चाय की दुकान से आध्यात्मिक सफर की हुई शुरुआत प्रमोद कुमार सिन्हा की

चाय की दुकान से आध्यात्मिक सफर की हुई शुरुआत प्रमोद कुमार सिन्हा की 

 जनक्रांति केन्द्रीय ब्यूरो की जुवानी

 हाँ ये एकदम बिलकुल सत्य है की इनका वास्तविक आध्यात्मिक सफर एक चाय दुकान से शुरुआत हुई है।
छाया चित्र के सामने चाय की दुकान है जहाँ आज भी ऐ पहुँच जाते है तो वे भगवान की तरह पैर में हाथ लगा देता है निम्न अपनी पत्नी औऱ पति जय जय राम है बीच में प्रमोद कुमार सिन्हा औऱ इनके बगल में किरण पासवान 

आध्यात्मिक डेस्क, बिहार (जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन कार्यालय अध्यात्म डेस्क 3 फरवरी, 2026)।चाय दुकान से आध्यात्मिक सफर की हुई शुरुआत प्रमोद कुमार सिन्हा की।
जी हाँ ये एकदम बिलकुल सत्य है इनका वास्तविक आध्यात्मिक सफर एक चाय दुकान से शुरुआत हुई है। इनकी दीक्षा श्री सतपाल जी महाराज जो मानव उत्थान सेवा समिति के नाम से जाना जाता है उस समय इनकी पदस्थापना कोशी प्रोजेक्ट सहरसा में था। बताते है की दिनांक १४ फरबरी १९८२ में सर्वशेष्ट महात्मा " धरिजानंद " द्वारा दीक्षित हुआ ऐ ऑडिट विंग से था मेरे साथ इंजीनियरयरिंग कार्यपालक अभियंता ऑफिस के श्री योगेंद्र मिश्र से घणीष्ठठता बढ़ती गयी वे इस सतसंग में १९ बर्ष के प्रेमी थे।
 विदित हो कि इस पोस्टिंग से पहले मेरी पदस्थापना वेस्टर्न कोशी प्रोजेक्ट दरभंगा था। वहीं इनके मित्र जो आज तक इनके मित्र हैँ। उन्होंने गीता प्रेस की पुस्तक " साधन पथ की ओर '" दिया जो मात्र दस पैसे का पुस्तक था। इसके पहले ऐ हनुमान जी को इष्ट मानते थे। औऱ किसी पर इन्हें भरोसा नहीं था। उस दस पैसे की पुस्तक ने इनकी दशा औऱ दिशा बदल दी।
   तदुपरांत पुस्तक धार्मिक पढ़ने की ललक बढ़ती गयी। ये सन १९७८ की घटना है, इनके पास पैसे का बहुत अभाव था वेतन २२० +४ = २२४ रुपये मिला करते थे। जिसमें १५ रुपये भविष्य निधि में कटता था यानी २०९/ रुपये इनके हाथ आता था उसमें सर्वप्रथम वाइफ को बिना बताये ४०/ रुपये मां को मनीॉर्डर करता था फिर इनके पास १६९ / रुपये हुआ करता था जो इतनी कम राशि थी की किसी प्रकार जीवन निर्वहन होता था। माघ जैसे ठंढ औऱ शीत से भरे मौसम में इनके तन पर एक हाफ स्वीटर ही होता था। इनकी वाइफ के मइके से प्राप्त एक बहुत ही साधारण परन्तु छोटा शाल था जो जबरदस्ती स्वं ना ओढ़कर इन्हें तन ढकने के लिये दे दी औऱ स्वं बिना शाल के रहती थी।
बताते है की उस दस पैसे की पुस्तक ने इनके जीवन को झकझोड़ दिया फिर तो इधर उधर से तुलसी कृत मानस हाथ लगी औऱ ऐ आदयोपांत बड़ा ही धैर्य पूर्वक इसे पढ़ा।
    उसके बाद तो किताब पढ़ने की लालसा धीरे धीरे बढ़ती गयी औऱ कम वेतन के बाद भी ऐ मां को रुपये भेजकर ही बचे रुपये से घर का खर्च चलाते थे, औऱ गीता प्रेस की पुस्तक यथा सामर्थ खरीदता था बड़े गौर से पढ़ता फिर दुसरी फिर तीसरी इसी प्रकार हनुमान प्रसाद की पुस्तक औऱ जय दयाल जी का सतसंग का ऐ आदि होते चले गये, औऱ गीता प्रेस की पुस्तक खरीदता औऱ पढ़ता।
   ्कुछेक पुस्तक अन्यत्र से भी प्राप्त होता गया, जैसे शिव पुराण इत्यादि इत्यादि पढ़ता ही गया पढ़ता ही गया ज्यों ज्यों पढ़ता ललक औऱ बढ़ता गया..??
 बात सन १९८१ की है जब इनका स्थानांतरण सहरसा हुआ ये बताना मैं भुल गया उस दस पैसे की पुस्तक जो इनके परम मित्र महावीर लाल कर्ण से प्राप्त हुआ था जो एक ट्युशन से जीवन निर्वहन औऱ पढ़ाई भी कर रहे थे। उस स्थान का नाम " छीपालिया " था औऱ पश्चिमी कोशी प्रोजेक्ट से इनके मित्र घनश्याम प्रसाद सिन्हा थे तीनों की दोस्ती बेजोड़ थी औऱ अभी तक कायम है।
 हाँ ऐ सहरसा की बात कर रहा था दीक्षा प्रांत योगेंद्र मिश्र से काफ़ी धर्म शास्त्र पर चर्चाऐ होती थी। उस समय तक ऐ गीता प्रेस की पुस्तकें औऱ अन्यत्र से प्राप्त पुस्तकों सहित उपनिषदों का भी अध्ययन करते रहे करीब करीब गीता प्रेस की छोटी पुस्तक से लेकर बड़ी बड़ी पुस्तकें का अध्ययन कर चुका था अनेकों पुराण का अध्ययन कर चुका था औऱ करता ही जा रहा था।
  पैसे का अभाव दिनों दिन बढ़ता ही गया ज़ब इनका वेतनमान २६०/ रूपये हुआ उसमें जी पी एफ कटौती २०/ हुआ यानी हाथ में २२०/ मुझे प्राप्त होने लगा सर्वप्रथम मां को ४०/रुपये से बढ़ाकर ६०/ रुपये कर दिया यानी २६० -२०= २४० - ६० = १८० / रुपये में एक बच्चे का लालन पालन औऱ किताब खरीदने के बाद पैसा नग्नय ही बचता था। इस समय तक बहुत सारे उपनिषदों का अध्ययन कर चुका थे औऱ गीता प्रेस से प्रकाशित हनुमान प्रसाद जी का सत्संग औऱ जय दयाल गोइंका का सत्संग पढ़ ही नहीं रहा था जीवन में उतार चढाव भी आ रहा था तब मेरी दोस्ती योगेंद्र मिश्र से हुई।
दीक्षा मिलने पर रात्री दो बजे इनके घर पर हल्का दस्तक मिश्र जी किया करते थे औऱ ऐ इंतजार में तैयार होकर एक कंबल ओढ़कर उनके साथ हवाई अड्डा केआख़िरी छोड़ पर चल दिया करते थे। इन्हें दीक्षा में सोहँ मंत्र खेचरी मुद्रा, कान बन्द कर मध्य रात्री में अनहद सुनना औऱ आँख के दोनों कर्निका दाब कर भृकुटी मध्य में प्रकाश दर्शन करना होता था। यानी रात्री को सोना बंद ये सभी क्रिया हबाई अड्डा के अंतिम छोड़ पर होता था यानी दो बजे रात्री को निकलता औऱ ढाई बजे अंतिम छोड़ पर पहुंचता लगातार साढ़े पाँच बजे तक साधन पर बैठता इनके हृदय में छल नहीं था परन्तु उनका हृदय कलुषित था कहाँ उनका वचन था मैं १९ बर्ष का प्रेमी हूँ हाथ पकड़ कर खीच लूँगा मात्र १९ दिन तक में ही उन्होंने मेरा साथ छोड़ दिया.कारण सिर्फ इतना था मुझे १९ दिन में खेचरी की सिद्धि हो गयी थी औऱ अनुभव वो पूछते थे ऐ बता दिया करते थे। ऐ नादान थे औऱ वे छलिया उनको खेचरी नहीं लगता था उनको तो छोड़िये बड़े बड़े महात्मा को भी खेचरी नहीं सिद्ध है औऱ प्रकाश दर्शन में ऐ तरह तरह की चीजें देखा करते थे जो अद्भुत है बताया नहीं जा सकता है इस दर्शन में जो बबुर्बन्ना मैं देखा था रामेश्वरम से धनुष कोटी का बबुर्बन्ना देखकर आश्चर्य चकित हो गया वह वही बबुर्बन्ना था जो ध्यान में इन्होने देखा था उन्होंने ने मेरा साथ छोड़ दिया मात्र उन्नीस दिन में कहा गुरु गुर औऱ चेला चिन्नी ये मुझसे नहीं होगा आपका रास्ता अलग औऱ मेरा रास्ता अलग हुआ यों की मुझे मिनट दर मिनट सुगंध का ऐसा झोंका आता था की हृदय में प्रसंशता औऱ चेहरे खिला हुआ मुस्कान युक्त एक पान दुकान पर ऐ उनके साथ पान खा ही रहे थे की सुगंध की झोंका से ऐ मुस्कुराने लगे वे पूछे प्रेमी जी आप मुस्कुरा रहे हैँ क्या बात है।
      तो इन्होने कहा एक सुगंध का झोका हर समय मुझे आता है औऱ चेहरे पर मुस्कान छा जाता है।
   इसके बाद तो जलन इतना हो गया की वे मुझसे बात करना ही भुल गये स्पष्ट कहा मेरे हृदय में जलन हो रहा है अब आप मुझसे बात नहीं करेंगें नतीजा उस दिन औऱ समय के बाद सुगंध का झोंका आना बन्द हो गया मैंने महात्मा जी से मिल हाल बताया वे मुस्कुराये कहा ऑडिटर तुम्हें अनुभव की बात नहीं बताना था तुमने गलती की है इन्होने कहा महात्मा जी आपने कभी ऐसा मुझे बताया भी तो नहीं था परन्तु गागर ज़ब भर जाता है तब जल तो अपने आप छलकने लगता है मेरा दोष कहाँ है।
  अब ऐ पुनः उस चाय के दुकान पर लिये चलता हूँ इस समय इनका स्थानांतरण बेगूसराय हो चुका था औऱ गुरूजी फुसो जी के चाय दुकान गाछी टोला में चाय पिया करता था वे संगीत प्रेमी थे हारमोनियम से मीरा का भजन " हेरि मैं तो प्रेम दीवानी मेरो दर्द ना जाने कोई "मेरे ह्रदय के गहनतम गहराइयों में उतर जाता था उस चाय दुकान पर घंटो घंटो सतसंग सुनाता औऱ बीच बीच में चाय भी बनाते कैसे समय बीत जाता था मुझे कुछ भी पता नहीं चलता उनके गुजर जाने के बाद मेरी बैठकी जय जय राम चाय दुकान पर होने लगी औऱ उसकी चाय की बिक्री लगातार बढ़ती गयी वहाँ मैं तक़रीबन पांच छह घंटे व्यतीत करता था.
    यह कर्म कब तक चला शायद पंद्रह साल तक जहाँ मैं चाय पीता औऱ सत्संग सुनता।छाया चित्र के सामने चाय की दुकान है जहाँ आज भी ऐ पहुँच जाते है तो वे भगवान की तरह पैर में हाथ लगा देता है निम्न अपनी पत्नी औऱ पति जय जय राम है बीच में मैं हूँ औऱ मेरे बगल में किरण पासवान हैँ।
उपरोक्त आलेख प्रमोद कुमार सिन्हा ने स्वंय को अध्यात्म को आत्मसात कर प्रकाशन हेतू संप्रेषित आदेश निर्गत किया। 
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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