आध्यात्मिक चिंतन - मनन : ब्रह्मा जी की तप की वजह से उनकी काया से उत्पन्न हुए कायस्थ जो कहलाते है श्री चित्रगुप्त वंशज
आध्यात्मिक चिंतन - मनन :
ब्रह्मा जी की तप की वजह से उनकी काया से उत्पन्न हुए कायस्थ जो कहलाते है श्री चित्रगुप्त वंशज
🖋️प्रमोद कुमार सिन्हा
चित्रगुप्त वह है जिसका चित्त अंतरजगत के उस अंतिम सीढ़ी पर अवस्थित है कहने का गर्ज है वह आत्मा जो सूक्ष्म से सूक्ष्म से अर्थात सुपर कम्प्यूटर है जो बिना छुपाये अपने आप में रिकॉर्ड हो जाता कहने का गर्ज है चित्रगुप्त का ना तो कोई मूर्ति है ना रंग है और ना ही कोई रूप तो आज चित्रगुप्त के नाम से झगड़ा क्यों होता है..?
अध्यात्म डेस्क (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन कार्यालय अध्यात्म डेस्क 27 जनवरी, 2026। इस दुनिया में " कायस्थ " नामक एक जाति है जिसे संविधान में अल्पसंख्यक कहा गया है पर थोड़ा हम विचार करें।
शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा जी की तप की वजह से उनकी काया से जो उत्पन्न हुआ इसलिये ब्रह्मा जी ने कहा हे महापुरुष आप कौन हो, तब काया से उत्पन्न पुरुष ने कहा हे सृष्टि सृजन हार मैं आपकी काया से ही उत्पन्न हुआ हूँ।
इस पर ब्रह्मा जी ने कहा आप मेरी काया से उत्पन्न हुए हो इसलिये आप "कायस्थ " कहलाओगे और हाथ में कलम दवात लिये हो इसलिये तुम " चित्रगुप्त " नाम से विख्यात होओगे तुम्हारा स्थान धर्मराज के यहाँ होगा और सभी जीव - जन्तु के कर्मों का लेखा - जोखा करोगे।
अब हम कायस्थ शब्द पर थोड़ा चिंतन - मनन करें....??
कायस्थ वह है जो अपनी काया में स्थित है अर्थात अपनी अंतरजगत में अंतरात्मा में स्थित है यदि ऐसा नहीं है तो सभी बातें शास्त्रों की लिखी हुई बात झूठी है इसलिये सभी शास्त्र जलाने के योग्य हैं, ( जैसे गोदी मिडिया होता है अर्थात बिकाऊ मिडिया ) उसी प्रकार ब्राह्मण वर्ण के लोग मिडिया के रूप में अपने वंशजों के रहन - सहन, खान - पान की व्यवस्था हेतु शास्त्रों में उलट - पुलट बातें किसी ना किसी ऋषि के नाम से इसे प्रकाशित कराया गया है। जैसे आज गोदी मिडिया है वही गोदी मिडिया के कार्य लोभ - लालच से करके अपने और आने वाली पीढ़ी के खान - पान को बरकरार रखने के लिए ऋषियों के नाम का दुरूपयोग किया है।
" चित्रगुप्त " पर भी कर लें, चित्रगुप्त वह है जिसका चित्त अंतरजगत के उस अंतिम सीढ़ी पर अवस्थित है कहने का गर्ज है वह आत्मा जो सूक्ष्म से सूक्ष्म से अर्थात सुपर कम्प्यूटर है जो बिना छुपाये अपने आप में रिकॉर्ड हो जाता कहने का गर्ज है चित्रगुप्त का ना तो कोई मूर्ति है ना रंग है और ना ही कोई रूप तो आज चित्रगुप्त के नाम से झगड़ा क्यों होता है.. ? चूँकि हम अपनी काया में ही अवस्थित नहीं हो पाये, चित्रगुप्त अर्थात वह सुपर कम्प्यूटर जो अपने आप रिकॉर्ड होता है, जिसमें समस्त जीव - जन्तु - कीड़े - मकोड़े इत्यादि इत्यादि सहित 84 हज़ार योनियों के प्राणियों का लेखा - जोखा होता रहता है, जहाँ ना कोई ब्रह्मा है और ना ही कोई विष्णु, नहीं तो इस जाति की उत्पत्ति का इतिहास क्या है..? क्या भीष्म पितामह के पहले कायस्थ नहीं थे.. ? ये तो महाभारत की बात कोड़ी कल्पना है।
झुठ बोलना, घुस देना, मस्ती भरी घुस लेकर जीना क्या कायस्थ वही है..? "हमको तो अपनों ने ही मारा.गैरों में कहां दम था, मेरी किस्ती वहीं डूबी जहाँ पानी कम था'।
आज वैमनुस्यता का हद हो चुकी है कायस्थ को कायस्थ का ही खतरा है। हम एकजुट कैसे हो सकते हैं ये मेरा व्यक्तिगत निजी अनुभव है।
मैं ऑडिट विंग से सम्बन्धित रहा लोकनायक जय प्रकाश के आह्वान के अंतर्गत यातनायें सही और भ्र्ष्टाचार मुक्त होने की कसमें भी खायी, जेल भी गये। मेरा सर्विस रिकॉर्ड आज भी प्रसांगिक है। हमने आज का काम आज ही किया कल पर कभी टाला नहीं , कभी किसी से हाथ नहीं पसारा और ना ही फ़ाइल चाप के रखा जहाँ हमारे बंधु नीचता के उच्चतम शिखर पर विराजमान रहते थे और पैसे के लिये फ़ाइल लंबित रखते थे, वहीं मैं ज्यादा से ज्यादा आधे घंटे में कार्य निबटा लिया करता था।
गलत होने पर किसी भी सूरत में मैं डिगता नहीं था चाहे गाली - गलौज हो बाहें ममोंड़े जाते रहे और यहाँ तक की rरिवाल्वर भी तानने में कोई कोर कसर बाकी ना छोड़ा , मेरे करीब दर्जनों वरिय ऑडिट ऑफिसर मेरे कार्य से प्रभावित रहते थे और सबों ने मेरा सी. आर. "एक्सीलेंट ' लिखा।
उस समय कार्मिक एबं प्रशाशनिक बिभाग द्वारा जारी पत्र के अनुसार बिहार प्रशासनिक सेवा पर मनोनयन - चयन हेतु निर्देश जारी था जिसके अंतर्गत पहला शर्त कार्य का अनुभव दस वर्ष का हो चालीस से ज्यादा उमर नहीं हो सी आर एक्सेलेंट हो, कम से कम बी. ए पास हो।
इस उपरोक्त प्रक्रिया के अंतर्गत मेरी संचिका चली उस समय हमारे विंग के स्थापना अधीक्षक श्री एस एन बरियार थे। जो कायस्थ जाति के ही थे निन्म से निम्न स्तर पर जाकर नोटिंग दिया की श्री सिन्हा को उच्चतर पद पर मनोनयन के माध्यम से प्रोन्नति उचित नहीं है इनसे भी वरीय जैसे वरीय अंकेक्षक , अधीक्षक लेखा और लेखा पदाधिकारी से सम्यक रूप से विचार कर ही उच्चत्तर पद पर मनोनयन करना श्रेस्कर होगा यानी लालाजी ही लालाजी के दुश्मन बने।
जहाँ तक फ़ाइल नोट शीट में जो भी उन्होंने अंकित किया सभी के सभी झुठा था हमसे सभी कर्मचारी चालीस वर्ष से अधिक आयु के थे जो अयोग्य थे ना किसी का सी आर एक्सीलेंट था और ना ही कोइघपला पकड़ा था और ना ही ट्रेजरी में रूपया जमा कराया था।
उस समय हमारे वित्त परामर्श दाता श्री बी डी चौधरी थे जो वरिय महालेखाकार ना होकर बिक्री कर बिभाग से थे।
उन्होंने लिखा श्री सिन्हा ने कोई बहादुरी नहीं की है मात्र थोड़ी से राशि पकड़ी है जो एक अंकेक्षक का सामान्य कार्य है यदि ये राशि नहीं पकड़ते तो इनकी कर्तव्य हीनता होती जो कार्मिक के पत्र की वास्तविकता से पड़े की बात थी।
अब प्रश्न उठता है राशि पकड़ना कर्तव्य था तो कितने लोगों ने राशि नहीं पकड़ी वे कर्तव्यहीन थे, अंकेक्षक पद उन्होंने स्वीकार किया जबकि मेरा पद उच्च वर्गीय लेखा लिपिक ( लेखा ) था अंकेक्षक का वेतनमान नहीं , तत्कालीन जल संसाधन बिभाग के सचिव श्री वी एस दुबे थे उन्होंने कार्मिक पत्र के परे जाकर लिखा " उच्चत्तर पद देना ऐसी अबसथा मेंसम्भव नहीं है अतएव फ़ाइल को कार्मिक विभाग में भेजा जाये।
पुनः कार्मिक विभाग ने कार्यों की सरहना की और मुख्यमंत्री के यहाँ अग्रेत्तर कार्रवाई हेतु प्रेषित कर दिया। उस समय मुख्य मंत्री माननीय लालू प्रसाद यादव हमारे जे पी आंदोलन के साथी रहे थे। अन्ने मार्ग में करीब सालों फ़ाइल धुल चाटता रहा और मैंने कभी माननीय लालू जी से नहीं मिला।
अन्तः मेरी उच्चतर पद पर प्रोन्नति रुक गयी। हाँ मेरे सर्विस बुक में वित्तीय परामर्शी ने असाधारण अंकेक्षक घोषित किया वह दर्ज है, पूर्णिया ट्रेजरी का विशेष जाँच कर जो राशि पकड़ी अद्वितीय है सेवा पुस्त में दर्ज है।
रिकवरी राशि करीब ४८,४९७८५ /= अड़तालिस लाख ऊँचास हज़ार सतासी रूपया का रिकवरी भी दर्ज है जो थोड़ा मिस्टेक है राशि एक्यावन लाख से भी अधिक हुआ ।
विशेष लिखकर कलेवर बढ़ाना उचित नहीं होगा, मेरी संचिका को तोड़ मरोड़ किसने किया ? तो वह कायस्थ ही थे जो सरासर नियम के विरुद्ध था संचिका को मैंने कार्मिक बिभाग में पढ़ा था।
पुनः इस प्रकार की झूठी प्रवृत्ति यदि किसी में वह लाला समाज में ही यह एक उदाहरण एक ही दर्जनों है कैसे समाज ifko से जुड़ेगा..?
इसी सन्दर्भ में मैं माननीय तत्कालीन वित्त मंत्री सुशील मोदी, माननीय पी डब्लू डी मंत्री नन्द किशोर यादव , माननीय रविशंकर जी माननीय विजय कृष्ण जी , माननीय शिवा नन्द तिवारी इत्यादि-इत्यादि से मुलाकातें की थी। चूँकि मैं जे पी सेनानी पटना से हूँ और सभी मेरे आंदोलन के मित्र रह चूके हैं.
चूंकि जेल से निकलने के बाद मैंने राजनीति से पूर्ण सन्यास ले चुका था, और आज भी राजनीति मेरे बुते के बाहर है। माननीय नन्द किशोर जी जिनसे दांतों कटी दोस्ती रही, वे युवा मोर्चा बी जे पी के प्रांतीय अध्यक्ष थे। उन्होंने पहचानने से इनकार किया, मैं वापस लौटा तो उन्होंने बुलाया श्रीमान आप आयें। उनका वक्तव्य था माना आपने राजनीति छोड़ दी , दोस्ती तो नहीं छुटी थी। आज बीस बर्षों के बाद मुझसे मिलने आये हैं, मैं कैसे कहूँ आपसे मेरी जान पहचान है। उनकी इस बात से ह्रदय कचौटा की हाँ मैं दलाल होता तो जरूर मिलता बोल नहीं सका। इसी तरह से विभिन्न प्रकार से सबों ने टाल मटोल किया, मेरा कहना है आप और हम जो कसमें जे पी के समक्ष खायी थी क्या आप उस रास्ते पर चले,
मैं बहुत संतुष्ट हूँ इस राह पर चलके आत्म संतुष्टि से लवरेज हूँ क्या आप में संतुष्टि है. ? मैं तो कहूंगा बिल्कुल ही नहीं ,
पुनः प्रसंग पर आता हूँ कायस्थ वही है जो अपने काया में स्थित है चित्रगुप्त वही कहलाने का अधिकारी है जिसका चित्त अर्थात कॉन्सेस लेवल हाई है बरण सभी ढोंग है पाखंड है इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं अपनी लेखनी को बिश्राम दे रहा हूँ।

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