जयंती विशेष: नेता जी सुभाष चंद्र बोस। समझौते वाली आजादी...!
जयंती विशेष: नेता जी सुभाष चंद्र बोस।
समझौते वाली आजादी...!
जयन्त वर्मा
राष्ट्रीय सलाहकार
भारतीय राष्ट्रीय फारवर्ड ब्लाक
इंडिया न्यूज डेस्क,( जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन कार्यालय न्यूज डेस्क 23 जनवरी, 2026)। लगभग चार दशक पूर्व सोवियत संघ के विघटन के साथ ही शीतयुद्ध खत्म हुआ और आज भारत सहित दुनिया के प्रायः सभी गैर-समाजवादी विकासशील देश अमेरिकी साम्राज्यवाद की चपेट में आ चुके हैं।
सुभाषचंद्र बोस ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के हरिपुरा अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में 1938 में कहा था - ‘‘हमारा भारत केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरूद्ध नहीं है, बल्कि विश्व साम्राज्यवाद के विरूद्ध है, जिसका ब्रिटिश साम्राज्यवाद एक महतवपूर्ण भाग है। इसलिए हम केवल भारत के लिए जंग नहीं लड़ रहे, बल्कि सारी मानव जाति के लिए। भारत की आजादी का मतलब है मानवता की सुरक्षा।’’
साम्राज्यवाद के खिलाफ निर्णायक युद्ध छेड़ने के सुभाषचन्द्र बोस के क्रांतिकारी रूख ने उन्हें ब्रिटिश हुकूमत का सबसे बड़ा शत्रु बना दिया था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी का दक्षिणपंथी धड़ा अंग्रेजी हुकूमत से समझौता करके आजादी हासिल करने के लिए जी-जान से लगा था। 1939 के त्रिपुरी (जबलपुर) अधिवेशन में सुभाषचन्द्र ने कांग्रेस के भीतर युवा, समाजवादी और वामपंथी घटक के समर्थन से अध्यक्ष पद के चुनाव में दक्षिणपंथी गुट के प्रतिनिधि पट्टाभि सीतारमैया को पराजित कर दिया था। दक्षिणपंथी कम संख्या में होकर भी एकजुट थे और बहुमत वाला युवा, समाजवादी वामपंथी घटक असंगठित था। त्रिपुरी के अपने अध्यक्षीय भाषण में सुभाष ने अंग्रेजी हुकूमत को भारत छोड़ देने का 6 माह का अल्टीमेटम देने की घोषणा की। महात्मा गांधी और पं. जवाहरलाल नेहरू ने इसका विरोध किया क्योंकि वे ब्रिटिश शासन के साथ संघर्ष की बजाय समझौते के पक्षधर थे। दक्षिणपंथी गुट ने सुभाषचन्द्र बोस से असहयोग प्रारंभ कर दिया और अध्यक्ष के रूप में उनका काम करना असंभव बना दिया। अंततः 29 अप्रैल 1939 को सुभाष ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और कांग्रेस के भीतर ही वामपंथी और समाजवादियों को संगठित करने के लिए फारवर्ड ब्लाॅक का गठन किया जिसके वे संस्थापक अध्यक्ष बने।
फारवर्ड ब्लाॅक ने समझौते से आजादी प्राप्ति के खिलाफ देशव्यापी जनजागरण अभियान चलाया। उस समय के विख्यात किसान नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती द्वारा रामगढ़ के समझौता विरोधी सम्मेलन में मार्च 1940 में सुभाष ने कहा था - ‘इस देश में यदि साम्राज्यवाद से कोई समझौता हो गया तो देश के वामपंथियों को न केवल साम्राज्यवाद से लड़ना होगा बल्कि साम्राज्यवाद से समझौता करने वाले उसके (साम्राज्यवाद के) नए हिन्दुस्तानी दोस्तों से भी लड़ना होगा।’
ब्रिटिश हुकूमत से समझौते के तहत 15 अगस्त 1947 को सत्ता के हस्तांतरण के साथ जो आजादी मिली उसमें भारत का विभाजन हुआ तथा साम्प्रदायिक हिंसा में 10 लाख से भी अधिक लोग मारे गए।
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को दृढ़ विश्वास था कि आजाद भारत में गरीबी, बेकारी, अशिक्षा, शोषण, स्वास्थ्यहीनता और भुखमरी का निदान समाजवादी समाजरचना से ही संभव हे। ऐसा समाज बनाने के लिए उन्होंने राष्ट्रीय योजना समिति की स्थापना कर दी थी। उन्होंने राजनीतिक कार्यकर्ताओं में समाजवादी दृष्टि विकसित कर उनमें विभिन्न विषयों की गहरी समझ बनाने की आवश्यकता को रेखांकित किया था।
सुभाषचन्द्र बोस में केवल भारत ही नहीं बल्कि समूची मानवता का कल्याण करने की विश्व दृष्टि और नेतृत्व क्षमता थी। दक्षिणपंथी षड़यंत्रकारियों ने भारत की जनता को उनके नेतृत्व से वंचित करके देश को उनके मार्ग से भटका कर जो अनर्थ किया उसका दुष्परिणाम आज भारत की 80 फीसदी आबादी को भुगतना पड़ रहा है।
नेताजी का हरिपुरा, त्रिपुरी और रामगढ़ का भाषण तथा त्रिपुरी अधिवेशन के बाद कांग्रेस की राजनीति में आए बदलाव बावद स्वयं सुभाष का विश्लेषण इस आलेख में पुस्तुत है। हमें विश्वास है कि विषमता, बेकारी, निर्धनता से जूझ रही 75 फीसदी आबादी वाले वर्तमान भारत की दुर्दशा का कारण समझने में नेताजी का विश्लेषण सहायक होगा।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से केंद्रीय ब्यूरो चीफ प्रमोद कुमार सिन्हा द्वारा संप्रेषित व प्रकाशक संपादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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