जयंती विशेष: नेता जी सुभाष चंद्र बोस सुभाष के सपनों का भारत

जयंती विशेष: नेता जी सुभाष चंद्र बोस 

         सुभाष के सपनों का भारत

                        जयंत वर्मा
                    राष्ट्रीय सलाहकार, 
          भारतीय राष्ट्रीय फारवर्ड ब्लाक

इंडिया न्यूज डेस्क,(जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन कार्यालय न्यूज डेस्क 23 जनवरी, 2026,)। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के जीवन के 47 वर्षों में प्रथम 24 वर्ष तक वे अत्यन्त मेधावी छात्रा रहे जिसमें सर्वोच्च उपलब्धि उस समय की कठोरतम इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा में उत्तीर्ण होना था। मातृभूमि की सेवा और ब्रिटिश ताज की सेवा के बीच उन्होंने मातृभूमि की सेवा को चुना तथा सिविल सेवकों को प्रदत्त भौतिक सुख और ऐश-आराम के जीवन का परित्याग कर दिया। 
41 वर्ष की अल्पायु में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद हेतु सर्वानुमति से चुन लिया गया। हरिपुरा कांग्रेस के अधिवेशन में अध्यक्ष पद से उन्होंने घोषणा की कि कांग्रेस पार्टी आम आदमी, जैसे कि किसान, मजदूर, कामगार आदि के हितों के लिए काम करेगी, जमींदारों, पूंजीपतियों और सूदखोरों जैसे निहित स्वार्थों के लिए नहीं। भारतवासियों को पूरी राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता दिलाने के अपने चरम लक्ष्य की पूर्ति के लिए सशक्त संघीय सरकार के गठन का उनका प्रयास था। निरंकुश अधिकारों से युक्त वह सरकार, सामाजिक और आर्थिक विषमता को खत्म करने का काम करती, ताकि भारत अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा हो सके। उनका विश्वास था कि देश के कृषि और औद्योगिक जीवन का पुनर्गठन करने सुदृढ़ राजकीय आयोजन व्यवस्था होनी चाहिए । नेताजी देश में एक नए सामाजिक ढांचे की रचना करने के लिए प्रयासरत थे। सामाजिक अवरोधों को दूर करने का सशक्त माध्यम विकेंद्रीकृत लोकतांत्रिक व्यवस्था ही हो सकती है ऐसा उनका विश्वास था। आधुनिक जगत के प्रचलित सिद्धान्तों और अनुभवों के प्रकाश में मुद्रा, वित्त और साख आदि की नई प्रणाली स्थापित करना, जमींदारी प्रथा को खत्म कर सारे देश में एक समान भूमिधारी प्रणाली लागू करना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल थे। सुभाषचन्द्र बोस की मान्यता थी कि मध्य विक्टोरिया युगीन लोकतांत्रिक प्रणाली की बजाय सैनिक अनुशासन से बंधी एक मजबूत पार्टी ही सामाजिक-आर्थिक समानता हासिल करने में सफल हो सकती है। वे यह महसूस करते थे कि अनेक वर्षों से चले आ रहे विषमतापूर्ण सामाजिक ढांचे को अपने साधनों पर निर्भर रहने के लिए स्वतंत्रा छोड़ दिया जाये तो देश को एक सूत्रा में बांधे रखना असंभव होगा तथा अराजकता पैदा होगी। एक राष्ट्रीय कार्यकारिणी के अधीन सभी अग्रगामी संगठनों में एकता स्थापित करने के वे पक्षधर थे ताकि आवश्यकता पड़ने पर बहुत से मोर्चों पर एक साथ कार्यवाई की जा सके।
सुभाषचन्द्र बोस ने ब्रिटिश हुकूमत को भारत से खदेड़ देने का जो रास्ता चुना था उसके कारण अंग्रेजी शासन ने उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा शत्रु घोषित कर रखा था और उनकी लोकप्रियता से इतने भयभीत थे कि भारत की भूमि से दूर रखने के लिए उन्हें देश निकाला दे दिया था। भारत में सुभाष को स्वतंत्रा छोड़ना ब्रिटिश शासन के लिए सबसे खतरनाक था इसलिए अधिकांश समय उन्हें जेल के भीतर रखा जाता था अथवा नजरबंदी की अवस्था में ।
सुभाषचन्द्र बोस यद्यपि कांग्रेस के शीर्षस्थ नेता रह चुके थे किन्तु गांधीजी और पार्टी के संबंध में उनकी वैचारिक स्पष्टता बेजोड़ थी। वे मानते थे कि कांग्रेस के पास कोई स्पष्ट विचारधारा और कार्यक्रम नहीं है, इसमें अलग-अलग मत रखने वाले लोग शामिल हैं। उन्होंने स्वयं लिखा है - ‘‘विचारणीय प्रश्न यह उठता है कि भारत में गांधीवाद का भविष्य क्या होगा ? कभी-कभी यह भी कहा जाता है कि गांधीवाद कम्युनिज्म का विकल्प है, किन्तु यह विचार त्रुटिपूर्ण है। गांधी जी ने देश और संसार को अहिंसक असहयोग का नया तरीका अवश्य सिखाया है किन्तु वह कम्युनिज्म की तरह देश या मानव मात्रा के सामने समाज की पुनर्रचना का कोई कार्यक्रम नहीं पेश कर पाए हैं। कम्युनिज्म का विकल्प समाज की पुनर्रचना का कोई विकल्प ही हो सकता है। सुभाष के उग्र राजनीतिक विचार कांग्रेस के भीतर सक्रिय पूंजीपतियों, जमींदारों, सूदखोरों को अहितकर लगे क्योंकि आजादी को वे अपनी आर्थिक समृद्धि के लिए इस्तेमाल करने के छिपे मकसद से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुए थे। 1939 में त्रिपुरी, जबलपुर में हुए अधिवेशन में कांग्रेस के भीतर अपनी जड़ें जमा चुके दक्षिणपंथी लोगों ने सुभाष के विचारों से कांग्रेस को हटाने के लिए अध्यक्ष पद के चुनाव में उनकेे विरूद्ध पट्टा भी सीता रामैया को को खड़ा कर दिया। महात्मा गांधी ने घोषणा कर दी थी कि पट्टा भी की हार उनकी स्वयं की हार होगी, इसके बावजूद सुभाष बाबू चुनाव जीत गए थे, इसके बाद गांधीजी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सुभाष को कांग्रेस से निष्कासित करवा दिया। 
सुभाष ने त्रिपुरी अधिवेशन के अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में ब्रिटिश साम्राज्यवाद को छः माह में भारत छोड़ देने का अल्टीमेटम दिया था। इस प्रस्ताव का महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने डटकर विरोध किया क्योंकि वे ब्रिटिश साम्राज्यवाद से समझौते में आजादी हासिल करने के पक्षधर थे। अंततः समझौते की शर्त की तहत भारत का विभाजन हुआ और साम्प्रदायिक दंगों में दस लाख से अधिक लोग मारे गये, असंख्य परिवार बिछड़ गये। आज भारत और पाकिस्तान अपने अधिकांश संसाधन सीमा की चौकसी में झोंक रहे हैं। गरीबी, भुखमरी और बेकारी की समस्या से जूझ रहे ये दोनों देश यदि भाईचारे से रहते तो उन संसाधनों का उपयोग वे अवाम की खुशहाली और कल्याण में लगा सकते थे। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की बात मानी गई होती तो आज भारत से पाकिस्तान अलग नहीं होता तथा भारत को विश्व शक्ति बनने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती थी।
आज पुनः भारत के दोनों प्रमुख राजनीतिक दल साम्राज्यवाद के आगे घुटने टेक रहे हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था बहुमत के शोषण का हथियार बनकर रह गई । ऐसे समय में नेताजी के विचारों को अपनाकर तद्नुसार राजनीति संचालित हो तो भारत को विश्वगुरू बनने से कोई नहीं रोक सकता। 
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से केंद्रीय ब्यूरो चीफ प्रमोद कुमार सिन्हा द्वारा संप्रेषित व प्रकाशक संपादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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