"जल सूख रहा है, जंगल कट रहे हैं, ज़मीन बिक रही है और जानवर मर रहे हैं—कलेक्टर सो रहे हैं या सिस्टम बिक चुका है?”
"जल सूख रहा है, जंगल कट रहे हैं, ज़मीन बिक रही है और जानवर मर रहे हैं—कलेक्टर सो रहे हैं या सिस्टम बिक चुका है?”
जनक्रांति कार्यालय से अधिवक्ता मोहम्मद बैरम रकी की रिपोर्ट
अगर संविधान “प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा” की बात करता है,तो कलेक्टर, डीएम, एसडीएम और सरकार क्या कर रहे हैं..?
पटना, बिहार (जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन न्यूज डेस्क,खगड़िया, बिहार 10 जनवरी, 2026)। "जल सूख रहा है, जंगल कट रहे हैं, ज़मीन बिक रही है और जानवर मर रहे हैं—कलेक्टर सो रहे हैं या सिस्टम बिक चुका है?”
(जल–जंगल–ज़मीन–जानवर की लूट पर सरकार के नाम खुला आरोप-पत्र) यह कोई पर्यावरणीय लेख नहीं है।
यह सरकार, कलेक्टर और पूरे प्रशासनिक ढांचे के खिलाफ़ सीधी चार्जशीट है।
आज भारत में चार चीज़ें सबसे तेज़ी से नष्ट की जा रही हैं—
जल, जंगल, ज़मीन और जानवर।
और यह विनाश प्राकृतिक नहीं है, प्रशासनिक अपराध है।
अगर संविधान “प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा” की बात करता है,
तो कलेक्टर, डीएम, एसडीएम और सरकार क्या कर रहे हैं?
नदियाँ मर रही हैं, तालाब पट चुके हैं, भूजल लुट चुका है।
पानी अब अधिकार नहीं, माफिया का प्रोडक्ट बन गया है।
हर जिले में अवैध बोरिंग,
हर शहर में जल-माफिया,
और हर फ़ाइल पर प्रशासन की चुप्पी।
अगर कलेक्टर चाहें तो एक आदेश से
सैकड़ों अवैध बोरिंग बंद हो सकती हैं—
लेकिन सवाल यह है:
क्या वे चाह रहे हैं?
पेड़ काटे जा रहे हैं,
जंगल उजाड़े जा रहे हैं,
और बदले में लग रहा है—
“स्मार्ट सिटी”, “इंडस्ट्रियल ज़ोन”, “कॉरिडोर”।
जिस देश में जंगल कटेंगे,
वहाँ बाढ़, सूखा, बीमारी और भूख तय है।
जंगल बचाना पर्यावरण नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है।
खेती की ज़मीन अधिग्रहण में जा रही है,
चारागाह रियल एस्टेट बन रहे हैं,
सरकारी ज़मीन पर मॉल खड़े हैं।
ज़मीन रिकॉर्ड में हेराफेरी,
म्यूटेशन में घोटाला,
और नीचे से ऊपर तक—सिस्टम की हिस्सेदारी।
क्या कोई कलेक्टर यह कह सकता है
कि उसके जिले में एक इंच ज़मीन भी अवैध नहीं बिकी?
हाथी ट्रेन से कट रहे हैं,
गाय सड़कों पर मर रही हैं,
कुत्ते ज़हर से मारे जा रहे हैं,
और पक्षी मोबाइल टावरों से गायब हो रहे हैं।
यह अमानवीयता नहीं तो क्या है?
जिस समाज में जानवर सुरक्षित नहीं,
वहाँ इंसान भी सुरक्षित नहीं रह सकता।
क्या जल, जंगल, ज़मीन और जानवर आपकी प्राथमिकता सूची में हैं?
या ये सिर्फ़ “फ़ाइल का विषय” हैं?
क्या आपकी चुप्पी अयोग्यता है या साझेदारी?
अगर प्रशासन ईमानदार है,
तो उसे डरने की ज़रूरत नहीं।
लेकिन अगर वह चुप है—
तो यह लेख जन-अदालत का समन है।
यह देश केवल बजट, GDP और चुनाव से नहीं चलता।
यह देश चलता है—
जल से, जंगल से, ज़मीन से और जानवरों से।
अगर इन चारों को नहीं बचाया गया,
तो न सरकार बचेगी,
न प्रशासन,
और न ही भविष्य।
यह समय है—
जवाबदेही का, कार्रवाई का और विद्रोह का।

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