आध्यात्मिक - चिंतन . गीता में भगवान श्री कृष्ण ने क्या.. कहाँ : सर्व धर्मान्य प्रीतिज्य माम एकेम शरणम बज्र #अर्थात
आध्यात्मिक - चिंतन
. गीता में भगवान श्री कृष्ण ने क्या.. कहाँ : सर्व धर्मान्य प्रीतिज्य माम एकेम शरणम बज्र #अर्थात
इस विन्दु पर हम गंभीरता पूर्वक विचार करें मनन करें चिंतन करें
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जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन (अध्यात्म डेशक)।
गीता में भगवान श्री कृष्ण का कहना है :- सर्व धर्मान्य प्रीतिज्य माम एकेम शरणम ब्रज -----------
इसका पूर्ण शब्द नहीं लिख रहा हूँ गीता पढ़े तो मिल जायेगा इसलिये ही मैंने नहीं लिखा है आइये अब इस पर विचार करें की श्री भगवान कृष्ण का क्या कहना है पार्थ के प्रति ये संकेत है समस्त मानव जाती के लिऐ इस विन्दु पर हम गंभीरता पूर्वक विचार करें मनन करें चिंतन करें की पार्थ के बहाने मानव के लिये उनका क्या कहना है चाहे कोई हिन्दू हो, मुसलमान ( जिसका अर्थ मुसलल्म ईमान से है ) सीख हो, पारसी हो ईसाई हो अंग्रेज हो
जैनी हो या बिभिन्न प्रकार के संप्रदाय या जाती के लोग हों उन्होंनें सभी के प्रति ये सन्देश दिया है इस पर हमें चाहे किसी भी संप्रदाय से सम्बन्धित हैँ जो वो आपको कहता है करते रहें कोई आपत्ति नहीं है लेकिन स्व विवेक पूर्बक विचार हमें स्वतः करना है अर्थ क्या है
:- भगवान श्री कृष्ण का कथन है जितने भी प्रकार के संप्रदाय वो आपको उन्नति के शिखर पर नहीं ले जायेगें बरण आपस में झगड़ा और विबाद को ही जनम देंगें ** सर्व धर्म प्रीतिज्य का विचारणीय विन्दु है की हमें सभी प्रकार के इस बहकावे धरम को को त्यागकर एकमात्र छोड़कर एक ही वास्तबीक धरम है अबस्तबिकता को छोड़कर सिर्फ मेरे शरण आ जा कहने का गर्ज है मेरे शरण का अर्थ कोई श्री कृष्ण की मूर्ति से नहीं बल्कि स्व अन्तः करण से है जिसे आत्मा कहा जाता है उसे जानने का प्रयास कर जो नातो किताबों में मिलेगा और ना ही अरदास से ना ही मंत्र से और ना ही श्लोक से वो ज़ब भी मिलेगा स्वतः अपने अंदर उतरने से उस अपने आप में उतरने का प्रयास से और यह प्रयास तुम्हें आध्यात्मिकता के उच्चतम शिखर पर ले जायेगा इस प्रकार के धरम से ही कहने का भाव है यदि तुम ऐसा करते हो तो तुम्हें मैं सभी प्रकार के पापों से मुक्त कर मोक्ष की प्राप्ति करा दूँगा क्या आप ऐसा कर रहे हैँ ? यदि नहीं तो सभी ढकोसला है व्यर्थ है तुम्हारी आत्मिक उन्नति में व्यबधान है इस पर हमें गंभीरता पूर्वक विचार करने की परम आबश्यकता है अपने अंतर जगत में उतरने की विधि क्या है।
जो हम उच्चतम शिखर पर स्व पहुँच सके तो विधि है sitting silently do nathing हमें अपने स्तर से कुछ नहीं करना है चुपचाप शांत होकर बैठ जाना है कितना आसान विधि है ना तंत्र करना है ना मन्त्र जपना है ना हदीस पढ़ना है ना वाहे गुरु करना और ही अल्लाहु अकबर करना है कितना आसान और शानदार तरीका है क्या हम इसे कर रहे हैं ? नतीजा एक दूसरे से यदि झगड़ा है तो धरम नाम पर ही जो आज हो रहा है कोई मंदिर के पीछे परेशान h तो कोई मस्जिद के पीछे कोई ईसाइयत के पीछे पागल है तोकोई गिरजा ke पीछे :-, हमें इस पर गंभीरता पूर्वक विचार करना है कोई भी धरम हमें प्रेम और सदभाव नहीं ।

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