स्व रचित :रचना : कर्ज चुकता कैसे करुँगा..?? 🖋️प्रमोद कुमार सिन्हा, बाघी

स्व रचित :रचना :
        कर्ज चुकता कैसे करुँगा..?? 
        🖋️प्रमोद कुमार सिन्हा, बाघी 

वहम होता है जिंदगीमें कभी कभी 
दोस्त बनते हैँ जिंदगी में कभी कभी 
राहें मंजिलें हैँ मुश्किल भरा जिंदगी 
मुश्किल वक़्त घड़ी है कभी कभी 
वहम होता है...।.....
कैसे निभाउंगा कर्ज जो तूने दिया 
कह भी नहीं सकता जो दर्द दिया 
उबर नहीं पा रहा दबे जा रहा हूँ
चुकता कैसे करूँ जो मर्ज तूने दिया 
वहम होता है..........
किसी जनम का कर्ज जो था बाकी 
जाम पर जाम से मदहोशी दो साकी 
कहना है आसान वयां है मुश्किल 
वर्दी पहन पहरे करबा रहे हो खाकी  वहम होता है.....
ऐ मेरे दोस्त दिल में उतर कर्ज दिया 
बोझ तले दबा जा रहा हूँ मर्ज दिया 
बता अब तू ही उद्धार कैसे करूँ मैं 
समझ में आता नहीं कैसा दर्द दिया 
वहम होता है..।....
राह चलते चलते मिल जाते हैँ साथी 
पार्थ कृष्ण की जोड़ी बना है सारथी 
कैसे कैसे लोग होते हैँ इस जमीं पे 
कर्म के लिये होते तो कोई अर्थार्थी 
वहम होता है.......
बफा की राहें मंजिलें नहीं आसान 
दिल बेचैन है हूँ कितना मैं परेशान 
ऐ मेरे साथी कर्ज अदा ना कर पाउँगा 
लगता है बोझ तले ही जाना श्मशान वहम होता है.....
उपरोक्त स्वरचना प्रकाशन हेतु प्रमोद कुमार सिन्हा, केंद्रीय ब्यूरो, जनक्रांति हिंदी न्यूज़ बुलेटिन द्वारा समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय को प्रेषित व प्रकाशक /सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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