आध्यात्मिक चिंतन - मनन . 🌹🙏 समर्पण 🌹🙏. कहने का भाव है कि पूर्ण समर्पण का भाव यदि आपके ह्रदय में पूर्ण रूपेण समर्पण भाव होना अत्यंत कठिन और दुर्लभ है लोग ऐसा करते हैँ कहाँ ?
आध्यात्मिक चिंतन - मनन
. 🌹🙏 समर्पण 🌹🙏
कहने का भाव है कि पूर्ण समर्पण का भाव यदि आपके ह्रदय में पूर्ण रूपेण समर्पण भाव होना अत्यंत कठिन और दुर्लभ है लोग ऐसा करते हैँ कहाँ ?
🖋️ प्रमोद कुमार सिन्हा, बाघी
आध्यात्मिक चिंतन डेस्क, इंडिया (जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन कार्यालय 08 जनवरी, 2026)। भगवान श्री कृष्ण पार्थ के प्रति कहते हुए पुरे मानव जाती के लिये ये श्लोक उद्धरित करते हैँ। हे.. अर्जुन जो भक्त पूर्ण निष्ठा भाव से किसी ऒर ध्यान ना देते हैँ और पूर्ण समर्पित होकर मेरे प्रति अनन्य भाव से समर्पित होकर परम विश्वास पूर्वक उन पर केंद्रित हो जाते हैँ और बिना किसी अन्य इच्छा के उनकी भक्ति करते हैँ। भगवान स्वयं उनकी सभी जरूरतों को पुरा करते करते हैँ और उनके पास जो कुछ भी है उनकी रक्षा स्वयं वे करते हैँ।
कहने का भाव है कि पूर्ण समर्पण का भाव यदि आपके ह्रदय में पूर्ण रूपेण समर्पण भाव होना अत्यंत कठिन और दुर्लभ है लोग ऐसा करते हैँ कहाँ ? सभी भाव में उनका तन मन तो इक्षा लिये ही कर्म करते हैँ तब भगवान इस विन्दु पर कोई भी कदम उठाने को तैयार नहीं होने को बाध्य हैँ ये *समर्पण * शब्द बड़ा ही गंभीर विषय की बात है लोग तो अपनी इक्षा और मनमानी के ही उनकी उपासना करते हैँ कुछ न कुछ ह्रदय में प्रभु से माँग की इक्षा लिये ही उनकी उपासना करते रहते हैँ ये सभी कहते तो जरूर हैँ की हम बड़े ही भाव से भगवान की इक्षा भाव होता ही है लेकिन बड़े ही दम्भ और लोग उनके जाने की हम बड़ा ही ईश्वर की भक्ति और आराधना करते हैँ,
तिलक - चंदन लगाकर समाज में अपने श्रेष्टता सिद्ध करने के लिए ही आडम्बर कर अपने को सर्व श्रेष्ट होने का दिखावा ही करते रहते हैँ, क्या उनके अन्तः करण में ये निस्वार्थ का भाव होता है। यदि ये निस्वार्थता भाव उनके ह्रदय में नहीं है तो वो प्रभु उनके अन्तः करण में ही स्थित हैँ उनसे कोई बात छुपी नहीं रहती है वे सबके हाव भाव और विचार को अच्छी तरह समझते हैँ वे प्रभु कोई मूर्ति थोड़े हैँ वे तो घट - घट के वासी हैँ वे प्रभु जिसे आत्मा कहा जाता है ना कोई मंदिर, ना ही कोई मस्जिद, न गिरजा न गुरुदरबार, न कोई चर्च में बैठे हैँ हमने तो उसे कैद कर रखा अपने अपने विचारों और संप्रदाय के अंदर और बड़ा ही दम्भ रखते हैँ की आह हम प्रभु को भजते रहते हैँ माला जपते रहते हैँ.
_जैसे जल को गिलास में रखें तो गिलास का आकार घड़े में रखें को घड़े का आकार लोटे में रखें तो लोटे के अनुसार हिन्दू - मुलमान - सिख - ईसाई - पारसी सभी तो ऐसा ही करते हैँ उसे छोटे छोटे टुकड़ों में बाँध रखा है जैसे की राम, कृष्ण, दुर्गा, काली, अल्लाह अकबर इत्यादि इत्यादि कभी हमनें अपने मन में कभी भी ऐसा विचार किया है जो इतनी विराट संरचना को धारण कर रखा है उस परम अज्ञात सृष्टि सृजनहार जिसने पुरे ब्रह्माण्ड की रचना बिना किसी भेद - भाव की संरचना की है ये तारे, ग्रह, नक्षत्र ये विशाल पृथ्वी का कहीं कोई आधार है ?
आज हम मकान बनाते हैँ तो उसका नींव डालते हैँ उस अज्ञात विराट ने इतनी बड़ी संरचना कर रखी है कोई उसका नींव है? यदि है तो कहाँ और कोई हमें दिखाये उस अज्ञात विराट संरचना करने बाले ईश्वर को हमनें लोटे में कटोरे में गिलास में छोटा कर दिया है और कहते हैँ मेरा भगवान सर्वश्रेष्ट तो मेरा भगवान सर्वश्रेष्ठ है ना यही बात कोई हनुमान को पूजता है तो कोई अल्लाह - अकबर कोई कोई उसे देखा है ? वह प्रभु इतना विशाल इतना विशाल की कोई उसका ऒर छोड़ नहीं है तो अनन्य भाव है कहाँ ?
यह सब पाखंड है कोई त्रिपुण्ड लगाता है तो कोई चमत्कार दिखाता है और कहता है हनुमान जी मेरे पास आये काली जी मेरे पास आये है ना यही बात ? मुसलमान कहता है वो मस्जिद में वो अल्लाहु अकबर है क्या अल्लाहु अकबर को हमने कैद नहीं कर रखा है ? छोटा नहीं बना रखा है पानी पीते हैँ त्रास मिटता है? अब मैं पुछु ये त्रास क्या है आप हमें दिखलाओ आप उसे कैसे दिखला सकते हैँ ये तो अनुभव की बात अनुभव की बात को वही जान सकता है जिसे आप पानी पीला दो जैसे किसी को शरीर में कहीं कोई दर्द है और वो कहे की मेरे पेट में दर्द है डॉ के पास जाये और कहे की मुझे दर्द है और डॉ कहे की कहाँ कहाँ दर्द है मुझे दिखलाओ तो क्या आप उसे दिखला सकते हो ? ** जैसे गूँगा गुड़ खाय के कहे कौन मुख स्वाद ** आज प्रवचन जगह जगह जगह हो रहा कथा घर - घर हो रहा है और कहते हैँ वह अज्ञात है मन वाणी और बुद्धि से पड़े तो मेरा प्रश्न है जो मन, वाणी और बुद्धि से पड़े उसे कैसे व्यक्त कर रहे हो कहते तो शास्त्र की बात क्या कभी वो शास्त्र में दिखा जो अनुभव की विषय है उसे हम मन और वाणी से व्यक्त नहीं कर रहे हैँ है ? गीता में भगवान ने तो यह भी कह रखा है हे अर्जुन मैं *अव्यक्त अक्षर हूँ जिसका कभी नाश नहीं होता * तो जो अव्यक्त है आप उसे कैसे व्यक्त कर सकते हो ? कहते हो वो मन - वाणी और बुद्धि से पड़े है तो बुद्धि से कैसे व्यक्त कर रहे हो.? सारा का सारा मामला बुद्धि से कर रहे हो कैसे. ? कभी इस पर विचार किया.? कबीर साहब का कथन है :-
* तू कहे कागत के लेखी मैं कहता हूँ आँखन देखी * क्या सफ़ेद अक्षरों में काले काले शब्दों में लिखा शब्द को पुनरावृति नहीं कर रहे हो.? अरे सत्य बोलना संसार में कितना गुनाह है.? सत्य बोलने वाले ईशा मशीह को सूली पर नहीं टांग दिया.? सत्य बोलने बाले मंसूर को हाथ पाऊँ जिहवा नहीं काट लिया.? सत्य बोलने बाले सुकरात को जहर का प्याला नहीं पिलाया.? सत्य बोलने बाले प्रहलाद को कितने कितने कष्ट तूने दिये है न वही बात सत्य कहना बड़ा ही आसान है बोलना बहुत गुनाह , हो सकता है इसका दंड मुझे भी मिले मैं घबराता नहीं हूँ सत्य बोलने पर मीरा को कितने कष्ट सहने पड़े.? तो विषय बड़ा ही लम्बा और गंभीर हो जायेगा इस पर चर्चा करना ही व्यर्थ का बकबास है किसी वैज्ञानिक ने कहा है "
the god is note kwon but also unnowoble * ईशा मशीह ने कहा है v" i am son of god , who will enter my fathers kingdom jo just innocent like a child " तो पुनः हम इस विन्दु पर पहुँचे की श्रीकृष्ण भगवान की उपरोक्त श्लोक में उक्ति है जो अनन्य भाव से मेरी भक्ति करता है उस अनन्य भाव से भक्ति करने बाले भक्त का सारा वहन मैं करता हूँ और जो उसे प्राप्त है उसकी रक्षा और भरण - पोषण की जिम्मेवारी मैं लेता हूँ।
तो उपरोक्त विन्दुओं पर गहन - चिंतन मनन करें ऐसा अभी पुरे विश्व में एक मात्र संत कहें यह भी ठीक नहीं है उन्होंने कह रखा है ** बून्द समानी समुद्र में सबने जानी , समुद्र समानी बून्द में हमने ( मैंने ) जानी उस संत का नाम है ** बाबाजी विजय वत्स ** जो की पंजाब प्रांत अंतर्गत भटिंडा से तीस किलो मीटर दुर ** गीददरबाहा में रहते हैँ और लगभग तेरह चौदह वर्षो से कुछ भी खाया नहीं है।
मात्र तीन समय दो सौ ग्राम दूध सुबह दो सौ ग्राम दूध दोपहर और दो सौ दूध साँझ पर अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैँ अब तो शायद दो बार अतिरिक्त वो दुग्धपान भी नहीं कर रहे हैँ वो तीस वर्षो से किसी से भी मिलते जुलते नहीं है किसी भी प्रकार के दान वो स्वीकार नहीं करते हैँ भगवान शंकर के विशेष अनुरोध में खास कर भारत में " भ्र्ष्टाचार, व्यभिचार, अन्याय के खिलाफ उन्होंनें एक मुहीम भगवान शंकर के आदेश पर ही छेड़ रखी है।
ग़रीबी मिटाओ हम उनकी इस मिशन से जुड़े उनकी नई राजनितिक पार्टी का है the golden sparrow , इस मुहीम से जुड़कर हम सहभागिता बनें जो निम्न है www.the golden sparrow. org एक बेबसाईट है उस पर क्लिक करें भाषा का बेबसाईट आयेगा भाषा को चयन कर क्लिक करें फॉर्म आयेगा उसमें अपना नाम पता और मोबाइल नम्बर डालें बस इतना ही आपको करना है जितना जल्दी आप इस मुहीम से जुड़ेंगे उतना ही जल्दी कार्य आगे बढ़ेगा और हमारा भारत देश पुनः ** सोने की चिड़िया ** बन जायेगा।

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