निगरानी द्वारा रंगेहाथ गिरफ्तार रिश्वत की राशि लेते हुऐ पेशकार की आंशिक जीवन वृत
निगरानी द्वारा रंगेहाथ गिरफ्तार रिश्वत की राशि लेते हुऐ पेशकार की आंशिक जीवन वृत
जनक्रांति कार्यालय से सूत्रों की रिपोर्ट
सीओ और कर्मचारी के साथ डीसीएल आर को मिला सरकारी भूमि का अवैधानिक तरीके से दाखिल - खारिज करवाना कहा तक न्यायोचित है, संदेह के घेरे में
मुंगेर/बेगूसराय, बिहार (जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन कार्यालय न्यूज डेस्क मुकेश कुमार एक बहुत ही गरीब घराना से रहा है इसका पिता आइस क्रीम बेचा करता था मुकेश बहुत मेधाबी था। मुकेश कुमार पचम्बा क़े निबासी नहीं वरण बाघी वार्ड नम्बर ११ क़े बासी हैँ।
इस नौकरी में आने से पूर्व यह रेलवे की नौकरी में भी था। उसके उपरांत यह cgl द्वारा इंस्पेक्टर पद पर भी था।
तदुपरान्त यह बी पी एस द्वारा असिस्टेंट हुआ यह होनहार बिद्यार्थी था परन्तु पैसे की ललक ने इसे घुस खोर बना दिया। यह निगरानी क़े हत्थे चढ़ गया। लेकिन ऊपर बाले की मेहरवानी या निगरानी बिभाग की मेहराबानी ही कहा जाये की इसे रंगें हाथों तो पकड़ा गया है, लेकिन होना ये था। निगरानी बिभाग द्वारा नोटों को केमिकल लगाया जाता है हाथ धुलवाया जाता है जिससे पुख्ता सबूत होता है वह नहीं किया गया है जिससे इसे बच निकलने की पुरी सम्भाबना है यह निगरानी बिभाग की मेहरबानी है या ऊपरी दबाब समझा जा सकता है।
सबसे खूबी की बात है सरकारी जमीन को निजी बताकर फैसला साहेबपुर कमाल सी ओ द्वारा किया जाना औऱ डी सी एल आर बलिया द्वारा स्वीकृति देना कहाँ तक न्याय अनुकूल है इसमें तो सी ओ साहेबपुर कमाल क़े कर्मचारी औऱ सी ओ प्रथम दृष्टि में ही संदेह क़े दायरे में हैँ दुसरी ओर डी सी एल आर बलिया क़े कर्मचारी औऱ पदाधिकारी भी संदेह क़े दायरे में हैँ तब तीसरे नम्बर पर आयुक्त मुंगेर का कार्यालय आता है नियम क़े अनुसार ना सिर्फ मुकेश कुमार बल्कि संबंधित कर्मचारी औऱ पदाधिकारी पर भी एफ आई आर औऱ गिरफ्तारी औऱ आय से अधिक संपत्ति की जाँच होना चाहिये ये पुरा रैकेट इससे सम्बंधित है इसको क्यों छोड़ा जा रहा है।
नीतीश जी की राज में घूसखोरी चरम चोटी पर रहा है सिर्फ शुशासन का दाबा वो करते रहे हैँ क्या क्या ना खेला उनके समय में होता रहा है ये किसी से छिपी हुई बात नहीं है ये राजस्व बिभाग क़े चार्ज में आने क़े बाद माननीय मंत्री विजय सिन्हा द्वारा किया गया जीरो टॉलरेन्स का सिर्फ नमूना है यदि वास्तविक में झांका जाये तो सभी भ्रष्ट ही मिलेंगे।
मुकेश कुमार की संपत्ति सिर्फ मकान तक ही सीमित है सो बात नहीं बल्कि वे कई भूखंड क़े मालिक भी हैँ। एक संपत्ति का टुकड़ा बेगूसराय में डॉ राजेश हॉस्पिटल क़े बगल में भी है जिसे महंगें दामों में खरीदा गया है लेकिन रजिस्ट्री ऑफिस में दबाव डाल कर कम क़ीमत दर्शाया गया है ऐसे कई भूखंड का पता चल सकता है जो मुकेश कुमार द्वारा खरीदा गया है इस जाँच में बड़े बड़े पदाधिकारीयों को क्यों बख्शा जा रहा है। जबकि सभी क़े सभी समान रूप से दोषी नजर आ रहे हैँ सरकारी जमीन को किस बुनियाद पर प्राइवेट बनाया गया यह सोचनीय प्रश्न है यह तो बानगी है बिहार सरकार क़े कार्यों का ऐसे बहुतेरे मामले होंगें जो संज्ञान में आया ही नहीं है या जानबूझकर अनदेखी की जाती है भ्रष्टाचार तो जड़ जड़ में समाया हुआ है।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से सूत्रों से प्राप्त सूचना प्रकाशित व प्रसारित।

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