"काले कोट के नीचे कुचला हुआ भविष्य: जूनियर वकील—जो न्याय व्यवस्था का सबसे सस्ता ईंधन है”
"काले कोट के नीचे कुचला हुआ भविष्य: जूनियर वकील—जो न्याय व्यवस्था का सबसे सस्ता ईंधन है”
जनक्रांति कार्यालय से अधिवक्ता मोहम्मद बैरम रकी की रिपोर्ट
सबसे आख़िर में जाने वाला,
और सबसे कम सुना जाने वाला इंसान :- मो. बैरम रकी अधिवक्ता
खगड़िया,बिहार, (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन न्यूज़ डेस्क 13 जनवरी, 2026)। "काले कोट के नीचे कुचला हुआ भविष्य: जूनियर वकील—जो न्याय व्यवस्था का सबसे सस्ता ईंधन है”
भूमिका: जो दिखता नहीं, वही सिस्टम को चलाता है
जूनियर वकील—
अदालत में सबसे पहले आने वाला,
सबसे आख़िर में जाने वाला,
और सबसे कम सुना जाने वाला इंसान।
वह न्याय व्यवस्था का वह पहिया है
जिसके बिना गाड़ी नहीं चलती,
लेकिन जिसका नाम कभी पोस्टर पर नहीं होता।
क़ानून की मोटी किताबों में
उसके लिए कोई अलग अध्याय नहीं,
फिर भी हर फ़ाइल, हर तारीख़,
हर मुक़दमे में
उसकी छाया नहीं—उसका पसीना होता है।
लॉ कॉलेज में सिखाया जाता है—
“वकील बनो, समाज बदलो, संविधान बचाओ।”
लेकिन कोर्ट में कदम रखते ही
सबसे पहले टूटता है इंसान,
सिस्टम नहीं।
आदर्श मरते हैं
आत्मसम्मान गिरवी लगता है
और सपने Adjournment पर चले जाते हैं
💸 फीस सबकी, कमाई किसी की नहीं
बार काउंसिल की फीस
वेलफेयर फंड
एग्ज़ाम फॉर्म
ID कार्ड
स्टाम्प
ज़ेरॉक्स
फाइल
पेट्रोल
सब भरने के बाद
जेब खाली
और उम्मीदें उधार में चली जाती हैं।
घरवालों को लगता है—
“अब तो वकील बन गया, अब कमाएगा।”
लेकिन जूनियर वकील का पहला अपराध यही होता है
कि वह सीखे बिना कमाने की कोशिश नहीं करता।
⚖️ सीनियर का चैंबर: प्रशिक्षण या शोषण?
सीनियर के चैंबर में एंट्री
ऐसे मिलती है
जैसे कोई एहसान मिल गया हो।
बदले में आत्मसम्मान गिरवी
समय बंधक
मेहनत मुफ्त
मोटरसाइकिल
फाइलों का बोझ
और सीनियर का मूड
यही जूनियर वकील की रोज़ की किट होती है।
📂 “अनुभव” के नाम पर अपमान
तारीख़ लेना
पेशकार को मनाना
बाबू के आगे हाथ जोड़ना
सब कुछ
“अनुभव” कहलाता है।
सीनियर की एक डांट
पूरे दिन की मेहनत पर भारी पड़ जाती है।
चाय कभी खुद के पैसों से,
और कई बार
सीनियर के मूड के हिसाब से।
🌙 रात की थकान, सुबह की उम्मीद
रात देर से घर लौटकर
थकी आँखों में सपने सजाए रखना
जूनियर वकील की मजबूरी है।
वह मुस्कुराता है
ताकि माँ-बाप को चिंता न हो,
और चुप रहता है
ताकि चैंबर बचा रहे।
💼 सालों की जूनियरशिप, “वेतन” शून्य
साल बीतते जाते हैं,
लेकिन
“वेतन” शब्द सिर्फ़ दूसरों के पेशों में होता है।
गलत पर सवाल उठाओ—
तो सीखने वाला नहीं,
“बदतमीज़ जूनियर” घोषित कर दिए जाते हो।
💔 रिश्ते, उम्र और ख़ामोशी
शादी की उम्र निकलती जाती है।
रिश्ते पूछते हैं—
“कमाई कितनी है?”
और जवाब में
सिर्फ़ ख़ामोशी होती है।
अपनी किताबें खरीदने की हैसियत नहीं,
और दूसरों की किताबों पर
कोई हक़ भी नहीं।
दोस्त छूटते हैं,
रिश्ते टूटते हैं,
क्योंकि कोर्ट कभी इंतज़ार नहीं करता।
🧾 अपना मुक़दमा भी अपना नहीं
अपना लाया हुआ मुक़दमा भी
जूनियर का नहीं रहता।
फीस पूरी जाती है
हिस्सा शून्य
अदालत में उसे
सिर्फ़
“तारीख़ वाला वकील” समझा जाता है।
समाज कहता है—
“वकील साहब”
लेकिन उसकी कमाई
मज़दूरी से भी कम होती है।
⛓️ दूसरा काम? लाइसेंस पर तलवार
दूसरा काम करने की सोचे
तो लाइसेंस पर तलवार लटक जाती है।
चैंबर छोड़ा—
तो बदनामी तय,
क्योंकि मुफ्त की मेहनत
जो छिन गई।
❓ आज़ादी के बाद सवाल
जब कभी आज़ाद होकर
वकालत शुरू करता है,
तो यही सवाल सालता है—
“इतने साल क्यों सहा?”
फिर भी
अगली सुबह
वही काला कोट पहनकर
वही उम्मीद लेकर
अदालत पहुँच जाता है।
🔥 निष्कर्ष:
जूनियर वकील हारता नहीं है,
वह बस
रोज़ थोड़ा-थोड़ा टूटता है।
भारत की न्याय व्यवस्था
अगर खड़ी है,
तो उन्हीं कंधों पर
जिन्हें सबसे कम मज़दूरी,
सबसे ज़्यादा अपमान
और सबसे लंबा इंतज़ार मिलता है।
⚠️ आख़िरी पंक्ति (जो सिस्टम को चुभे):
“जिस न्याय व्यवस्था में
जूनियर वकील भूखा है,
वहाँ न्याय का पेट
कभी नहीं भर सकता।”
Adv Md Bairam Rakee Khagaria Bihar India

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