स्व. रचित रचना : अनहद धुनअनहद धुन है प्यारी प्यारी न्यारी न्यारी सुने जा रहा हूँ सुने जा रहा हूँ सुने जा रहा हूँ कभी झींगुर कभी डम डम कभी है शंख ध्वनि ध्यान लगे जा रहे हैँ लगे जा रहे हैँ सुने जा रहा हूँ अनहद धुन सुने.......
स्व. रचित रचना : अनहद धुन
अनहद धुन है प्यारी प्यारी न्यारी न्यारी
सुने जा रहा हूँ सुने जा रहा हूँ सुने जा रहा हूँ
कभी झींगुर कभी डम डम कभी है शंख ध्वनि
ध्यान लगे जा रहे हैँ लगे जा रहे हैँ सुने जा रहा हूँ
अनहद धुन सुने.......
अनहद धुन है प्यारी प्यारी न्यारी न्यारी
सुने जा रहा हूँ सुने जा रहा हूँ सुने जा रहा हूँ
कभी झींगुर कभी डम डम कभी है शंख ध्वनि
ध्यान लगे जा रहे हैँ लगे जा रहे हैँ सुने जा रहा हूँ
अनहद धुन सुने.......
आबाज सतत है जारी बिन बजाए गुने जा रहा हूँ
मन मस्त भरा तन रहता है मतबाला गुने जा रहा हूँ
धतूने समझाया जो तरीका तूने ही उलझाया है क्यों
चलते - चलते भीड़ हो या शोर में गुने जा रहा हूँ
अनहद धुन......
बस अब मुझे कुछ नहीं करना करबा रहे हो तुम
हर पल पल घड़ी घड़ी दीप जला रहे हो दीप जला रहे हो
बंदा मैं अकेला पिये जा रहा हूँ पिये जा रहा हूँ
तुमसे पहले बादलों की गर्गराहट देखा याद दिला रहे हो
अनहद धुन.........
मेह बरसते देखा चमक चमक चाँदनी भी देखा
भय से थर थर कांपा भागकर श्री मति को जगाया
गति मिली ना मंजिल मिला ना कोई राह ही देखा
सुगंध बेतहासा आया सुगंध से दिल घबराया
अनहद धुन.........
शरीर बढ़ते बढ़ते लम्बा बृक्ष ताड़ के समान हुआ
घटते घटते लगा मौत के आगोश में शून्य हुआ
शरीर नज़र ना आया हाथ दीख ना पड़ा
नाक छूकर ज़ब देखा धीरे धीरे शरीर का बोध हुआ
अनहद धुन.........
कोराना काल में तूने रात्री में मुझे जगाया
सोये सोये क्रिया योग करने लगा भय भरपुर समाया
एका एक चक्र जलते देखा बुझते देखा
सन सन सा आबाज क्षण भर का लगा मौत में समाया
अनहद धुन.......
तुमसे पूछा हुआ किया जो मुझ पर बिता
सुनी अनसुनी कर तूने कुछ ना बताया जो बिता
समय चक्र चलता रहा बड़े पुत्र को मैंने बताया
बाद में पुस्तक भेजा सारी बात समझ कर जीता
प्रकाशन हेतू केन्द्रीय ब्यूरो चीफ प्रमोद कुमार सिन्हा द्वारा प्रेषित समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से सम्पादक /राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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