आध्यात्मिक चिंतन-मननज़ब सृष्टि का निर्माण उस विराट अज्ञात सृजनहार द्वारा रचना की गयी थी उस बक्त क्या था …?
आध्यात्मिक चिंतन-मनन
ज़ब सृष्टि का निर्माण उस विराट अज्ञात सृजनहार द्वारा रचना की गयी थी उस बक्त क्या था …?
जनक्रांति कार्यालय से केंद्रीय ब्यूरो प्रमोद कुमार सिन्हा
ज़ब सृष्टि का निर्माण उस विराट अज्ञात सृजनहार द्वारा रचना की गयी थी उस बक्त क्या था ?
आध्यात्मिक चिंतन मनन का ये चौथा व्ययखान का चौथा विन्दु पर हम सभी चर्चा करें
ईशा मशीह का कथन जो बाइबिल में उद्धरित है उनका god के प्रति जो कहना है हम उसे भली भांति जान लें और भली भांति जानकर उस पर अमल करें, ज़ब सृष्टि का निर्माण उस विराट अज्ञात सृजनहार द्वारा रचना की गयी थी उस वक्त क्या था ?
उस समय केवल और केवल एक़ शब्द था जिसका गुंजायमान आज भी सर्वत्र हो रहा है केवल ना जानने की वजह से हम अनजान हैँ जिसे वेदों और उपनिषद में बताया गया है उसे "" अनहद नाद "" से उद्धरित किया है श्रेष्टी रचायिता ने सारी शक्ति छुपा कर स्वं के ह्रदय में ही बल उस शब्द को गुप्त कर रख लिया है उसी बात की ऒर ईशा मशीह का भी इशारा है सृष्टि निर्माण से पहले एक़ शब्द था और वह शब्द भगवान था और इतना ही सारे शंशय को हटाकर ईशा ने कहा है वह शब्द ही भगवान है यानी उस शब्द के पीछे मात्र छोटा सा इशारा कर बताने की चेष्टा की वह "था " शब्द को हटाकर उसे "है " में प्रगट कर दिया है यानी भगवान था नहीं बल्कि है ।
इसी शब्द की ऒर बाबा नानक ने भी कहा है "" जेता तेता तेते नाव, बिन नामें नहीं कोई ठावं "" संसार में आकाश में जल में थल में केवल परमात्मा के नाम का ही पसारा है बिना नाम के कोई भी स्थान ऐसा नहीं है
कहने का मर्ज है ये पुरी सृष्टि ही उस नाम से गुंजायमान हो रहा कहीं भी स्थान उस नाम के बिना नहीं है अब प्रश्न उठना स्वभाबिक है वह परमात्मा का नाम क्या है परमात्मा का नाम अवक्त है जिसे व्यक्त नहीं किया जा सकता है जिसे गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को समझाने के बहाने समस्त मानव समाज के प्रति कहा है चाहे हिंदू हों या मुस्सेलम ईमान, चाहे इशाई हों चाहे पारसी, चाहे बौद्ध हों या सिख ( सिख का शाब्दिक अर्थ है सीखने बाला उसे ही सिख कहा गया है हे अर्जुन मैं वह अवक्त अक्षर हूँ जिसका कभी नाश नहीं होता , उदाहरण के तौर पर बताऊं तो समझने में कोई दिक्क़त नहीं होगी, अक्सर आप देखते होंगें की हवा तीव्र गति से चलती है या तूफान के समय आबाज बड़े ही जोर से गूंजती है उस समय एक़ सरसराहट आबाज प्रायः सबों ने सुनी होगी संन सं की आवाज होती है मैं अब आपसे प्रश्न करूँ की ये आबाज जो बहरा है वो व्यक्त नहीं कर सकता है वही शब्द की ऒर इशारा सभी संतों ने किया है वास्तविक रूप से वह शब्द ही भगवान है
वेदों में उपनिषदों में प्रायः अनहद की चर्चा की गयी है ( अनहद का अर्थ है जो बिना टकराये आबाज निकलती है उसे अनहद कहते हैँ और टकराकर जो आबाज पैदा होती है आहत कहते हैँ अब एक़ प्रश्न मैं विन्रम पूर्वक पूछना चाहता हूँ की जैसे दोनों हाथ से आप तालियां बजाते हैँ तो क्या होता है एक़ आबाज होती है वह आबाज कैसी है कृपया बताने का कष्ट करें आप उसे कहियेगा अरे यह तो तालियों का आबाज है या जैसे आप बोलते हैँ तो जिहवा अंतर्गत आपका वोकल कार्ड्स आपस में टकराती है यानी कंपन होता है और उसे व्यक्त करते हैँ तो बहरा क्यों नहीं सुनता है?
आहत और अनाहत अलग अलग शब्द हैँ ज़ब आप आहत शब्द को व्याख्यान नहीं कर सकते हैँ तो अनाहत को कैसे व्यक्त कर पायेंगे ? विषय बड़ा जटिल और गंभीर है इस पर विचार करें, सम्पादक महोदय का कथन है आप इतना लिखते हैँ बहुत ज्यादा एम बी ऑडियो या आलेख हो जाता है अतएव उतना मत लिखिए विषय लम्बा होने से अब मैं शॉर्ट कट में जा रहा हूँ तो कहने का गर्ज है वह शब्द जिसे ईशा नें भगवान बताया है वह शब्द सबके घट के अन्दर ही है उसी शब्द को उपनिशब्द नें अनाहत कहा है वह शब्द बिना किसी चोट के हर हमेशा हर पल पल बजता ही रहता है वह रुकता नहीं है " इसी शब्द को सूरदास जी नें भजन में गायन किया है " अपुन को अपुन ही में पायो सबद सबद भयो उजियारो सद्गुरुदेव ने भेद बतायो " लम्बा हो जाने की वजह से मैं उस तल को इशारों इशारों में समझाने का प्रयास का प्रयास किया हूँ समझे तो वाह! वाह! नहीं समझे तो मैं मुर्ख अज्ञानी
प्रमोद कुमार सिन्हा सम्मानित जे पी सेनानी, बिहार सरकार , बाघी, वार्ड ११ , पोस्ट सुहिर्द नगर, जिला बेगूसराय, पिन ८५१२१८ , मो ७४८८७७१३४१
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