"शिक्षा कोई व्यापार नहीं — यह हर बच्चे का जन्मसिद्ध अधिकार है, और अब इसे बाज़ार से छीनने का समय आ गया है!”
"शिक्षा कोई व्यापार नहीं — यह हर बच्चे का जन्मसिद्ध अधिकार है, और अब इसे बाज़ार से छीनने का समय आ गया है!”
जनक्रांति कार्यालय से अधिवक्ता मोहम्मद बैरम रकी की रिपोर्ट
हर जगह गरीब का बच्चा यही सवाल पूछ रहा है :- “क्या पढ़ना सिर्फ अमीरों का हक़ है?” और इस सवाल का जवाब सिर्फ नारे नहीं, नीति, कानून और संघर्ष से मिलेगा।
इंडिया न्यूज़ डेस्क, (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन कार्यालय न्यूज़ डेस्क, खगड़िया, बिहार 22 जनवरी, 2026)।
"शिक्षा कोई व्यापार नहीं — यह हर बच्चे का जन्मसिद्ध अधिकार है, और अब इसे बाज़ार से छीनने का समय आ गया है!”
शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है।
और अगर यह अधिकार बाज़ार ने छीन लिया है —
तो अब इसे बाज़ार से छीनने का समय आ गया है।
जहाँ संविधान ने अनुच्छेद 21-A के तहत शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित किया,
वहीं ज़मीनी सच्चाई यह है कि शिक्षा अब अधिकार नहीं रही —
यह एक महँगा सौदा बन चुकी है।
स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय —
सबके दरवाज़ों पर अब ज्ञान नहीं, फीस की रसीद पूछी जाती है।
जिस बच्चे के माता-पिता मज़दूर हैं, किसान हैं, बेरोज़गार हैं —
“पहले पैसे लाओ, फिर पढ़ने का हक़ मिलेगा।”
यह शिक्षा नहीं,
संविधान का खुला अपमान है।
शिक्षा बनाम बाज़ार
जब शिक्षा बाज़ार के हाथ में जाती है,
तो क्लासरूम से इंसान नहीं, ग्राहक निकलते हैं।
स्कूल ब्रांड बन जाते हैं
कॉलेज कॉर्पोरेट हाउस
छात्र EMI पर ज़िंदगी खरीदने को मजबूर और शिक्षक सेल्समैन में बदल दिए जाते हैं। आज देश में लाखों बच्चे सिर्फ इसलिए स्कूल छोड़ देते हैं
क्योंकि उनके सपनों की कीमत फीस स्ट्रक्चर तय करता है।
क्या यही “न्यू इंडिया” है.?
क्या यही “विश्वगुरु” बनने का रास्ता है.?
संविधान कहता है —
“राज्य 6 से 14 वर्ष तक के प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देगा।”
लेकिन व्यवस्था कहती है —
“अगर पैसे नहीं हैं, तो सपने देखना छोड़ दो।”
यह टकराव सिर्फ नीति का नहीं,
न्याय बनाम मुनाफ़े का है।
अब चुप रहना गुनाह है
अब यह कहने का समय नहीं कि
“सिस्टम ऐसा ही है।”
अब कहना होगा —
“सिस्टम बदला जाएगा।”
शिक्षा को मुनाफ़े से मुक्त करना होगा
सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों को मजबूत करना होगा
निजी शिक्षा माफ़िया पर सख़्त नियंत्रण लगाना होगा
और यह स्वीकार करना होगा कि
शिक्षा दया नहीं, अधिकार है।
तो जनता बोलेगी।
अगर नीतियाँ नहीं बदलेंगी,
तो आंदोलन खड़े होंगे।
यह सिर्फ भारत की नहीं, पूरी दुनिया की लड़ाई है
अफ्रीका से एशिया तक,
लैटिन अमेरिका से यूरोप तक —
हर जगह गरीब का बच्चा यही सवाल पूछ रहा है:
“क्या पढ़ना सिर्फ अमीरों का हक़ है?”
और इस सवाल का जवाब सिर्फ नारे नहीं, नीति, कानून और संघर्ष से मिलेगा।
अंतिम घोषणा
शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है।
इसे बाज़ार से छीना जाएगा।
छीना पड़ेगा।
क्योंकि अधिकार भीख में नहीं मिलते —
उन्हें हासिल किया जाता है।
“ऊपर भगवान, नीचे संविधान — और बीच में जागरूक नागरिक।”

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