बछौता पंचायत: लोकतंत्र का गाँव या भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला..?
"2001 से 2026 तक पंचायत या ‘पंचायती राज का कब्रिस्तान’.? — खगड़िया के बछौता पंचायत की 25 साल की खुली लूट की चार्जशीट!”
जनक्रांति कार्यालय से एडवोकेट Md. Bairam Rakee की रिपोर्ट न्यूज डेस्क, बिहार
खगड़िया,बिहार,(जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन न्यूज डेस्क, बिहार 03जनवरी, 2026)। खगड़िया जिला अन्तर्गत
बछौता पंचायत: लोकतंत्र का गाँव या भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला..?
खगड़िया ज़िले की बछौता पंचायत—
जहाँ काग़ज़ों में “पंचायती राज” चला,
लेकिन ज़मीन पर ‘माईटी राज’ चलता रहा।
2001 से 2026 तक पंचायत बदली, प्रतिनिधि बदले, नाम बदले—
लेकिन लूट का ढांचा नहीं बदला।
चुनाव जीतो, कुर्सी पकड़ो, सिस्टम चला बताओ हर चुनाव में वही कहानी
चुनाव जीतना पक्का व्हाट्सएप प्रचार पक्का जाति– समूह –डर–लालच पक्का और जीत के बाद
योजनाएँ गायब,सड़क काग़ज़ों में,
नल-जल हवा में, मनरेगा फोटो में
यह पंचायत नहीं, "ठेकेदारी लोकतंत्र” है।
सवाल सीधा है—
15वें वित्त आयोग का पैसा कहाँ गया..?
मनरेगा मजदूरों की हाज़िरी किसने लगाई..?
आवास योजना में असली ग़रीब क्यों बाहर रहे..?
पंचायत भवन किसके लिए बना—जनता या गिरोह के लिए..?
अगर सब सही था,तो ऑडिट से डर क्यों..?प्रतिनिधि या रिश्तेदार-राज?
यहाँ चुनाव कोई जनसेवा का रास्ता नहीं, संपत्ति अर्जन का शॉर्टकट बन गया।
पंचायत एक परिवार की जागीर बनती चली गई।
भजन–सत्संग और भ्रष्टाचार का गठजोड़ दिन में भजन, रात में भुगतान।
मंच पर नैतिकता फ़ाइल में अनैतिकता।
अगर सब पाक-साफ़ है, तो—
शिकायत करने वाला हर आदमी “दुश्मन” क्यों.?
सवाल उठाने वाला “मुकदमे में फँसा” क्यों..?
प्रशासन, जिला, और चुप्पी का सौदा
सबसे बड़ा अपराध क्या है?
देखते हुए भी न देखना। जानते हुए भी न बोलना। अगर जिला प्रशासन, पंचायती राज विभाग,और निगरानी एजेंसियाँ सब कुछ जानकर भी चुप हैं
तो यह लापरवाही नहीं, साझेदारी है।
अब सवाल अदालतों तक जाएगा
यह लेख गाली नहीं, कानूनी चेतावनी है।
हाईकोर्ट - से सुप्रीम कोर्ट तक
सार्वजनिक जनहित याचिका (PIL) तक
जाएगा। क्योंकि 25 साल की लूट को ‘स्थानीय मामला’ कहकर दबाया नहीं जा सकता।
अंतिम पंक्ति (जो तहलका मचाएगी)
“बछौता पंचायत में 2001 से 2026 तक अगर विकास नहीं दिखा,
तो समझ लीजिए—
पंचायती राज नहीं चला,
बल्कि ‘पंचायत के नाम पर राज’ चलता रहा।”
यह लेख अगर आपको बेचैन करता है,
तो याद रखिए—
बेचैनी ही बदलाव की पहली शर्त है।

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