"उद्योग नहीं, व्यवस्था का आईना! बिहार में रोज़गार के तीन सबसे बड़े ‘उद्योग’—शराब, बालू और अनाज: विकास का कड़वा सच”

"उद्योग नहीं, व्यवस्था का आईना! बिहार में रोज़गार के तीन सबसे बड़े ‘उद्योग’—शराब, बालू और अनाज: विकास का कड़वा सच”

जनक्रांति कार्यालय से अधिवक्ता मोहम्मद बैरन रकी की रिपोर्ट 
भूख भी रोज़गार बन गई है, और अनाज भी राजनीति।

जनक्रांति न्यूज डेस्क, बिहार (जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन कार्यालय 7 जनवादी,2026)।बिहार में रोज़गार का असहज सवाल___
बिहार में हर चुनाव, हर बजट और हर मंच पर एक ही शब्द गूँजता है—रोज़गार।
लेकिन जब ज़मीन पर उतरकर देखा जाए, तो यह सवाल तीर की तरह चुभता है:
आख़िर बिहार में सबसे ज़्यादा लोगों को काम कहाँ मिल रहा है.?
आईटी पार्क? फैक्ट्रियाँ? स्टार्टअप्स?
नहीं।
हकीकत यह है कि बिहार में रोज़गार की रीढ़ तीन ऐसे क्षेत्रों पर टिकी है, जिन्हें हम उद्योग कहने में झिझकते हैं—शराब, बालू और अनाज।
1️⃣ शराब — प्रतिबंध के साए में फलता रोज़गार
काग़ज़ों में शराबबंदी है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि शराब से जुड़ा नेटवर्क आज भी हज़ारों लोगों को रोज़ी दे रहा है।
ढुलाई, भंडारण, सप्लाई और दलाली—हर स्तर पर मानव श्रम लगा है।
यह रोज़गार न तो सुरक्षित है, न सम्मानजनक—यह डर, अपराध और अनिश्चितता पर टिका है।
परिवार बिखरते हैं, युवा भटकते हैं, और व्यवस्था आँकड़ों में उलझी रहती है।
यह नीति की सफलता नहीं, सिस्टम की विफलता का संकेत है।
2️⃣ बालू — नदियों से निकला रोज़गार, भविष्य से छीना भरोसा
बिहार की नदियाँ कभी जीवन देती थीं, आज रोज़गार का खतरनाक स्रोत बन चुकी हैं।
ट्रैक्टर, ट्रक, मजदूर, चौकीदार—एक पूरी अर्थव्यवस्था बालू पर खड़ी है।
पर्यावरणीय नुकसान, कटाव, बाढ़—सबकी कीमत समाज चुकाता है।
कानून काग़ज़ों में है, रोज़गार नदी के पेट में।
यह विकास नहीं, आने वाली पीढ़ियों से उधार लिया गया समय है।
3️⃣ अनाज — भूख, भंडारण और वितरण के बीच का रोज़गार
अनाज बिहार की आत्मा है, लेकिन यह आत्मा आज वितरण, भंडारण और लीकेज के जाल में फँसी है।
किसान से गोदाम तक, गोदाम से राशन तक—हर कड़ी में लोग काम कर रहे हैं।
किसान को पूरा मूल्य नहीं, गरीब को पूरा हक़ नहीं—बीच में सिस्टम फल-फूल रहा है।
भूख भी रोज़गार बन गई है, और अनाज भी राजनीति।
.  देश और राज्य का तीसरा विकल्प

यह कृषि उन्नति नहीं, व्यवस्था की नैतिक हार है।
असली प्रश्न: उद्योग कहाँ हैं.?
अगर बिहार में रोज़गार का सबसे बड़ा आधार शराब, बालू और अनाज की अव्यवस्था है, तो सवाल सिर्फ़ अर्थव्यवस्था का नहीं—दृष्टि का है।
शिक्षा रोज़गार से क्यों नहीं जुड़ती.?
फूड प्रोसेसिंग, टेक्सटाइल, हैंडीक्राफ्ट, आईटी, ग्रीन एनर्जी—क्यों नहीं फैलते?
क्यों बिहार का युवा उत्पादन की जगह जोखिम चुनने को मजबूर है.?
चेतावनी और संकल्प
बिहार को रोज़गार चाहिए—रैकेट नहीं।
बिहार को उद्योग चाहिए—अव्यवस्था नहीं।
बिहार को नीति चाहिए—नारे नहीं।
यह लेख आरोप नहीं, आत्ममंथन है।
अगर आज सच से आँखें चुराईं, तो कल इतिहास हमें दोषी ठहराएगा।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रकाशन कार्यालय से एडवोकेट Md. Bairam Rakee की आलेख प्रधान सम्पादक/प्रकाशक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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