जयंती विशेष : नेताजी सुभाष चंद्र बोस आजादी का सेहरा....!

जयंती विशेष : नेताजी सुभाष चंद्र बोस 
आजादी का सेहरा....!

              जयन्त वर्मा
          राष्ट्रीय सलाहकार
     भारतीय राष्ट्रीय फारवर्ड ब्लाँक

इंडिया न्यूज डेस्क, (जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन कार्यालय न्यूज डेस्क 23 जनवरी, 2026)। कवि प्रदीप ने एक गीत लिखा था, जो हर भारतीय की जुबान पर रहता है - ‘‘साबरमती के संत, तूने कर दिया कमाल। दे दी हमें आजादी, बिना खड़ग बिना ढाल।।’’ इस गीत ने यह भ्रम फैलाया है कि देश की आजादी महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस द्वारा चलाए गए अहिंसक स्वाधीनता आंदोलन के कारण हासिल हुई है। वास्तविकता इससे कोसों दूर है। अब धीरे-धीरे जो तथ्य उजागर हो रहे हैं उनसे तस्वीर का दूसरा पहलू सामने आता है।
कांग्रेस पार्टी की स्थापना अंग्रेज आई.सी.एस. आफीसर ए.ओ. ह्यूम ने तत्कालीन वाइसराय लार्ड डफरिन को विश्वास में लेकर 1885 में की थी। उद्देश्य था शासक और शासितों के बीच की दूरी को कम करना। दिसम्बर 1885 में मुम्बई में सम्पन्न कांग्रेस के पहले अधिवेशन में राष्ट्र की प्रगति में लगे लोगों में परस्पर मेल बढ़ाना और सरकार को कौन-कौन से राजनीतिक कार्य करने चाहिये, इनपर चर्चा करना मुख्य एजेण्डा था। इसके पूर्व ईस्ट इंडिया कम्पनी के साथ ग्रेंड लाॅज आॅफ इंग्लैण्ड की एक ब्रांच 1730 में भारत आई थी, जिसकी पहली बैठक कलकत्ता के फोर्ट विलियम में सम्पन्न हुई। इसके बाद फ्री-मेसन नामक एक संगठन भारत में खड़ा किया गया, जिसका उद्देश्य अंग्रेजी हुकूमत के शुभचिंतकों को गोलबंद करना था। कांग्रेस की स्थापना के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रायः सभी अध्यक्ष मेसोनिक लाॅज के सदस्य रहे। ब्रिटिश हुकूमत के हित में स्वाधीनता आंदोलन चले यह सुनिश्चित करना कांग्रेस का मूल लक्ष्य रहा। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस फ्री-मेसन नहीं थे।
1938 में हरिपुरा में सम्पन्न कांग्रेस के 51वें अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष (उस समय वे राष्ट्रपति कहलाते थे) पद पर निर्विरोध निर्वाचन के बाद जब उन्होंने कांग्रेस पार्टी को ब्रिटिश हुकूमत के विरूद्ध संचालित करना प्रारंभ किया तो महात्मा गांधी को यह स्वीकार नहीं था। उन्होंने अपने चहेते पट्टाभिसीतारमैया को सुभाष के विरूद्ध कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में उतार दिया। 1939 में त्रिपुरी (जबलपुर) में सम्पन्न कांग्रेस के 52वें अधिवेशन में गांधीजी के प्रतिनिधि की पराजय हुई। सुभाष ने ब्रिटिश हुकूमत को भारत छोड़ने के लिए 6 माह का अल्टीमेटम देने को प्रस्ताव रखा। गांधीजी को यह मंजूर नहीं था। उन्होंने सुभाष को कार्यसमिति गठित नहीं करने दी और इस्तीफा देने को मजबूर कर दिया।
चन्द्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू जैसे अनेक युवा अंग्रेजी हुकूमत को जड़-मूल से उखाड़ फेंकने के लिए भूमिगत आंदोलन चला रहे थे। गांधीजी की नजर में वे आतंकवादी थे। सुभाष चन्द्र बोस ने महसूस किया कि भारत भूमि में गांधीजी के नेतृत्व में स्वाधीनता हासिल करना असंभव है क्योंकि गांधीजी और उनके अनुयायी साम्राज्यवादी ब्रिटिश हुकूमत से समझौता कर चुके थे। एल्गिन रोड स्थित कलकत्ता के अपने निवास में नज़रबंद सुभाष गुप्त रूप से अफगानिस्तान होते हुए यूरोप, जापान चले गए। फिर सिंगापुर में आजाद हिन्द फौज की कमान सम्हाली तथा दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी, जापान और इटली के सहयोग से बाहूबल द्वारा ब्रिटिश हुकूमत को भारत से खदेड़ देने के लिए असम प्रांत तक अपनी सेना लेकर आ गए। कांग्रेस ने इस खबर को दबा दिया।
युद्ध में जर्मनी, जापान, इटली की पराजय के बाद आजाद हिन्द फौज के तीन सेनानियों पर लालकिले में देशद्रोह का मुकदमा चला। इससे भारतीय लोगों में जबर्दस्त आक्रोश फैला। ब्रिटिश सेना के भारतीय जवानों ने बगावत कर दी। नौसेना, वायुसेना और थलसेना की इस बगावत से ब्रिटिश सल्तनत घबरा गयी। वह 1857 के स्वाधीनता आंदोलन का दुहराव झेलने में असमर्थ था। भारत के वाइसराय ने ब्रिटिश हुकूमत को संदेशा भेजा कि अब भारत में शासन करना खतरनाक हो गया है क्योंकि सेना की निष्ठा बदल गई है। आनन-फानन में लार्ड माउंटबेटन को भारत भेजा गया। कांग्रेस के सहयोग से देश का विभाजन कर अपने विश्वासपात्रों के हाथ सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया चली और 15 अगस्त, 1947 को दो टुकड़ों में बंटा भारत स्वतंत्र हो गया। इतिहास के इस सत्य को इतिहास लेखकों ने चालाकी से नज़रंदाज किया।
स्वाधीनता के बाद तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली भारत आए। कलकत्ता में कार्यवाहक राज्यपाल जस्टिस चक्रवर्ती ने उनसे पूछा कि दूसरा विश्व युद्ध जीतने के बाद ऐसी क्या मजबूरी थी कि भारत में सत्ता का हस्तांतरण कर दिया गया। उन्होंने कहा ‘‘सुभाष के कारण’’। ब्रिटिश फौज के भारतीय सैनिकों की निष्ठा सुभाष की आजाद हिन्द फौज के प्रति हो जाने के बाद हम किसके भरोसे भारत में रहते।
यह बात बाबा साहेब अम्बेडकर ने 1955 में बी.बी.सी. को दिए अपने साक्षात्कार में कही थी, जो यू-ट्यूब पर उपलब्ध है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित कुमार डोभाल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मेजर जनरल (रिटा.) गगनदीप बख्शी ने भी इतिहास के इस पक्ष को उद्यृत किया है, जो यू-ट्यूब में देखा जा सकता है। 
भारत के स्वाधीनता आंदोलन का जो इतिहास ब्रिटिश हुकूमत के शुभचिन्तकों ने लिखवाया है, उसकी समीक्षा का समय आ गया है। सही इतिहास लिखा जावेगा तभी देशभक्तों की नई पौध उभरेगी और सर्व कल्याणकारी शासन कायम होगा।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से केंद्रीय ब्यूरो चीफ प्रमोद कुमार सिन्हा द्वारा संप्रेषित व प्रकाशक संपादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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