्ड ब्लाँक
इंडिया न्यूज डेस्क, (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन कार्यालय न्यूज डेस्क 23 जनवरी, 2026)। साम्राज्यवादी ब्रिटेन की गुलामी से मुक्ति के लिए भारत के भीतर और बाहर चला संघर्ष का वह दौर, जिसमें नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की भूमिका प्रमुख रही, स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास का स्वर्णाक्षरों में लिखा जाने वाला अध्याय है।
1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाने के बाद सुभाष ने साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष की जो दिशा तय की उसमें महात्मा गांधी और पं. जवाहरलाल नेहरू सबसे बड़ा रोड़ा बन गए थे। 1939 में त्रिपुरी (जबलपुर) में हुए कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गांधी ने पट्टाभि सीतारमैया को अपने प्रतिनिधि के रूप में सुभाष के विरूद्ध चुनाव में उतारा और घोषणा कर दी कि पट्टाभि की हार उनकी हार होगी। इसके बावजूद सुभाष चुनाव जीत गए। गांधीवादियों ने गोविंद वल्लभ पंत के माध्यम से एक प्रस्ताव रखा कि चुनाव हार चुके गांधीजी द्वारा ही कार्यसमिति का गठन होगा ! इसके बाद गांधीजी ने कार्यसमिति नहीं बनने दी और सुभाष ने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देकर कांग्रेस के भीतर ही फारवर्ड ब्लाक का गठन कर लिया। ब्रिटिश हुकूमत की इच्छानुसार काम करते हुए गांधीजी ने सुभाष को कांग्रेस पार्टी से निष्कासित करवा दिया। गांधी और नेहरू को नेता बनाकर ब्रिटिश हुकूमत भारत के स्वाधीनता आंदोलन को अपने हित में चलवाने लगी।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय नागरिकों की ब्रिटिश सेना में भरती करवाने में गांधीजी सक्रिय थे, जबकि सुभाष की मान्यता थी कि इस अवसर का लाभ उठाते हुए भारत की आजादी हेतु ब्रिटिश शासन को अल्टीमेटम दे दिया जाये।
सुभाष ने कहा - ‘‘किसी महात्मा को तो क्या, प्रत्यक्ष परमात्मा को भी मैं राष्ट्र से बड़ा नहीं मानता। यह समय अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का है, न कि समझौते का’’। गांधीजी ने कहा - ‘‘अंग्रेज भले हैं, उनकी परेशानी से लाभ उठाना नैतिक नहीं है’’। सुभाष ने कहा - ‘‘अंग्रेज की विपत्ति हमारे लिए अवसर है’’। सुभाष चन्द्र बोस को गिरफ्तार कर कलकत्ता जेल में रखा गया। वहां आमरण अनशन करने पर उन्हें उनके एल्गिन रोड स्थित निवास पर नज़रबंद किया गया। ब्रिटिश हुकूमत को चकमा देकर 16 जनवरी, 1941 को वे अफगानिस्तान होते हुए जापान पहुंच गये। रास बिहारी बोस द्वारा गठित आजाद हिंद फौज की कमान सिंगापुर में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को सौंप दी गई।
9 जुलाई, 1943 को सिंगापुर की जनसभा में दिए अपने भाषण में सुभाष ने कहा ‘‘भारत छोड़ने के पीछे मेरा उद्देश्य देश के अंदर चल रहे संघर्ष को बाहर से और अधिक सुदृढ़ करना था। बाहर से इस प्रकार की पूरक सहायता के बिना भारत को स्वतंत्र करना किसी के लिए भी संभव नहीं है’’। उन्होंने आगे कहा - ‘‘अपने शत्रुओं सहित पूरे विश्व को अब यह बताने का समय आ गया है कि हमारी राष्ट्रीय स्वतंत्रता किस प्रकार प्राप्त होगी। भारत से बाहर रह रहे भारतीय, विशेष रूप से पूर्वी एशिया में रह रहे भारतीय लोग एक लड़ाकू बल का गठन कर रहे हैं जो भारत में ब्रिटिश सेना पर आक्रमण करने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम होगी। जब हम ऐसा करेंगे तो देश के नागरिकों में ही नहीं, बल्कि इस समय ब्रिटिश झंडे के तले खड़ी भारतीय सेना में भी क्रांति पैदा होगी। इस प्रकार जब ब्रिटिश सरकार पर भारत के अंदर और बाहर से दोहरा आक्रमण किया जाएगा, तो ब्रिटिश शासन का पतन हो जाएगा और फिर भारतीय जनता को उनकी आजादी मिल जाएगी’’।
द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश शासन के विरूद्ध युद्ध में आजाद हिन्द फौज शामिल हुई। भारत में मणिपुर, नागालैण्ड और मिजोरम तक सुभाष ने फतह हासिल कर ली। गांधी-नेहरू ने इस खबर को दबा कर रखा ताकि ब्रिटिश सेना के भारतीय सिपाही बगावत न कर दें। जापान ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह आजाद हिन्द सरकार को सौंप दिया, जिनका नाम बदलकर नेताजी ने शहीद और स्वराज कर दिया। 9 देशों ने आजाद हिंद सरकार को मान्यता दे दी। नेताजी भारत की निर्वासित सरकार के प्रथम राष्ट्राध्यक्ष और सेना के पहले कमाण्डर इन चीफ थे।
द्वितीय विश्व युद्ध में धुरी राष्ट्रों की पराजय के बाद ब्रिटिश सरकार ने लाल किले पर आजाद हिन्द फौज के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाया। इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई और वायुसेना, नौसेना तथा थलसेना ने ब्रिटिश हुकूमत के विरूद्ध बगावत कर दी। सेना के अविश्वसनीय बन जाने पर ब्रिटिश हुकूमत द्वारा 1948 की बजाए 1947 में ही भारत का विभाजन कर अपने विश्वस्त लोगों को सत्ता का हस्तांतरण कर दिया गया।
नेताजी भूमिगत हो गए जिन्हें नेहरू की जानकारी में सोवियत रूस के साइबेरिया में रखा गया। स्टालिन को विश्वास में लेकर नेहरू द्वारा नेताजी को भारत लौटने से वंचित कर दिया गया। ब्रिटेन-रूस और नेहरू ने नेताजी के संबंध में शताब्दी का सबसे घृणित कृत्य किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर नेताजी संबंधी सरकारी गोपनीय फाईलों के उजागर होने के बाद कितनी सच्चाई भारतवासियों तक पहुंची है यह कहना कठिन है, किन्तु कुछ गद्दार बेनकाब हुये हैं और स्वाधीनता आंदोलन का इतिहास पुनिर्लिखित करने की नई जमीन तैयार हुई है, यह निश्चित है।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से केंद्रीय ब्यूरो चीफ प्रमोद कुमार सिन्हा द्वारा संप्रेषित व प्रकाशक संपादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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