शिक्षा और स्वास्थ्य में कमीशनखोरी से धूमिल होती व्यवस्था छात्र-अभिभावक परेशान, प्रशासन और राजनीतिक दल मौन क्यों..?

शिक्षा और स्वास्थ्य में कमीशनखोरी से धूमिल होती व्यवस्था छात्र-अभिभावक परेशान, प्रशासन और राजनीतिक दल मौन क्यों..?

जनक्रांति कार्यालय से राजेश कुमार वर्मा की रिपोर्ट 
शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं में बढ़ती कमीशनखोरी ने आम जनता की परेशानी को और बढ़ा दिया है।
समस्तीपुर/बिहार (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन कार्यालय न्यूज डेस्क 2 मार्च 2026)। आज के दौर में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं में बढ़ती कमीशनखोरी ने आम जनता की परेशानी को और बढ़ा दिया है। 
एक ओर जहां स्वास्थ्य क्षेत्र में खून, पेशाब, पैखाना जांच, एक्स-रे, ईसीजी, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, चश्मा आदि जांचों में चिकित्सकों द्वारा कथित कमीशनखोरी की शिकायतें सामने आती रही हैं, वहीं दूसरी ओर निजी विद्यालयों में किताब, टाई, बेल्ट, डायरी, टेस्ट, प्रमोशन फीस, ड्रेस, कॉपी सहित विभिन्न मदों में कमीशनखोरी का आरोप लग रहा है।
यह स्थिति धीरे-धीरे शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों क्षेत्रों की प्रतिष्ठा को धूमिल कर रही है, जिससे छात्र-छात्राओं और अभिभावकों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।

शिक्षा में बढ़ता आर्थिक बोझ : 

अभिभावकों का आरोप है कि कई निजी विद्यालयों द्वारा निर्धारित दुकानों से ही किताब खरीदने का दबाव अनिवार्य स्कूल ड्रेस महंगे दरों पर टाई, बेल्ट, बैग, डायरी का अलग शुल्क बार-बार टेस्ट शुल्क, प्रमोशन और वार्षिक शुल्क
अतिरिक्त गतिविधियों के नाम पर शुल्क
जैसे कई माध्यमों से आर्थिक बोझ बढ़ाया जा रहा है। 
इससे मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के लिए बच्चों की पढ़ाई मुश्किल होती जा रही है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में भी सवाल : 

इसी तरह स्वास्थ्य क्षेत्र में भी कई बार यह आरोप सामने आता है कि मरीजों को विशेष जांच केंद्रों या मेडिकल दुकानों पर भेजा जाता है, जहां कथित तौर पर कमीशन का खेल चलता है। इससे मरीजों को महंगी जांच और दवाइयों का बोझ उठाना पड़ता है।
प्रशासन और राजनीतिक दल मौन क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रशासन चुप क्यों है..? सरकार इस पर सख्ती क्यों नहीं कर रही..? 
पक्ष-विपक्ष के राजनीतिक दल इस मुद्दे पर आवाज क्यों नहीं उठा रहे..?
छात्र संगठन और सामाजिक संगठन सक्रिय क्यों नहीं हैं..?
जनता का कहना है कि यह मुद्दा सीधे आम लोगों की जेब से जुड़ा है, फिर भी इस पर व्यापक स्तर पर कार्रवाई नहीं हो रही है।

छात्र-छात्रा और अभिभावक परेशान : 

लगातार बढ़ते खर्च के कारण कई अभिभावक बच्चों की पढ़ाई छुड़ाने को मजबूर हो रहे हैं।
गरीब परिवार कर्ज लेकर फीस भर रहे हैं
छात्रों में मानसिक दबाव बढ़ रहा है।
यह स्थिति शिक्षा के अधिकार और समान अवसर की भावना के विपरीत मानी जा रही है।

क्या हो सकते हैं उपाय..?

इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने कुछ सुझाव दिए हैं:
निजी विद्यालयों की फीस संरचना की सरकारी निगरानी किताब और ड्रेस खरीदने की स्वतंत्रता अभिभावकों को देना। 
स्वास्थ्य जांच में पारदर्शिता लागू करना
शिकायत हेल्पलाइन और पोर्टल शुरू करना।
जिला स्तर पर निगरानी समिति बनाना
दोषी पाए जाने पर कड़ी कार्रवाई।

सोचनीय विषय: 
शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों ही समाज की बुनियाद हैं। यदि इन क्षेत्रों में पारदर्शिता नहीं रही, तो आम जनता का विश्वास टूटना तय है। अब जरूरत है कि प्रशासन, सरकार, राजनीतिक दल और छात्र संगठन इस गंभीर मुद्दे पर आगे आएं और ठोस कदम उठाएं।
छात्र-छात्रा और अभिभावक समाधान की तलाश में हैं — अब जिम्मेदार संस्थाओं को पहल करनी होगी। 
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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