जो कानून जनता को बोलने दे,सरकार उसे संशोधन के नाम पर बदल देती है..बैरम रकी

“जिस दिन लिखने में डर लगने लगेगा… उसी दिन लिखना छोड़ दूँगा!” :मो. बैरम रकी 

एक ऐसा लेख जो सुप्रीम कोर्ट से लेकर बिहार की हर गली तक झंझोड़ दे.

जनक्रान्ति कार्यालय से एडवोकेट Md. बैरम रकी की आलेख

जो कानून जनता को बोलने दे,
सरकार उसे संशोधन के नाम पर बदल देती है..बैरम रकी 

सच को दुनिया में सबसे ताक़तवर हथियार बनाने का काम करती है क़लम।
पर जब किसी देश में क़लम डरने लगे, रुकने लगे, थरथराने लगे…
तो समझ लीजिए कि तानाशाही जन्म ले चुकी है और लोकतंत्र मौत के मुहाने पर खड़ा है।

जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन न्यूज डेस्क, भारत)। डर अगर कलम रोक दें. तो दम घूंट जाऐगा।
 प्रस्तावना: डर अगर क़लम रोक दे… तो लोकतंत्र का दम घुट जाएगा।
भारत का लोकतंत्र सिर्फ वोट से नहीं चलता—
यह चलता है आवाज़ से,
यह चलता है सच से,
और सच को दुनिया में सबसे ताक़तवर हथियार बनाने का काम करती है क़लम।
पर जब किसी देश में क़लम डरने लगे, रुकने लगे, थरथराने लगे…
तो समझ लीजिए कि तानाशाही जन्म ले चुकी है और लोकतंत्र मौत के मुहाने पर खड़ा है।
आज हम उसी मोड़ पर खड़े हैं।
और इसीलिए यह लेख सिर्फ एक लेख नहीं—

यह संवैधानिक चेतावनी है।
“लिखने से डरना देशद्रोह नहीं… पर डर के कारण न लिखना लोकतंत्र-द्रोह है।”
आज भारत में BNSS, BNS, BSA से लेकर Rao Committee तक…
हर जगह “सुधार” के नाम पर ऐसा वातावरण खड़ा किया जा रहा है कि
आवाज़ उठाना जुर्म जैसा लगे,
सरकार से सवाल करना विद्रोह जैसा दिखे,और सच लिखना मानो किसी माफिया से लड़ना हो।
पर मैं—
एडवोकेट Md. बैरम रकी—
एक बात साफ कहता हूँ:
जिस दिन मेरी क़लम को डर लगने लगेगा… उसी दिन मैं वकालत, अदालत, संविधान—सब छोड़ दूँगा।
क्योंकि जो क़लम डर जाए, वह न्याय नहीं दे सकती।
भारत की अदालतों के लिए सीधी चेतावनी:
सुप्रीम कोर्ट, सभी हाई कोर्ट, सभी जिला कोर्ट—
आप न्याय के मंदिर हैं।
पर अगर इस मंदिर में डर का देवता बैठ जाएगा
तो फैसला नहीं, फ़रमान लिखा जाएगा।
अदालतों का मौन आज अपराध से बड़ा अपराध है।
भारत का संविधान बार-बार कहता है:
🔹 अनुच्छेद 19(1)(a) – अभिव्यक्ति की आज़ादी मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है
🔹 अनुच्छेद 32 – न्याय पाना मेरा मौलिक अधिकार है
🔹 अनुच्छेद 50 – न्यायपालिका स्वतंत्र होगी, डर में नहीं
तो फिर सवाल यह है—
क्या पत्रकार, लेखक, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता—
डर कर लिखें.?
या लिखने से डरें और अदालतें चुप बैठी रहें?.
BNSS, BNS और BSA का असली डर — “सिस्टम को सच से नफ़रत है”
नया फौजदारी ढांचा BNSS – BNS – BSA यह दिखाता है कि सरकारें जनता को सुरक्षित कम, “काबू” ज़्यादा करना चाहती हैं।
क्योंकि:  जो कानून जनता को बोलने दे,
सरकार उसे संशोधन के नाम पर बदल देती है.
जो कानून पुलिस को जवाबदेह बनाते थे,
उन्हें मजबूत करने की बजाय उल्टा जनता पर कठोर बनाया गया
 जो आवाज़ सवाल पूछना चाहती है,
उसे देशद्रोह-साइबर अपराध-‘अफवाह’ जैसी धारणाओं से डराया जाता है
इस सारे ढांचे का असली मकसद सिर्फ एक है—
“लिखने वालों को डराओ ताकि शासन की गलती छुप जाए।”
 पर मेरी क़लम डरने वालों में नहीं — दहाड़ने वालों में है।
क्योंकि अगर आज हम डरकर लिखेंगे,
तो कल हमारे बच्चे डरकर जिएँगे।
और मैं उस इतिहास का गवाह नहीं बनना चाहता जहाँ लेखक डरकर जिएँ।
भारत की न्यायपालिका से पाँच सवाल जो भूचाल ला दें:
1. क्या डर के माहौल में लिखी गई FIR न्याय कहलाती है..?
2.क्या BNSS-BNS लोकतांत्रिक जांच की जगह पुलिसिया दमन को बढ़ावा दे रहे हैं.?
3. क्या अदालतें नागरिक की आवाज़ को उतनी ही प्राथमिकता दे रही हैं जितनी संविधान देता है?
4.क्या न्यायपालिका लिखने वालों को सुरक्षा देने में विफल हो रही है?
5.क्या आज़ाद भारत में सच लिखना सबसे बड़ा खतरा बन चुका है?
इन सवालों से सरकार नहीं—
पूरे सिस्टम की नींव हिलती है।
⚡ लेखक की घोषणा:
अगर सच लिखना अपराध है, तो मैं अपराधी बनने को तैयार हूँ।
अगर क़लम उठाना ‘खतरा’ है, तो यह खतरा मुझे मंज़ूर है।
पर मैं डरकर लिखूँगा नहीं,और अगर कभी डर लगा,
तो क़लम उसी पल जमीन पर रख दूँगा… पर झुकाऊँगा नहीं।
समापन: यह लेख नहीं — यह क्रांति की चिंगारी है
आज बिहार से उठी यह आवाज़
कल पूरे हिंदुस्तान को हिलाएगी।
यह सिर्फ शब्द नहीं—
यह उन सभी लेखकों, वकीलों, पत्रकारों, RTI कार्यकर्ताओं,
और आम नागरिकों का घोषणा-पत्र है
जो डर के माहौल में लोकतंत्र को सांस लेते देख रहे हैं।
क़लम को डराना आसान है…
पर क़लम को रोकना नामुमकिन।
और याद रखिए—
*“जिस दिन लिखने में डर लगने लगेगा…
उसी दिन लिखना छोड़ दूँगा —
पर सच बोलना कभी नहीं।”*
उपरोक्त आलेख अधिवक्ता मो. बैरम रकी द्वारा वाट्सऐप माध्यम से जनक्रांति प्रधान कार्यालय को संप्रेषित व प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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