स्व-रचित रचना औऱ तुम्हें क्या चाहिये इस जीवन में
स्व-रचित रचना
औऱ तुम्हें क्या चाहिये इस जीवन में
औऱ तुम्हें क्या चाहिये इस जीवन में
नयन नक्स किसी काम का नहीं
दिल भी है धड़कन आराम का नहीं
मुझे तो बस तेरा प्यार चाहिये
खुशियों से भरा पल अम्बार चाहिये
भर दो झोली इतनी खुशियाँ हो
मन में तरंग उमंग भरा दिल हो
औऱ ना मुझे कुछ चाहिये
खुशियों से भरा.........
जिंदगी तो है पल दो पल की ही
दिल से गुबार औऱ नफरत उतार फेको
चार दिन की है चाँदनी फिर तो
अँधेरी सुरंग औऱ रात का इंतज़ार
ऐसी नफरत उघर जाने दो
गुलशन गुलशन बहार आ जाने दो
औऱ तुम्हें क्या चाहिये इस जीवन में
खुशियों से भरा.........
इधर - उधर मत झाँकों जीवन में
क्षण भंगूर है व्यर्थ है हर पल
समा जाओ आ जाओ बांहों में
तुम्हें चुम लूँ जी भरकर नज़र में
औऱ क्या तुम्हें चाहिये इस जीवन में
खुशियों से भरा.......
कितना सुन्दर है जमाना जो है
कितने अरमान फसाना जो है
नफरत फिर भी तुम्हारे जीवन में
उतार फेको ओठों पे हो मुस्कान
औऱ तुम्हें क्या चाहिये इस जीवन में
खुशियों से भरा.......??

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