हास्य - व्यंग : “कॉकरोच का धमाल” आलेख : जौली अंकल
हास्य - व्यंग :
“कॉकरोच का धमाल”
आलेख : जौली अंकल
मैं बात कर रहा हूँ उस प्राणी की, जो डायनासोर के जमाने से लेकर आज के परमाणु युग तक, सीना तानकर और छह पैर हिलाकर हमारे रसोईघर में राज कर रहा है यानी कॉकरोच: जौली अंकल
इंडिया जनक्रांति न्यूज़ डेस्क (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन 21 मई 2026)। आज एक ऐसे गंभीर, संवेदनशील और विशेष विषय पर बात करते है, जिसे सुनकर शायद आपकी रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ जाए। जी नहीं, मैं किसी नए टैक्स या महंगाई की बात नहीं कर रहा, मैं बात कर रहा हूँ उस प्राणी की, जो डायनासोर के जमाने से लेकर आज के परमाणु युग तक, सीना तानकर और छह पैर हिलाकर हमारे रसोईघर में राज कर रहा है यानी कॉकरोच। आजकल पूरे देश में इस जीव की ऐसी जबरदस्त चर्चा है कि पूछिए मत। पिछले चार पांच दिनों में लाखों लोग इसके प्रशंसक हो चुके हैं और हर दिन यह तादाद बढ़ती ही जा रही है। समाचार और सोशल मीडिया के सारे मंचों पर इसके नाम की आंधी चल रही है, और ऐसा लग रहा है कि जैसे देश में कोई कॉकरोच क्रांति आ गई हो। खुद कॉकरोच भी अपने एंटीना हिला हिलाकर हैरान है कि आखिर ऊपर वाला अचानक उस पर इतना मेहरबान कैसे हो गया और उसे इतना ज्यादा प्यार क्यों मिल रहा है।
अब जरा इस ब्रह्मांड के डर के विज्ञान और इसकी पूरी श्रृंखला को समझिए, जो हमारे समाज में एक बहुत ही खूबसूरत और स्वचालित व्यवस्था के तहत काम करती है। उदाहरण के लिए चूहा बिल्ली से डरता है, बिल्ली कुत्ते से डरती है, कुत्ता आदमी से डरता है, और वो बहादुर आदमी अपनी धर्मपत्नी यानी बीवी से डरता है। लेकिन कहानी का मुख्य मोड़ यहाँ नहीं है, वह बीवी जिससे बड़े बड़े सूरमा थर-थर कांपते हैं, जैसे ही रसोईघर में एक नन्हे से कॉकरोच को देख लेती है, तो उसकी चीख से पूरा मोहल्ला जाग जाता है और वो सीधे खाने की मेज के ऊपर छलांग लगा देती है। कहने का भाव यह है कि इस पूरी दुनिया का अंतिम और सबसे बड़ा विजेता कोई और नहीं, बल्कि हमारा कॉकरोच महाशय ही है, क्योंकि जिससे साक्षात यमराज की शक्ति रखने वाली बीवी भी डर जाए, उससे पूरा ब्रह्मांड अपने आप ही डर जाता है।
इस डर और दीवानगी के बीच, मुझे एक पुराना किस्सा याद आता है जब एक महाशय ने अपनी पत्नी को खुश करने के लिए कीड़े मकोड़े मारने वाले विशेषज्ञ को बुलाया ताकि घर के सारे कॉकरोच साफ हो सकें। अगले दिन जब उन्होंने देखा कि रसोईघर में अभी भी दो चार कॉकरोच मजे से हलवा खा रहे हैं, तो उन्होंने गुस्से में कॉकरोच से पूछा कि तुम लोग मरते क्यों नहीं, कल दवा छिड़की थी ना, तो कॉकरोच ने बड़े अदब से मूंछें मटकाते हुए जवाब दिया कि अरे अंकल जी, वो जहर था क्या, हमें तो लगा हमारी लोकप्रियता देखकर आपने हमारे स्वागत में कोई सुगंधित इत्र छिड़का है।
एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार के अंदाज में कहें तो, सरकार को तुरंत कॉकरोच संरक्षण एवं विकास मंत्रालय खोल देना चाहिए क्योंकि जब देश के लाखों लोग इनके प्रशंसक बन ही रहे हैं, तो इन्हें राशन कार्ड और पहचान पत्र भी दे देना चाहिए। आखिर जिस जीव में इतनी ताकत हो कि वह बिना सिर के भी एक हफ्ते तक जिंदा रह सके, उसे तो हमारे देश की राजनीति में होना चाहिए था, जहाँ वैसे भी लोग बिना दिमाग इस्तेमाल किए सालों साल राज करते हैं। आजकल लोग सुबह उठकर अखबार में मुख्य समाचार बाद में देखते हैं, पहले यह चेक करते हैं कि आज कॉकरोच ने कौन सा नया कीर्तिमान तोड़ा है, यह ऐसा कॉकरोच है जिसे देखकर नफरत नहीं, बल्कि प्यार उमड़ रहा है और कॉकरोच खुद शीशे के सामने खड़ा होकर सोच रहा है कि कहीं मैं पिछले जन्म में कोई बड़ा कलाकार तो नहीं था।
चलो, हंसी मजाक अपनी जगह है, लेकिन पैंतालीस किताबें लिखने के बाद अगर मैं आपको कोई गहरी बात न समझाऊं, तो मेरा जौली अंकल होना बेकार है, इसलिए इस कॉकरोच की कहानी से हमें एक बहुत बड़ा और गंभीर सामाजिक संदेश मिलता है। कॉकरोच की सबसे बड़ी खासियत विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रहने की कला और हर माहौल में खुद को ढाल लेना है, दुनिया इधर की उधर हो जाए, परमाणु बम गिर जाए या कोई चप्पल तानकर खड़ा हो, कॉकरोच कभी हार नहीं मानता, वो मुस्कुराकर और मूंछ हिलाकर आगे बढ़ जाता है। आज के इस तनावभरे दौर में, हमें भी कॉकरोच से यही झेलने की क्षमता और जुझारूपन सीखना चाहिए कि मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, हमें घबराना नहीं है, बल्कि अपने भीतर के डर को भगाकर समाज में शांति और खुशियां फैलानी हैं, और हर परिस्थिति में कॉकरोच की तरह अडिग रहना है क्योंकि जिंदगी मुस्कुराते हुए जीने का नाम है, डरने का नहीं।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।
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