“विष से अछूता, वैराग्य से दीप्त कलम का वह साधक जो प्रेम में पत्रकार और विरह में तपस्वी बन गया…”

“विष से अछूता, वैराग्य से दीप्त कलम का वह साधक जो प्रेम में पत्रकार और विरह में तपस्वी बन गया…”

जनक्रांति कार्यालय रिपोर्ट 

लोगों ने मुझे कई नाम दिए जिद्दी, सनकी, भावुक, विद्रोही, लेकिन किसी ने यह समझने का प्रयास नहीं किया कि मैं आखिर किस पीड़ा को अपने भीतर लेकर चलता हूँ। सच तो यह है कि मैं उस पत्रकारिता का प्रेमी हूँ जिसे कभी सत्य की साधना कहा जाता था : राजेंद्र सिंह जादौन 

भोपाल, मध्यप्रदेश (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन इंडिया जनक्रांति न्यूज़ डेस्क 27 मई, 2026)। मुझ पर न किसी विष का प्रभाव होता है और न किसी कटाक्ष का कोई आघात टिक पाता है। लोग मुझे अक्सर अपनी समझ से परे पाते हैं, क्योंकि मैं इस समय और समाज की भीड़ में जीते हुए भी भीतर से किसी और ही मार्ग का यात्री हूँ। मैं उन लोगों में नहीं जो प्रशंसा से प्रसन्न हो जाएँ और आलोचना से टूट जाएँ। मेरे भीतर जो धधकता है, वह किसी व्यक्ति का अहंकार नहीं, बल्कि पत्रकारिता प्रेम का वह मौन अग्निकुंड है जिसमें मैं वर्षों से स्वयं को तपाता आया हूँ।

लोगों ने मुझे कई नाम दिए जिद्दी, सनकी, भावुक, विद्रोही, लेकिन किसी ने यह समझने का प्रयास नहीं किया कि मैं आखिर किस पीड़ा को अपने भीतर लेकर चलता हूँ। सच तो यह है कि मैं उस पत्रकारिता का प्रेमी हूँ जिसे कभी सत्य की साधना कहा जाता था। मैं उस युग का पथिक हूँ जहाँ शब्द बिकते नहीं थे, जहाँ खबरें सत्ता के चरणों में नहीं झुकती थीं, जहाँ पत्रकार अपने कलम की स्याही में अपना स्वाभिमान घोलकर लिखता था।

प्रिय पत्रकारिता, तुम जानती हो कि मेरे जीवन में यदि कोई श्रृंगार जँचता है तो वह न यश का है, न वैभव का, न पुरस्कारों का। मुझ पर यदि कुछ सुशोभित होता है तो वह केवल वैराग्य है। एक ऐसा वैराग्य जो संसार से भागता नहीं, बल्कि संसार के मध्य खड़े होकर उसकी असत्यताओं को चुनौती देता है। मैं भीड़ में रहकर भी भीड़ का हिस्सा नहीं हूँ। मेरे भीतर अब भी वह अकेलापन जीवित है जो हर सच्चे पत्रकार को अंततः प्राप्त होता है।

तुम्हारे प्रेम में मैं जितना भाग्यशाली हूँ, तुम्हारे विरह में उतना ही तेजस्वी। क्योंकि प्रेम मनुष्य को कोमल बनाता है, लेकिन विरह उसे अग्नि बना देता है। तुम्हारे लिए लिखते-लिखते मैंने जाना कि सच्चा प्रेम कभी अधिकार नहीं माँगता, वह केवल समर्पण चाहता है। और मैंने स्वयं को पूर्णतः तुम्हें समर्पित कर दिया। अब मेरे पास बचा ही क्या है सिवाय उन शब्दों के जो हर रात मेरी आत्मा से निकलकर कागज़ पर उतर आते हैं।

मुझे भलीभाँति ज्ञात है प्रिय पत्रकारिता, यदि प्रेम में मैंने केवल तुम्हें चुना है तो विरह में तुम्हारे अतिरिक्त किसी और को कैसे चुन सकता हूँ। यदि तुम मेरा भाग्य नहीं बनी तो यह संसार भी मेरा मोह नहीं बन पाएगा। मैं आजीवन वैराग्य चुन लूँगा। क्योंकि जिसने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ किसी एक सत्य को अर्पित कर दिया हो, वह फिर किसी झूठे सुख के साथ समझौता नहीं कर सकता।

अब मेरे भीतर इच्छाओं का शोर नहीं उठता। अब मैं प्रसिद्धि के मंचों पर खड़े होकर ताली नहीं चाहता। अब मैं उन चेहरों की भीड़ में स्वयं को खोजने नहीं जाता जो हर दिन अपना चेहरा बदल लेते हैं। मैंने देख लिया है कि इस युग में सत्य सबसे अकेला खड़ा है और जो उसके साथ खड़ा होता है, उसे अंततः वैराग्य ही प्राप्त होता है। पर मुझे इस वैराग्य से भय नहीं लगता। यह वैराग्य ही अब मेरा श्रृंगार है।

मैं श्रृंगार करूँगा तो केवल वीर रस का, विरह का और वैराग्य का। मेरे शब्द अब किसी को प्रसन्न करने के लिए नहीं निकलेंगे। वे उस अग्नि की तरह निकलेंगे जो अंधकार को चीर देती है। मेरी लेखनी अब केवल समाचार नहीं लिखेगी, वह समय के चेहरे पर लिखे झूठ को भी उजागर करेगी। और यदि इसके बदले मुझे अकेलापन मिलता है, तिरस्कार मिलता है, तो भी मैं पीछे नहीं हटूँगा। क्योंकि सच्चा पत्रकार कभी भीड़ से शक्ति नहीं लेता, वह अपनी आत्मा से शक्ति प्राप्त करता है।

हर दिन तुम्हारे प्रेम-विरह में मैं और निखरूँगा। जैसे तपती अग्नि में स्वर्ण अपनी अशुद्धियाँ छोड़ देता है, वैसे ही तुम्हारी अनुपस्थिति ने मेरे भीतर के मोह को समाप्त कर दिया है। अब मेरे पास केवल शब्द हैं, सत्य है और वह मौन पीड़ा है जो हर रात मेरी आँखों में उतर आती है।

कभी-कभी लगता है कि मैं कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक अधूरी कथा हूँ जिसे समय बार-बार लिखता और मिटाता रहता है। पर फिर तुम्हारी स्मृति मेरे भीतर दीपक की तरह जल उठती है और मैं पुनः लिखने बैठ जाता हूँ। क्योंकि कुछ प्रेम मिलकर पूर्ण नहीं होते, वे बिछड़कर अमर हो जाते हैं। और शायद हमारा संबंध भी उन्हीं अमर प्रेमों में से एक है जहाँ मिलन से अधिक सुंदर विरह होता है।

इसलिए सुनो पत्रकार मित्र, यदि कभी तुम्हें लगे कि मैं मौन हो गया हूँ, तो समझ लेना कि मैं टूटा नहीं हूँ। मैं केवल अपने भीतर और गहरा उतर गया हूँ। क्योंकि अब मेरा मार्ग प्रेम से होकर वैराग्य तक पहुँच चुका है और इस मार्ग पर चलते हुए मैं हर दिन स्वयं को और अधिक तेजस्वी पाता हूँ।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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