विलुप्त होती प्रजाति बचाओ: ईमानदार इंसान अब जंगल में नहीं, सिस्टम में मारे जा रहे हैं!”
विलुप्त होती प्रजाति बचाओ: ईमानदार इंसान अब जंगल में नहीं, सिस्टम में मारे जा रहे हैं!”
जनक्रांति कार्यालय से मोहम्मद बैरम रकी अधिवक्ता की रिपोर्ट
अगर ईमानदार नेता नहीं बचे,
तो संसद सौदेबाज़ी का बाज़ार बन जाएगी।
ईमानदार पत्रकार, ईमानदार नेता, ईमानदार अफ़सर, ईमानदार जज और मजिस्ट्रेट— ये अब प्राकृतिक नहीं, ऐतिहासिक प्रजाति बनते जा रहे हैं : अधिवक्ता मोहम्मद बैरम रकी
जनक्रांति न्यूज डेस्क, बिहार ( जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन कार्यालय 7 जनवरी, 2026)। आज देश में बाघ, हाथी और गैंडे को बचाने के लिए अभियान चल रहे हैं—और यह ज़रूरी भी है।
लेकिन एक सवाल पूरे लोकतंत्र के सीने में छुरा बनकर धँस रहा है—
क्या आपने कभी “ईमानदार इंसान” को बचाने की मुहिम देखी है.?
ईमानदार पत्रकार, ईमानदार नेता, ईमानदार अफ़सर, ईमानदार जज और मजिस्ट्रेट—
अगर जनता ने अब इन्हें संरक्षित नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियाँ इन्हें किताबों में खोजेंगी—
और कहेंगी: “कभी ऐसे लोग भी होते थे!”
🧨 ईमानदारी अब अपराध क्यों बन गई.?
आज का कड़वा सच यह है कि:
जो अफ़सर ईमानदार है, वह “ट्रांसफ़र लिस्ट” में रहता है।
जो पत्रकार सच लिखता है, वह “टार्गेट” बनता है।
जो नेता जनता की बात करता है, वह “हाशिए” पर भेज दिया जाता है।
ईमानदारी अब पुरस्कार नहीं, सज़ा बन चुकी है।
हम रिश्वत लेने वाले अफ़सर को “काम का” कहते हैं,
और ईमानदार अफ़सर को “अड़ियल”।
हम बिकाऊ पत्रकार को “समझदार” मानते हैं, और सच बोलने वाले को “एजेंडा वाला”।
हम चुनाव में जाति, धर्म और शराब देखते हैं,
चरित्र नहीं।
फिर सवाल उठता है—
जब जनता ही संरक्षण नहीं देगी, तो ईमानदार बचेगा कैसे.?
ईमानदार लोग किसी पार्टी, धर्म या विचारधारा की जागीर नहीं होते।
वे सिस्टम की रीढ़ होते हैं।
और जब रीढ़ टूटती है,
तो शरीर ज़िंदा होकर भी अपाहिज हो जाता है।
आज भारत में लोकतंत्र साँस ले रहा है
लेकिन न्याय, पत्रकारिता और प्रशासन का ज़मीर ICU में है।
तो अदालतें सिर्फ़ इमारत रह जाएँगी।
अगर ईमानदार पत्रकार नहीं बचे,
तो ख़बरें विज्ञापन बन जाएँगी।
अगर ईमानदार नेता नहीं बचे,
तो संसद सौदेबाज़ी का बाज़ार बन जाएगी। और अगर ईमानदार अफ़सर नहीं बचे, तो शासन सिर्फ़ फ़ाइलों का कब्रिस्तान बन जाएगा।
ईमानदार को अकेला मत छोड़िए।
उसके साथ खड़े होइए।
उसकी आवाज़ को साझा कीजिए।
उसे वोट, समर्थन और सुरक्षा दीजिए।
याद रखिए—
ईमानदार लोगों को अगर जनता ने नहीं बचाया,
तो आने वाले समय में हम उन्हें देखने के लिए तरस जाएँगे।
यह लेख किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं,
पूरे देश के ज़मीर के लिए है।
आज भी वक्त है—
“विलुप्त होती प्रजाति” को बचाइए,
वरना कल इतिहास हमसे पूछेगा—
जब ईमानदारी मर रही थी, तब आप क्या कर रहे थे..?”

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