जयंती विशेष : नेता जी सुभाष चंद्र बोस नेताजी की विरासत

जयंती विशेष : नेता जी सुभाष चंद्र बोस 

नेताजी की विरासत

                   जयन्त वर्मा
                राष्ट्रीय सलाहकार
        भारतीय राष्ट्रीय फारवर्ड ब्लाक

इंडिया न्यूज़ डेस्क, (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन कार्यालय न्यूज़ डेस्क, 23 जनवरी, 2026)। भारतवासियों का दुर्भाग्य था कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज द्वारा अंग्रेजी हुकूमत के विरूद्ध किए गए संघर्ष के फलस्वरूप देश को आजादी नहीं मिल सकी और इस राष्ट्र का नवनिर्माण उनकी अगुवाई में नहीं हुआ। यह निर्विवाद है कि देशवासियों को दासतामुक्त कराने का सबसे बड़ा संघर्ष आजाद हिन्द फौज ने किया। 1943 में तत्कालीन असम और वर्तमान नागालैण्ड के कोहिमा तथा मणिपुर के इम्फाल मोर्चो पर अंग्रेजी सेना के साथ हुये घमासान युद्ध में आजाद हिन्द फौज के लगभग 26 हजार वीर सेनानी शहीद हुए।
सत्ता हस्तांरण के माध्यम से भारत को जो राजनीतिक स्वतंत्रता मिली उसमें देश का सामाजिक, आर्थिक ढांचा पूर्ववत् ही कायम रहा। ब्रिटिश हुकूमत के अनेक चाटुकार तथा समाज विरोधी लोग कांग्रेसी नेता और मंत्री बनकर अपनी स्वार्थसिद्धि में लग गए। नतीजा यह है कि 60 वर्ष की स्वाधीनता के बाद भी समाज में व्याप्त गरीबी, बेकारी, भ्रष्टाचार, अन्याय और शोषण खत्म होता नजर नहीं आता है। गांव और शहर के बीच विषमता बढ़ रही है। असंगठित और कमजोर वर्ग का जीवन निरंतर शोषण और दमन से ग्रसित रहता है। कृषि प्रधान भारत में किसानों को आत्महत्या करने के लिए विवश कर दिया गया है। देशभक्ति, कहानियों और उपन्यासों तक सीमित रह गई है। अनेक देशद्रोही जिन्हें सीखंचों के भीतर रहना चाहिये वे संसद और विधानसभाओं के सदस्य या मंत्री बनकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं क्योंकि ब्रिटिश कालीन कानूनों की नजर में या तो वे अपराधी नहीं हैं, अन्यथा उन्हें अपराधी सिद्ध करना असंभव हो गया है।
ब्रिटिश हुकूमत ने जनसाधारण पर अविश्वास और तंत्र पर विश्वास, समाज के अपनी व्यवस्था संचालित करने नैसर्गिक अधिकर पर रोक तथा समुदाय के भौतिक संसाधनों की लूट के सिद्धान्त पर असंख्य कानून बनाकर जो व्यवस्था कायम की थी उसे बदलने की इच्छा शक्ति किसी भी राजनीतिक दल में नहीं है। आजादी के बाद नेताजी सुभाष के नेतृत्व में सरकार बनती तो वे तमाम कानून तत्काल रद्द कर दिये जाते, जिनकी मदद से अंग्रेजी हुकूमत ने भारतवासियों को गुलाम बनाया था।
भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में नेताजी सुभाष के योगदान को नकारने के तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद आज भी नेताजी का स्मरण देशवासियों में अद्भुत उत्साह का संचार करता है। जाति, धर्म, सम्प्रदाय, अमीर और गरीब , ऊंच-नीच तथा व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर मातृभूमि के लिए तन, मन और धन न्यौछावर कर बलिदान होने तक की जो प्रेरणा नेताजी से देशवासियों की मिली वह भारत के अन्य किसी राजनेता को हासिल नहीं होती। नेताजी ने जिस भारत का सपना देखा था और उसे साकार करने हेतु जो बीड़ा उठाया था वैसा समाज और देश बनाना है तो हमें नई पीढ़ी को नेताजी की विरासत और उनके व्यक्तित्व तथा बलिदान से परिचित कराना होगा। समतापूर्ण समाज रचना के लिए नेताजी की विरासत को सहेजना और जन-जन में उसका संचार करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
पं. जवाहरलाल नेहरू द्वारा नेताजी के परिवार की खुफिया तंत्र द्वारा जांच से संबंधित ताजा तथ्यों से स्पष्ट है कि नेहरू की जानकारी में नेताजी को भारतवासियों से दूर रखा गया था क्योंकि वे प्रकट हो तो स्वाधीन भारत अंग्रेजी शासन के हित पोषण वाला नहीं रहता तथा वास्तविक रूप से आजाद हो जाता।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से केंद्रीय ब्यूरो चीफ प्रमोद कुमार सिन्हा द्वारा संप्रेषित व प्रकाशक संपादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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