जयंती विशेष : नेताजी सुभाष चंद्र बोस जय हिन्द सुभाष
जयंती विशेष : नेताजी सुभाष चंद्र बोस
जय हिन्द सुभाष
जय हिन्द सुभाष
जयन्त वर्मा
राष्ट्रीय सलाहकार
भारतीय राष्ट्रीय फारवर्ड ब्लाँक
इंडिया न्यूज डेस्क, (जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन कार्यालय न्यूज डेस्क 23 जनवरी, 2026 )। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के योद्धाओं में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ही एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने अपना शत्रु घोषित किया था। सच्चा क्रांतिकारी, अनन्य देशभक्त, सफल शासक, सक्रिय समाज सेवक और सबसे बढ़कर एक निडर सेनापति के रूप में उन्होंने अल्पावधि वाले अपने सक्रिय जीवन में देशवासियों पर जो अमिट छाप छोड़ी है, वह युगों-युगों तक उन्हें राष्ट्र के लिए मर-मिटने की प्रेरणा देती रहेगी।
1939 में त्रिपुरी, जबलपुर के अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दोबारा अध्यक्ष चुने जाने के बाद उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को भारत से खदेड़ देने के लिए जो रणनीति प्रस्तुत की उसे महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लागू नहीं होने दिया। इस असहयोग के फलस्वरूप कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देकर सुभाष चन्द्र बोस योरोप चले गए और भारतीय सेवा के युद्धबंदियों को संगठित कर उन्होंने आजाद हिन्द फौज का गठन किया।
बल-पूर्वक भारत का आजाद कराने के लिए यह ऐसा दुस्साहसपूर्ण अभियान बना जो आजादी की लड़ाई में अभूतपूर्व था। सुभाष की रणनीति के तहत अखण्ड भारत आजाद हो जाता किन्तु महत्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अंग्रेजी हुकूमत के साथ सत्ता के हस्तांतरण का ‘समझौता’ कर लिया जिसकी कीमत भारत को दो टुकड़ों में बंटकर और दस लाख लोगों की बलि चढ़ाकर अदा करनी पड़ी।
इतिहासकारों ने इस दुर्भाग्यपूर्ण त्रासदी को नजरंदाज करके भारतीय जनमानस को भ्रमित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अनन्य देशभक्त नेताजी सुभाष के प्रयासों को विफल करने के बाद आजादी की लड़ाई में उनके योगदान को इतिहास के पन्नों से निकाल बाहर करने का पंडित जवाहरलाल नेहरू और उनकी सरकार ने भरसक प्रयास किया।
नेताजी सुभाष का नारा ‘जय हिन्द’ आज भी हर भारतीय को देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत कर देता है। 1857 के महान स्वाधीनता संग्राम के बाद भारत की आजादी के लिए सबसे बड़ा व्यवस्थित और संगठित प्रयास नेताजी सुभाष ने किया था। आजादी के मतवालों के लिए वे एक ऐसे प्रेरणा स्त्रोत थे और आज भी हैं, जिनके आह्वान पर हर युवक देश के लिए प्राणोत्सर्ग करने को तैयार हो जाता है।
कांग्रेस पार्टी में घुसे हुए पंजीवाद के दलालों को नेताजी से भय था क्योंकि समाजवादी भारत के निर्माण के प्रति उनकी निष्ठा अडिग थी। देशप्रेमियों के मन में सुभाष के प्रति जो आदर और विश्वास था उससे मौकापरस्त और स्वार्थी तत्वों में हीन भावना का संचार होता था तथा कांग्रेस पार्टी पर उनकी पकड़ कमजोर होने लगती थी।
सत्ता के हस्तांतरण ने जिस वर्ग के हाथ में देश की बागडोर सौंपी उसने सत्ता को अपने और अपने खानदान की भलाई के लिए इस्तेमाल किया। समाज में व्याप्त विषमता बढ़ती चली गई। किसान, मजदूर, दलित और आदिवासियों का भरपूर शोषण किया गया नतीजतन उनकी हालत बद से बदत्र होती चली गई। यह देश किसका है ? आज यह सवाल उठ खड़ा हुआ है। आतंकवादी हमलों में मुम्बई की पांच सितारा होटल में सौ से कम लोगों की हत्या हुई तो भारत के गृहमंत्री, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री को पद से हटना पड़ा किन्तु किसान विरोधी नीतियों के चलते देश के लगभग दो लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली तो एक भी नेता या नौकरशाह का बाल-बांका तक नहीं हुआ।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर हमें भारत की आजादी का मूल्यांकन करना होगा तथा नेताजी सुभाष के रास्ते से हटकर भारतवासियों को सत्ता के हस्तांतरण के रूप में जो आजादी दिलाई गई वह किस वर्ग के हित में काम कर रही है, यह जांचना होगा।
लोकतंत्र यदि सर्वश्रेष्ठ राजनीतिक पद्धति है तो भारत में वह बहुमत के विरूद्ध क्यों संचालित हो रही है ? क्यों भारत की आम जनता शासन संचालन में हाशिए पर रहती है। पूर्व केबिनेट सेक्रेटरी टी.एस.आर. सुब्रमण्यम का कथन कि ‘यह देश सम्पन्न लोगों के लिए है; गरीबों के लिए यहां कोई स्थान नहीं है’ यदि सही है तो फिर दूसरी आजादी की एक लड़ाई पुनः छेड़नी होगी जिसमें हम ऐसी व्यवस्था कायम कर कसें जिसमें आम जनता को इज्जत से जीने के सभी अवसर उपलब्ध हों, तभी नेताजी के सपनों का भारत बनेगा और हम वास्तव में आजाद कहलावेंगे।

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