काव्य रचना :- वही ठाट बाट वही रंग रूप वही वेश भुषा सब कुछ तो है फिर भी है सुना सुना एक तुम्हारे बिना
काव्य रचना :-
वही ठाट बाट वही रंग रूप वही वेश भुषा सब कुछ तो है फिर भी है सुना सुना एक तुम्हारे बिना
🖋️प्रमोद कुमार सिन्हा
वही ठाट बाट वही रंग रूप वही वेश भुषा सब कुछ तो है फिर भी है सुना सुना एक तुम्हारे बिना...
वही हँसी वही मजाक, वही पोशाक वही दोस्त वही मित्र वही सगे सम्बन्धी सब कुछ तो है फिर भी है सुना सुना एक तुम्हारे बिना ,
वही जिंदगी ज़िल्लत भरी है जिंदगी वही घर - बार वही हित मीत वही गीत वही गुनगुनाना फिर भी सुना सुना एक तुम्हारे बिना ,
वही होली वही दीबाली वही पर्व वही त्योहार वही मज़ा वही मस्ती फिर भी है सुना सुना एक तुम्हारे बिना,
तुम हो नहीं तो सब रहते है अंधेरा गुज़र गया वक़्त बीत गया जमाना खिले हैं चार पुष्प फिर भी है सुना सुना एक तुम्हारे बिना ,
आँख में अश्रु पी रहे हम दिल में है कसक फिर भी जी रहे हैं क्या चीज है कमी कुछ भी तो नहीं सब कुछ तो है फिर भी सुना सुना एक तुम्हारे बिना,
फुस का झोपड़ी था बन गया है अब महल चहल पहल में कमी नहीं सगे सम्बन्धियों से भरा घर सब कुछ तो है फिर भी सुना सुना एक तुम्हारे बिना ,
क्या क्या ना गुज़री है ये मेरा दिल जानता है बीत गया कल सबको पहचानता है सब कुछ तो है फिर भी सुना सुना एक तुम्हारे बिना,
आसूं बहाता हूँ बहाने दो अश्क़ जो निकलता है निकल जाने दो जो किया है पछतावा है सब कुछ दिया है फिर भी सुना सुना एक तुम्हारे बिना ,
तुम हो नहीं तो लगता है अंधेरा तुम थी ज़ब अंधेरा भी था सबेरा कमी कुछ नहीं है कमी है केवल तुम्हारा सब कुछ तो है फिर भी है सुना सुना एक तुम्हारे बिना ,
लिखना तो बहुत है क्या क्या बताऊं तुम्हें जो दंस झेला है मैंने क्या सुनाऊँ तुझे ऊँचे शिखर पर पहुँच गया हूँ मैं फिर भी सुना सुना एक तुम्हारे बिना ,
रातें गुज़रती नहीं दिन बितता नहीं एक वो जो ना मिलता क्या होता हमारा कठोर हृदय बना मेरा क्या क्या बताऊं सब कुछ तो है फिर भी है सुना सुना एक तुम्हारे बिना,
क्या क्या हाल बताऊं क्या क्या क्या सुनाऊँ तुम्हें क्या क्या गुज़र रही है क्या क्या सुनाऊँ तुम्हें सब कुछ तो है फिर भी सुना सुना एक तुम्हारे बिना,

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