तस्वीरों में बड़ा दिखना है या इतिहास में बड़ा बनना है : md. Bairam Rakie
"तस्वीरों का नशा: बड़े आदमी के साथ फोटो और छोटे दिमाग की सबसे बड़ी बीमारी”
जनक्रांति कार्यालय से Adv Md Bairam Rakee की रिपोर्ट
जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन न्यूज़ डेस्क, भारत। आज का समाज एक अजीब मानसिक बीमारी से जूझ रहा है।
बीमारी का नाम है — “तस्वीरों से झूठी हैसियत”।
किसी बड़े आदमी के साथ फोटो खिंचवा ली,
दो मिनट हाथ मिला लिया,
पाँच सेकंड मंच पर खड़े हो गए —
और फिर सालों तक उसी फोटो को अपनी पहचान बना लिया।
यह सिर्फ नासमझी नहीं,
यह गंभीर दिमागी गुलामी है।
तस्वीर नहीं, सोच बड़ी होनी चाहिए
आज इंसान अपने कर्म से नहीं,
अपने कैमरा एंगल से पहचाना जाना चाहता है।
❌ विचार नहीं
❌ संघर्ष नहीं
❌ योगदान नहीं
वो कहता है —
“देखो, मैं इनके साथ खड़ा हूँ!”
लेकिन सवाल ये है👇
क्या वो बड़ा आदमी तुम्हारे साथ खड़ा है.?
या तुम बस उसकी कुर्सी की छाया में खड़े हो.?
यह बीमारी क्यों खतरनाक है.?
क्योंकि यह बीमारी —
आत्मसम्मान को मार देती है
मेहनत की जगह चमचागिरी सिखाती है
युवाओं को संघर्ष नहीं, शॉर्टकट सिखाती है,और समाज को विचारहीन भीड़ में बदल देती है।
आज लोग ये नहीं पूछते कि
“मैंने क्या किया..?”
बल्कि पूछते हैं —
“मैं किसके साथ फोटो में दिख रहा हूँ?”
हिंदुस्तान के लिए चेतावनी
जिस देश में पहचान
संघर्ष से नहीं,
सेल्फी से बनने लगे —
वहाँ क्रांति नहीं, केवल कंफ्यूजन पैदा होता है।
नेता बदलते रहेंगे,
अफसर आते-जाते रहेंगे,
लेकिन अगर जनता
सोच से नहीं,
तस्वीर से खुश होती रही —
तो बदलाव सिर्फ पोस्टर में रहेगा, ज़मीन पर नहीं।
असली बड़ा आदमी कौन?
जो तुम्हें अपने साथ खड़ा नहीं करता,
बल्कि तुम्हें अपने पैरों पर खड़ा करना सिखाता है।
जो फोटो नहीं,
तुम्हें सोच देता है।
जो मंच नहीं,
तुम्हें दिशा देता है।
अंतिम सच (जो चुभेगा)
बड़े आदमी के साथ फोटो खींचकर खुश होना
सफलता नहीं,
बल्कि अपनी असफलता को छुपाने का सबसे सस्ता तरीका है।
अब फैसला तुम्हारा है —
तस्वीरों में बड़ा दिखना है या इतिहास में बड़ा बनना है।
अगर ये लेख आपको चुभा, तो शेयर कीजिए।
क्योंकि चुभने वाली बातें ही समाज को जगाती हैं।

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