स्व - मंथन. जो अपनों का ना हुआ , वो गैरों का कैसे होगा : प्रमोद कुमार सिन्हा
काव्य संग्रह...
स्व - मंथन
जो अपनों का ना हुआ , वो गैरों का कैसे होगा
जो अपनों का ना हुआ , वो गैरों का कैसे होगा कैसे.? जो सात - फेरों का न हुआ,
वो बिन फेरों का है जैसे,
पहले अपने - आप को संभाले,
फिर दुनिया की ऒर निहारे,
उँगुली उठाना है कितना आसान , सोच - समझकर अपने मन में विचारे बिना बिचारे जो करता काम,
होता नहीं उसका काम आसान।
दोष - लाँक्षण दूसरे पर लगाता रहता दीख पड़ता नहीं दोष अपना होता परेशान ,
जीवन में सोच - समझकर कदम उठाना फूँक - फूँक कर है कदम दर कदम उठाना, राहें मंजिलें हो जाती है आसान, करता नहीं है, जीवन में जो अभिमान सफलता चूमती रहती होता है सम्मान। प्रमोद कुमार सिन्हा ,सम्मानित जे पी सेनानी , बिहार - सरकार
प्रेम का भूखा हूँ मैं प्रेम का ही है इंतज़ार, स्नेह आशिर्बाद मिले पुत्र को विनती है बारम्बार।

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