स्वरचित रचना : अधुरा है जीवन एक तेरे बिना 🖋️प्रमोद कुमार सिन्हा, बाघी
स्वरचित रचना : अधुरा है जीवन एक तेरे बिना
एक बार मेरे जीवन में आओ तुम्हें इतना प्यार दूँ
व्यवहार जो हुआ है तेरे साथ मैं तुम्हें इतना उपहार दूँ
मुझे हो सके तो मेरे किये कर्मों को इतनी सजा मत दो
निहाल कर दूँ सारे दुःख दर्द मिटा दूँ खुशहाल संसार दूँ
मैं डिग जाता तो तेरे चार फुल बिखड़ जाते
खिल रहे हैँ गुलाबों की तरह पतझड़ की तरह उजड़ जाते
खुशी होगी तुम्हें मैं टूट गया हूँ तुम्हारे बिना
इतना ना याद आओ की मैं ही टूट जाऊँ डाली से
भुलाये ना भुल पाउँगा जो प्रेम तुमने मुझे दिया है
सब कुछ तो है कोई कमी नहीं कमी है केवल तुम्हारे बिना
जीवन अधूरा रह गया टुटा नहीं बिखड़ गया हूँ
उजड़ा गुलशन है उजड़ा है दिल मेरा एक तेरे बिना
क्या बताऊँ क्या तुम्हें समझाऊं हाल मेरा जानती हो
क्या क्या ना गुजड़ रहे हैँ मुझ पर एक तेरे बिना
आँखों में अश्रु धारा मेरे कर्मों की ही है सजा
अब याद आती है गुनाहों की सभी बात ईश की रज़ा
छोड़कर चली गयी साथ तो ले लेती तुम मुझे भी
खुदा को मंजूर नहीं था मेरे साथ बज रहा जो बजा
एक बार विनती है पुनः मेरे साथ आ जाओ
तुम्हें इतना प्यार दूँ मैं ज़िन्दगी गुनगुना जाओ
सजा तुमने बड़ी बिकराल दी है मेरे अधूरे पन का
क्या क्या बताऊँ जीवन में एक बार मुस्कुरा कर जाओ
बीस वर्ष बीत रहे हैँ लगता नहीं तुम नहीं हो
कैसे मैंने रातें गुज़ारी कैसे दिन बिताये ज़ब तू नहीं हो
पल पल याद तेरी जाती नहीं है अब तुम नहीं हो
कविता नहीं मेरे जीवन कहानी ही हो तुम
अधुरा पन क्या होता है बता गयी हो आज तुम
जी तो रहा हूँ मरकर ही जी रहा हूँ कोई खुशहाली नहीं
किनारे लगाया अकेले होकर ज़ब हो नहीं तुम
मेरे साथ क्या क्या गुज़री है बता ना पाउँगा
सब कुछ तो देख रही हो साझा ना पाउँगा
जिंदगी क्या होती है एक तेरे बिना अधुरा
दुःख दर्द क्या होता है कैसे मैं गुन
गुंऊंगा
स्वरचित रचना प्रकाशन हेतु प्रमोद कुमार सिन्हा, केंद्रीय ब्यूरो, जनक्रांति हिंदी न्यूज़ बुलेटिन द्वारा प्रेषित समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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