नेता वोट के समय जनता को “मालिक” कहते हैं और सत्ता में आते ही उसे “भीड़” समझने लगते हैं।
“DM से लेकर नेता तक: सत्ता का वह अदृश्य ‘नरभक्षी नेटवर्क’ जो आम आदमी की ऊर्जा खाकर ज़िंदा है!”
(— डॉ. देवेंद्र बलहारा के कथन के आलोक में) जनक्रांति कार्यालय से अधिवक्ता मोहम्मद बैरम रकी की रिपोर्ट
क्या इस देश का नागरिक सिर्फ़ सिस्टम को पालने के लिए पैदा हुआ है? क्या न्याय केवल ताक़तवरों की संपत्ति है?
पटना, बिहार ( जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन न्यूज डेस्क,खगड़िया, बिहार 10 जनवरी, 2026)। “DM, कलेक्टर, SDM, कोर्ट, बैंक, नेता और राजनीति — ये कोई अलग-अलग संस्थाएँ नहीं रहीं, बल्कि एक ऐसा विशाल गठजोड़ बन चुकी हैं, जिसका सर्वाइवल आम आदमी और उसकी ऊर्जा को खाकर ही होता है।”
यह कोई भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि उस सच्चाई का निचोड़ है जिसे भारत का आम नागरिक रोज़ जीता है—और रोज़ चुपचाप सहता है।
आज का भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य कम और संस्थागत शिकारी व्यवस्था ज़्यादा बन चुका है। यहाँ हर वह व्यक्ति जो सिस्टम से न्याय, सुविधा या अधिकार माँगता है, उसे पहले थकाया जाता है, फिर डराया जाता है और अंततः चुप करा दिया जाता है।
सिस्टम कैसे “ऊर्जा खाता” है.?
SDM और कोर्ट तारीख़ पर तारीख़ देते हैं—न्याय नहीं, थकान मिलती है।
बैंक आम आदमी को लोन में डुबोते हैं, बड़े कर्ज़दारों को माफ़ी देते हैं।
नेता वोट के समय जनता को “मालिक” कहते हैं और सत्ता में आते ही उसे “भीड़” समझने लगते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में जो चीज़ सबसे ज़्यादा नष्ट होती है, वह है —
*आम आदमी की ऊर्जा, समय, आत्मसम्मान और जीवन।
यह केवल रिश्वत या घोटालों की कहानी नहीं है।
यह सिस्टमेटिक एक्सप्लॉइटेशन (Systemic Exploitation) है —
जहाँ एक पूरा नेटवर्क इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि:
आप लड़ते-लड़ते थक जाएँ
आप न्याय की उम्मीद छोड़ दें
और अंततः आप सिस्टम के गुलाम बन जाएँ.
🧠 सबसे ख़तरनाक बात क्या है..?
सबसे ख़तरनाक बात यह है कि यह गठजोड़ क़ानून के भीतर रहकर काम करता है।
हर ज़ुल्म नियमों की आड़ में, हर अन्याय प्रक्रिया के नाम पर।
यही कारण है कि यह गिरोह:
दिखाई नहीं देता
पकड़ा नहीं जाता
और हर सरकार में ज़िंदा रहता है
सरकारें बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं—
लेकिन आम आदमी की लाश पर खड़ा यह नेटवर्क जस का तस रहता है।
क्या इस देश का नागरिक सिर्फ़ सिस्टम को पालने के लिए पैदा हुआ है?
क्या न्याय केवल ताक़तवरों की संपत्ति है..?
क्या संविधान सिर्फ़ किताबों में ज़िंदा रहेगा?अगर इन सवालों पर अब भी चुप्पी रही, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे पूछेंगी—
*“जब सिस्टम इंसान खा रहा था, तब आप चुप क्यों थे..?”

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